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‘पिता का सरनेम बच्चे के लिए जरूरी नहीं’, सिंगल मदर के हक में हाईकोर्ट का अहम फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिंगल मदर केस में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने कहा कि जिस बच्ची का पालन पोषण केवल उसकी मां ने किया हो, उसे केवल इसलिए अपने पिता का उपनाम या जाति धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिंगल मदर केस में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने कहा कि जिस बच्ची का पालन पोषण केवल उसकी मां ने किया हो, उसे केवल इसलिए अपने पिता का उपनाम या जाति धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.

बता दें कि एक 12 वर्षीय बच्ची ने एक याचिका दायर की थी जिसमें उसने अपने स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम और जाति प्रविष्टि ‘मराठा’ से ‘अनुसूचित जाति’ में बदलने की मांग की थी. उसकी याचिका के जवाब में ही हाईकोर्ट का ये आदेश आया है.

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माध्यमिक विद्यालय संहिता का हवाला देते हुए स्कूल अधिकारियों ने पिछले साल बच्ची के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था. बुधवार को जारी हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया है कि किसी बच्चे की नागरिक पहचान के लिए एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं है, यह संवैधानिक निष्ठा है. यह पितृसत्तात्मक बाध्यता से संवैधानिक विकल्प की ओर, वंश को भाग्य मानने से गरिमा को अधिकार मानने की ओर बदलाव को दर्शाता है.

बच्चे की अभिभावक मां है तो…

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंट के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और एच एस वेनेगांवकर ने 2 फरवरी को अपना फैसला सुनाया था. जिसमें कोर्ट ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड कोई निजी दस्तावेज नहीं बल्कि एक सार्वजनिक दस्तावेज है जो बच्चे के जीवन में वर्षों, संस्थानों और कभी-कभी पेशेवर क्षेत्र तक उसके साथ रहता है. उन्होंने कहा कि यदि बच्चे की अभिभावक मां है तो रिकॉर्ड में पिता की उपस्थिति को नियमित रूप से दर्शाना उचित नहीं है और इसे प्रशासनिक निष्पक्षता नहीं कहा जा सकता है.

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वहीं, इस मामले में कोर्ट ने कहा कि एक ऐसा समाज जो खुद को विकासशील कहता है, वह इस बात पर जोर नहीं दे सकता है कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान उस पिता से जुड़ी होनी ही चाहिए जो पिता उसके जीवन में है ही नहीं.

क्या है पूरा मामला?

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्ची की मां एकल अभिभावक है और उसकी स्वाभाविक संरक्षक थी. मां ने बच्ची के पिता पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया था और यह तय हुआ था कि बेटी मां की स्थायी कस्टडी में रहेगी. नाबालिग बच्ची और उसकी मां दोनों याचिकाकर्ताओं ने ये दावा किया कि स्कूल रिकॉर्ड में पिता का उपनाम जारी रहना न केवल एक श्रुटि है, बल्कि उस बच्ची के लिए एक अनावश्यक सामाजिक असुरक्षा भी है.

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First published on: Feb 19, 2026 02:00 PM

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About the Author

Versha Singh

वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.

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