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दिल्ली

Explainer: क्या है कृत्रिम बारिश? जो दिल्ली के प्रदूषण को देगी मात, जानें प्रोजेक्ट से जुड़ी डिटेल

Artificial Rain Explainer: दिल्ली में वायु प्रदूषण और AQI बढ़ने लगा है। इसलिए दिल्ली में कृत्रिम बारिश की चर्चा भी छिड़ गई है, क्योंकि जैसे-जैसे वायु प्रदूषण बढ़ेगा, दिल्ली की हवा जहरीली होती जाएगी।

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Edited By : Vijay Jain Updated: May 16, 2025 12:31
Artificial Rain
Artificial Rain: दिल्ली में बढ़ रहे वायु प्रदूषण का समाधान कृत्रिम बारिश हो सकती है।

Artificial Rain Explainer: दिल्ली एनसीआर में इन दिनों पाकिस्तान और राजस्थान से आ रही धूल ने वायु प्रदूषण के स्तर को कई गुणा बढ़ा दिया है। ताजा आंकड़ों पर बात करें तो दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर “खराब” (100-200) से “गंभीर” (200-300) श्रेणी में रहता है। उदाहरण के लिए, 15 मई 2025 को AQI 200 के पार “खराब” श्रेणी में था, जो धूल भरी हवाओं के कारण बढ़ा।

इनसे निपटने के लिए दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में कृत्रिम बारिश अर्थात क्लाउड सीडिंग की योजना बनाई है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि मई के अंत में सरकार दिल्ली में कृत्रिम बारिश का ट्रायल करेगी। अभी 13 विभागों से एनओसी लेने की प्रक्रिया जारी है।

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कृत्रिम बारिश और क्लाउड सीडिंग क्या है?

राजधानी दिल्ली वायु प्रदूषण को देखते हुए सरकार दिल्लीवासियों को राहत दिलाने हेतु कृत्रिम बारिश कराने का प्रयास कर रही है। कृत्रिम बारिश तब कराई जाती है, जब बादल छाए होते हैं, लेकिन वे बरसने वाले नहीं होते। बारिश होती भी है तो वह धरती तक नहीं पहुंच पाती, बल्कि गरज रहे बादलों में ही दब जाती है। ऐसे हालातों में स्पेशल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके बारिश कराई जाती है। इस टेक्नोलॉजी का नाम क्लाउड सीडिंग है।

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इसके तहत बादलों में बारिश के बीच डालकर पानी बरसाया जाता है। बीज सिल्वर आयोडाइड, पोटैसियम क्लोराइड और सोडियम क्लोराइड का मिश्रण होते हैं, जिन्हें हवाई जहाज या एयरक्राफ्ट के जरिए बादलों पर छिड़का जाता है। यह बीज बादल में पहले से मौजूद पानी की बूंदों को जमाकर बर्फ बना देते हैं। यह बर्फ की बूंदें एक दूसरे से चिपककर गुच्छे बन जाते हैं और यह गुच्छे जमीन पर गिरते हैं और फूटते ही पानी निकलता है।

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प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत ₹3.21 करोड़

कृत्रिम बारिश अर्थात क्लाउड सीडिंग के प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी IIT कानपुर को दी गई है। वहां के वैज्ञानिकों ने ट्रायल की तैयारी भी शुरू कर दी है। दिल्ली के मंत्रिमंडल ने सात मई को पांच कृत्रिम बारिश परीक्षण करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी परियोजना लागत 3.21 करोड़ रुपये है। परीक्षण के लिए 2.75 करोड़ रुपये (प्रति परीक्षण 55 लाख रुपये) और अन्य उपकरणों आदि के लिए 66 लाख रुपये की एकमुश्त राशि शामिल है।

ट्रायल सफल रहने पर ही होगा विस्तार

मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि यदि ट्रायल सफल रहता है तो इसे आगे और क्षेत्रों में बढ़ाया जाएगा। यकीनन इससे दिल्ली में प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। हालांकि उन्होंने यह जरूर रहा कि यह अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग केवल प्रदूषण के खतरनाक स्तर वाली जगहों पर किया जाएगा। ट्रायल के दौरान यह जरूर सुनिश्चित किया जाएगा कि इसमें कुछ भी ऐसा न हो तो लोगों के लिए परेशानी बने।

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बाहरी इलाकों में पहले होगी कृत्रिम बारिश

मंत्री सिरसा ने कहा कि ट्रायल के दौरान दिल्ली के उन बाहरी इलाकों में पहले चुना जाएगा जहां वातावरण की स्थिति उपयुक्त हो, जिसमें आर्द्रता और बादलों की न्यूनतम मात्रा का होना आवश्यक है। मई में जब दिल्ली में गर्मी और प्रदूषण दोनों का असर अधिक होता है, तब इस कृत्रिम वर्षा का प्रयोग शुरू किया जाएगा। इसके लिए दिल्ली सरकार नागर विमानन महानिदेशालय और आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर काम करेगी।

क्लाउड सीडिंग के लिए विस्तृत योजना तैयार है। क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया बादलों की स्थिति और मौसम के मौजूदा हालातों पर भी निर्भर करेगी। परीक्षण सफल होता है तो भविष्य में इसे और अधिक विस्तार दिया जाएगा। दिल्ली के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इसे स्थायी रूप में लागू किया जा सकेगा।

कृत्रिम बारिश के लिए पांच परीक्षण

दिल्ली में कृत्रिम बारिश के लिए पांच परीक्षण किए जाएंगे और प्रत्येक परीक्षण अलग-अलग दिन होगा। इस दौरान बादलों में रसायन डालने के लिए उड़ानें लगभग एक से डेढ़ घंटे तक की होंगी। परीक्षण संभवतः एक सप्ताह के भीतर किए जा सकते हैं लेकिन यह मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा। ‘‘यदि उपयुक्त मौसम हुआ तो हम एक सप्ताह के भीतर सभी पांच परीक्षण कर सकते हैं। कार्यक्रम बादलों की उपलब्धता पर निर्भर करेगा।’’

परीक्षणों के लिए स्थान अभी तय नहीं

कृत्रिम वर्षा के लिए परीक्षण के लिए स्थान अभी तय नहीं किया गया है। प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारी ने बताया कि IIT कानपुर ही ट्रायल के लिए इलाकों का चयन करेगा। सुरक्षा और हवाई क्षेत्र प्रतिबंधों के कारण लुटियंस दिल्ली या इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास शहर के भीतर परीक्षण नहीं किए जा सकते। यह परीक्षण दिल्ली के बाहरी इलाकों में चलाया जाएगा, जहां मौसम संबंधी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। प्रत्येक परीक्षण के दौरान एक विमान एक से डेढ़ घंटे तक उड़ान भरेगा। कार्यक्रम जल्द तय कर दिया जाएगा तथा पहला परीक्षण मई के अंत या जून तक होने की संभावना है।

First published on: May 16, 2025 12:28 PM

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