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Religion

Sheetala Ashtami 2026: 11 या 12 मार्च, शीतला अष्टमी कब है? जानें सही डेट, पूजा मुहूर्त, महत्व और पौराणिक कथा

Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी कब है, 11 या 12 मार्च? सही तिथि, पूजा मुहूर्त और व्रत का नियम जानना जरूरी है. जानिए, चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व में बासी भोग क्यों चढ़ाया जाता है और सप्तमी से क्या तैयारी होती है? साथ ही पढ़ें महत्व और पौराणिक कथा.

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Written By: Shyamnandan Updated: Feb 27, 2026 19:31
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Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी 2026 को लेकर इस बार तारीख को लेकर संशय बना हुआ है. यह 11 या 12 मार्च में किस दिन व्रत रखा जाएगा, इसे लेकर श्रद्धालु सही जानकारी जानना चाहते हैं. चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला यह पर्व रोग निवारण और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ा है. आइए जानते हैं सही तारीख, पूजा मुहूर्त, सप्तमी का महत्व, बासी भोजन की परंपरा और पौराणिक कथा विस्तार से.

क्या है शीतला अष्टमी की सही तारीख?

हिंदू पंचांग के अनुसार, शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है. वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि 11 मार्च को सुबह 01:54 बजे शुरू होगी. यह तिथि 12 मार्च को सुबह 04:19 बजे समाप्त होगी.

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उदयातिथि के आधार पर व्रत और पूजा 11 मार्च 2026 को की जाएगी. इसलिए शीतला अष्टमी 2026 की सही तिथि 11 मार्च है. यह पर्व सामान्य रूप से होली के आठ दिन बाद आता है. कई स्थानों पर स्थानीय परंपरा के अनुसार इसे होली के बाद पहले सोमवार या शुक्रवार को भी मनाया जाता है.

पूजा मुहूर्त और समय

द्रिक पंचांग के अनुसार, 11 मार्च 2026 को पूजा का शुभ समय सुबह 06:36 बजे से शाम 06:27 बजे तक रहेगा. पूरे दिन में लगभग 11 घंटे 51 मिनट तक पूजा का शुभ काल उपलब्ध रहेगा. भक्त सुबह स्नान के बाद व्रत संकल्प लेते हैं. इसके बाद शीतला माता की विधि-विधान से पूजा की जाती है.

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शीतला सप्तमी का महत्व

अष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी तिथि का विशेष महत्व है. इसी दिन माता के लिए भोग तैयार किया जाता है. साल 2026 में शीतला सप्तमी 10 मार्च को है. इस दिन घर में साफ-सफाई की जाती है. रसोई शुद्ध की जाती है. सप्तमी के दिन खीर, पूड़ी और अन्य पकवान बनाकर रखे जाते हैं. यही भोजन अगले दिन माता को अर्पित किया जाता है.

क्यों चढ़ाया जाता है बासी भोजन?

शीतला अष्टमी की सबसे अलग परंपरा है बासी भोजन का भोग. सप्तमी को तैयार किया गया भोजन अष्टमी के दिन चढ़ाया जाता है. इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता. ताजा भोजन बनाने की मनाही रहती है. भोग में गुड़ और चावल की खीर विशेष मानी जाती है. कई जगह गन्ने के रस से भी खीर बनाई जाती है. मान्यता है कि माता शीतला को ठंडा और बासी भोजन प्रिय है. यह परंपरा शीतलता, संयम और अनुशासन का प्रतीक मानी जाती है.

व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक विश्वास के अनुसार, माता शीतला रोगों से रक्षा करती हैं. विशेष रूप से त्वचा और संक्रमण से जुड़ी बीमारियों से बचाव की कामना की जाती है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ा माना जाता है. पूजा के साथ घर की सफाई और शुद्धता पर भी जोर दिया जाता है. व्रत रखने से भय, दुख और कष्ट दूर होते हैं. परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है, ऐसी मान्यता है.

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कैसे करें पूजा?

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें. साफ वस्त्र धारण करें.
माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. उन्हें जल, रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें.
सप्तमी को बनाया गया बासी भोग अर्पित करें. कथा सुनें या पढ़ें.
इसके बाद प्रसाद परिवार में बांटें. दिनभर सात्विक आचरण रखें.

इन राज्यों में अधिक लोकप्रिय है यह पर्व

यह पर्व खास तौर पर गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में व्यापक रूप से मनाया जाता है. कई गांवों में सामूहिक पूजा होती है. महिलाएं विशेष रूप से इस व्रत को करती हैं. स्थानीय परंपराएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन अष्टमी तिथि और बासी भोग की मान्यता समान रहती है.

शीतला अष्टमी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक वृद्ध महिला और उसकी दो बहुओं ने शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा. दोनों बहुओं ने नियम के अनुसार एक दिन पहले बासी भोग तैयार किया. उनके छोटे बच्चे थे. उन्हें चिंता हुई कि बासी भोजन से बच्चों को हानि न हो जाए.

इसलिए उन्होंने बच्चों के लिए ताजा भोजन बना दिया. जब शीतला माता की पूजा के बाद वे घर लौटीं, तो देखा कि उनके दोनों बच्चे मृत पड़े हैं. सास ने कहा कि यह माता को नाराज करने का परिणाम है. उसने दोनों को कहा कि जब तक बच्चे जीवित न हों, घर मत लौटना.

दोनों बहुएं बच्चों को लेकर भटकने लगीं. रास्ते में एक पेड़ के नीचे दो बहनें मिलीं. उनके नाम ओरी और शीतला थे. वे गंदगी और जूं से परेशान थीं. बहुओं ने उनकी सफाई की और सेवा की. प्रसन्न होकर दोनों बहनों ने आशीर्वाद दिया. तब बहुओं ने अपना दुख बताया.

तभी शीतला माता प्रकट हुईं. उन्होंने अष्टमी व्रत का महत्व समझाया. बहुओं ने क्षमा मांगी और भविष्य में नियम पालन का वचन दिया. माता प्रसन्न हुईं और दोनों बच्चों को पुनर्जीवित कर दिया.

यह कथा व्रत के नियम और श्रद्धा के महत्व को दर्शाती है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Feb 27, 2026 07:31 PM

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