Rath Yatra 2025: देवस्नान के बाद बीमार हुए महाप्रभु जगन्नाथ, 14 दिनों तक चलेगी उनकी यह 'ज्वरलीला'

Rath Yatra 2025: आज ज्येष्ठ पूर्णिमा के शुभ अवसर पर पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का पवित्र कलशों के शीतल से स्नान कराया गया। इस देवस्नान के बाद महाप्रभु जगन्नाथ अस्वस्थ यानी बीमार हो गए हैं। उन्हें दिव्य काढ़ा और औषधि दी जाएगी। महाप्रभु की यह ज्वरलीला 14 दिनों तक चलेगी।

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Rath Yatra 2025: ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को “देवस्नान पूर्णिमा” या “स्नान यात्रा” भी कहा जाता है, जो कि आज यानी 11 जून, 2025 को है। इसका संबंध सीधे तौर पर ओडिशा के पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा से जुड़ा। इस दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जीऔर सुभद्रा जी को सिंहासन से बाहर लाया जाता है और स्नान करवाया जाता है।

ऐसे संपन्न हुआ महाप्रभु का स्नान

महाप्रभु जगन्नाथ को मंदिर के स्नान मंड पर लाकर 108 कलशों से शीतल जल से स्नान अच्छी तरह से स्नानं कराया गया। इसके लिए स्नान जल को विशेष रूप से मंदिर के पवित्र स्रोत एक कुएं से से लाया गया। ये 108 कलशों में भरा गया और उसमें सुगंधि मिलाई गई। फिर इस शीतल जल को भगवान पर धीमे-धीमे डाला गया।

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आपको बता दें कि पूरे साल में यह पहला अवसर होता है, जब भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्री मंदिर में भक्तों और श्रद्धालुओं के सामने स्नान करते हैं। जलाभिषेक के बाद भगवान को गजवेश यानी हाथी का रूप में सजाया जाता है। इसे हाथी वेश भी कहते हैं।

इसलिए बीमार हो जाते हैं महाप्रभु

चूंकि यह स्नान पूर्णिमा को होता है, इसलिए इसे स्नान पूर्णिमा, महा स्नान या देवस्नान कहते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के कुएं से कलशों में लाया गया जल इतना शीतल होता है कि महाप्रभु जगन्नाथ ठंड से कांपने लगते हैं। और, इसके बाद उनको बदन तेज बुखार से तपने लगता है। इसके बाद भगवान 14 दिन तक अलक्षित रहते हैं यानी भक्त उन्हें नहीं देख सकते है। ज्वर होने के कारण भगवान एकांतवास भेजा दिया जाता है, जिसे ‘अनवसर वास’ कहते हैं। इस 14 दिन की अवधि को महाप्रभु जगन्नाथ की ज्वरलीला भी कही जाती है।

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अनवसर वास में क्या होता है?

एकांतवास यानी अनवसर वास में भगवान को विश्राम दिया जाता है, ठीक वैसे जैसे किसी बीमार व्यक्ति को दिया जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को केवल श्वेत सूती वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनके सभी आभूषण भी हटा दिए जाते हैं। फिर विशेष वैद्यों की निगरानी में उनके लिए विशेष औषधीय काढ़ा और प्रसाद बनाया जाता है, जो उनके सर्दी-जुकाम और ज्वर को समाप्त कर सके। जड़ी-बूटियों से बने विशेष प्रसाद (भोजन) को पंचकव्य आदि से तैयार किया जाता है।

महाप्रभु के स्वस्थ होने पर होगा नेत्र उत्सव

जगन्नाथ मंदिर के पुजारी बताते हैं कि मंदिर में स्थित सोने की ईंट वाले जिस कुएं के जल से महाप्रभु जगन्नाथ जो स्नान कराया जाता है, उसमें सभी तीर्थों का जल होता है। अनवसर वास की अवधि खत्म होने पर 25 जून को भगवान के विग्रह को फिर सजाया जाएगा। उन्हें नए नेत्र प्रदान किए जाते हैं और भलीभाँति काजल लगाया जाता है। इसके बाद वे भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे महाप्रभु का नेत्र दर्शन उत्सव कहा जाता है। इसके बाद 26 जून को भगवान के नवयौवन दर्शन होंगे, जिसमें भक्त उन्हें उनके युवा स्वरूप में दर्शन करेंगे और रथ यात्रा के लिए अनुमति ली जाएगी। इसके अगले दिन, 27 जून की सुबह भगवान की रथ यात्रा गुंडिचा मंदिर के लिए आरंभ होगी।

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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