Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का अत्यंत पवित्र त्योहार है. 2026 में यह 15 फरवरी, रविवार को मनाई जाएगी. यह रात 'भगवान शिव की महान रात' मानी जाती है. शिव पुराण में कहा गया है कि इसी दिन शिव ने अपनी अनंत ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होकर संसार को ज्ञान दिया था. शिव केवल एक देव नहीं, बल्कि ध्यान, योग और गहन आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं. उनके अनेक प्रतीक हैं, जिनके अद्भुत अर्थ जीवन में गहरा संदेश देते हैं. आइए इस शुभ मौके पर जानते हैं, त्रिशूल, डमरू तीसरी आंख, नाग, चांद और नंदी जैसे शिव प्रतीकों के आध्यात्मिक अर्थ और रहस्य क्या हैं?
त्रिशूल का रहस्य
त्रिशूल शिव का प्रमुख अस्त्र है. इस त्रिशूल के तीन तिनके सत, रज और तम गुणों का संतुलन दिखाते हैं. जीवन के तीन पहलू—भूत, वर्तमान और भविष्य—इसी त्रिशूल में संगठित हैं. यह शरीर की तीन नाड़ियों—इडा, पिंगला और सुषुम्ना—का साम्य भी दर्शाता है. त्रिशूल हमें संतुलन और नियंत्रण की सीख देता है.
शिव की तीसरी आंख का ज्ञान
शिव की माथे पर स्थित तीसरी आंख ज्ञान का सर्वोच्च प्रतीक है. यह आंख अज्ञानता, बुराई और भ्रम का विनाश करती है. जब साधक अंतर्मुखी ध्यान में लीन होता है, तब यह आंख खुलती है. यह हमें चेतना की गहराई और विवेक की शक्ति का संदेश देती है.
नाग और कुण्डलिनी शक्ति
शिव के गले में लिपटा नाग सिर्फ अलंकार नहीं है, यह कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है. नाग चेतना की जागृति, अहंकार से ऊपर उठने और सांसारिक बन्धनों से मुक्ति का संकेत देता है. शिव का गला विष ग्रहण करने के बाद भी शांत और स्थिर दिखता है. यह दर्शाता है कि नकारात्मकता को भी अपने नियंत्रण में रखना संभव है.
चांद और समय नियंत्रण
शिव के जटाओं पर विराजमान अर्धचंद्र समय का सूचक है. चंद्र का अर्थ है मन की शांति, तरलता और चंचलता में संतुलन. यह संकेत करता है कि समय पर नियंत्रण, मन की एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं.
यह भी पढ़ें: Lucky Gemstone: लहसुनिया रत्न पहनने के फायदे क्या हैं, किन राशियों के लिए है लकी, जानें विस्तार से
नंदी – समर्पण का प्रतीक
नंदी शिव का वाहन ही नहीं, वह उनके परम भक्त भी हैं. नंदी समर्पण, धैर्य, शक्ति और अडिग भक्ति का संदेश देते हैं. यह हमें बताता है कि सेवा और समर्पण के बिना साधना अधूरी है.
डमरू – सृजन की ध्वनि
डमरू शिव की सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक है. यह नाद ब्रह्म और जीवन के आरंभ का संकेत बताती है. यही ध्वनि पर vibrations जीवन को गति देती है.
भस्म और मुण्डमाला
शिव का अपनाया हुआ भस्म जीवन के क्षणभंगुरता और वैराग्य का स्मरण कराता है. मुण्डमाला मृत्यु के सत्य को याद दिलाती है ताकि जीवन की गहनता को समझा जा सके.
इस प्रकार भगवान शिव के ये प्रतीक केवल रूप नहीं, बल्कि हमारे जीवन को नियंत्रित, संतुलित और गहनता से जीने के मार्ग का सन्देश देते हैं. यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इनकी अलग से पूजा की जाती है.
यह भी पढ़ें: Chanakya Niti: आंखें होते हुए भी अंधे क्यों होते हैं लोग, आचार्य चाणक्य से जानें जीवन का एक कड़वा सच
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का अत्यंत पवित्र त्योहार है. 2026 में यह 15 फरवरी, रविवार को मनाई जाएगी. यह रात ‘भगवान शिव की महान रात’ मानी जाती है. शिव पुराण में कहा गया है कि इसी दिन शिव ने अपनी अनंत ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होकर संसार को ज्ञान दिया था. शिव केवल एक देव नहीं, बल्कि ध्यान, योग और गहन आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं. उनके अनेक प्रतीक हैं, जिनके अद्भुत अर्थ जीवन में गहरा संदेश देते हैं. आइए इस शुभ मौके पर जानते हैं, त्रिशूल, डमरू तीसरी आंख, नाग, चांद और नंदी जैसे शिव प्रतीकों के आध्यात्मिक अर्थ और रहस्य क्या हैं?
त्रिशूल का रहस्य
त्रिशूल शिव का प्रमुख अस्त्र है. इस त्रिशूल के तीन तिनके सत, रज और तम गुणों का संतुलन दिखाते हैं. जीवन के तीन पहलू—भूत, वर्तमान और भविष्य—इसी त्रिशूल में संगठित हैं. यह शरीर की तीन नाड़ियों—इडा, पिंगला और सुषुम्ना—का साम्य भी दर्शाता है. त्रिशूल हमें संतुलन और नियंत्रण की सीख देता है.
शिव की तीसरी आंख का ज्ञान
शिव की माथे पर स्थित तीसरी आंख ज्ञान का सर्वोच्च प्रतीक है. यह आंख अज्ञानता, बुराई और भ्रम का विनाश करती है. जब साधक अंतर्मुखी ध्यान में लीन होता है, तब यह आंख खुलती है. यह हमें चेतना की गहराई और विवेक की शक्ति का संदेश देती है.
नाग और कुण्डलिनी शक्ति
शिव के गले में लिपटा नाग सिर्फ अलंकार नहीं है, यह कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है. नाग चेतना की जागृति, अहंकार से ऊपर उठने और सांसारिक बन्धनों से मुक्ति का संकेत देता है. शिव का गला विष ग्रहण करने के बाद भी शांत और स्थिर दिखता है. यह दर्शाता है कि नकारात्मकता को भी अपने नियंत्रण में रखना संभव है.
चांद और समय नियंत्रण
शिव के जटाओं पर विराजमान अर्धचंद्र समय का सूचक है. चंद्र का अर्थ है मन की शांति, तरलता और चंचलता में संतुलन. यह संकेत करता है कि समय पर नियंत्रण, मन की एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं.
यह भी पढ़ें: Lucky Gemstone: लहसुनिया रत्न पहनने के फायदे क्या हैं, किन राशियों के लिए है लकी, जानें विस्तार से
नंदी – समर्पण का प्रतीक
नंदी शिव का वाहन ही नहीं, वह उनके परम भक्त भी हैं. नंदी समर्पण, धैर्य, शक्ति और अडिग भक्ति का संदेश देते हैं. यह हमें बताता है कि सेवा और समर्पण के बिना साधना अधूरी है.
डमरू – सृजन की ध्वनि
डमरू शिव की सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक है. यह नाद ब्रह्म और जीवन के आरंभ का संकेत बताती है. यही ध्वनि पर vibrations जीवन को गति देती है.
भस्म और मुण्डमाला
शिव का अपनाया हुआ भस्म जीवन के क्षणभंगुरता और वैराग्य का स्मरण कराता है. मुण्डमाला मृत्यु के सत्य को याद दिलाती है ताकि जीवन की गहनता को समझा जा सके.
इस प्रकार भगवान शिव के ये प्रतीक केवल रूप नहीं, बल्कि हमारे जीवन को नियंत्रित, संतुलित और गहनता से जीने के मार्ग का सन्देश देते हैं. यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इनकी अलग से पूजा की जाती है.
यह भी पढ़ें: Chanakya Niti: आंखें होते हुए भी अंधे क्यों होते हैं लोग, आचार्य चाणक्य से जानें जीवन का एक कड़वा सच
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.