Magh Gupt Navratri 2026: आज जनवरी माह की 23 तारीख है और आज माघ गुप्त नवरात्रि का पांचवां दिन है. आज का दिन विशेष रूप से पांचवीं महाविद्या और शक्ति की साधना के लिए महत्वपूर्ण है. आज 10 महाविद्याओं में से पांचवीं महाविद्या मां छिन्नमस्ता की गुप्त साधना की जाती है. वहीं, सामान्य रूप से इस दिन दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की भी पूजा का विधान है. आइए जानते हैं, मां छिन्नमस्ता कौन हैं, महत्व क्या है और किन मंत्रों से उनकी आराधना करें?
मां छिन्नमस्ता कौन हैं?
मां छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में से एक हैं. वे हिंदू धर्म में मां दुर्गा का एक बहुत शक्तिशाली और उग्र रूप मानी जाती हैं. उन्हें प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है उनका नाम 'छिन्नमस्ता' है, जिसका अर्थ होता है- 'जिसका सिर कटा हुआ हो.'
मां छिन्नमस्ता के एक हाथ में उनका अपना कटा हुआ सिर होता है और दूसरे हाथ में तलवार होती है. उनका यह रूप हमें यह सिखाता है कि इंसान को अपने अहंकार, इच्छाओं और लालसाओं का त्याग करना चाहिए.
मां छिन्नमस्ता का महत्व
मां छिन्नमस्ता तंत्र साधना में छठी महाविद्या मानी जाती हैं. वे काली कुल से जुड़ी हुई देवी हैं. उन्हें ऐसी देवी माना जाता है जो भक्तों की परेशानियाँ और चिंताएँ दूर करती हैं और उनकी मनचाही इच्छाएं पूरी करती हैं. इसी कारण उन्हें चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है. मां छिन्नमस्ता की साधना बहुत गुप्त और उग्र मानी जाती है. यह साधना आसान नहीं होती, लेकिन जो साधक सही विधि और श्रद्धा से इसे करता है, उसे विशेष और अद्भुत शक्तियां प्राप्त होती हैं.
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ऐसे हुई मां छिन्नमस्ता की उत्पत्ति
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी पार्वती अपनी दो सहचरियों डाकिनी और शाकिनी के साथ बहुत देर से मंदाकिनी नदी में स्नान में लीन थीं. इसी बीच उनकी सहचरियों को भूख लग गई और उन्होंने मां पार्वती से भोजन मांगा और कहा- 'भूख से व्याकुल सहचरियों ने कहा कि मां तो बच्चों के लिए रक्त तक दे देती है, पर आप हमारी भूख नहीं मिटा रहीं.' यह सुनकर देवी पार्वती क्रोधित हो गईं. अपने खड्ग से अपना ही सिर धड़ से अलग कर दिया. जैसे ही सिर अलग हुआ, तीन रक्तधाराएं प्रवाहित हुईं, जिससे दोनों से सहचरियों की भूख शांत हुई और तीसरी रक्त-धारा से खुद को भी तृप्त किया. इसके बाद से मां पार्वती का यह रूप 'मां छिन्नमस्ता' के रूप में पूजित हुआ.
मां छिन्नमस्ता साधना मंत्र
छिन्नमस्ता बीज मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा.
यह मंत्र अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है और शत्रुओं पर विजय, व्यापारिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य और कठिन कार्यों की सफलता के लिए जपा जाता है.
छिन्नमस्ता गायत्री मंत्र
ॐ वैरोचन्यै विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्.
यह मंत्र मन को शान्त करने, बुद्धि और ज्ञान बढ़ाने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए जपा जाता है.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
Magh Gupt Navratri 2026: आज जनवरी माह की 23 तारीख है और आज माघ गुप्त नवरात्रि का पांचवां दिन है. आज का दिन विशेष रूप से पांचवीं महाविद्या और शक्ति की साधना के लिए महत्वपूर्ण है. आज 10 महाविद्याओं में से पांचवीं महाविद्या मां छिन्नमस्ता की गुप्त साधना की जाती है. वहीं, सामान्य रूप से इस दिन दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की भी पूजा का विधान है. आइए जानते हैं, मां छिन्नमस्ता कौन हैं, महत्व क्या है और किन मंत्रों से उनकी आराधना करें?
मां छिन्नमस्ता कौन हैं?
मां छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में से एक हैं. वे हिंदू धर्म में मां दुर्गा का एक बहुत शक्तिशाली और उग्र रूप मानी जाती हैं. उन्हें प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है उनका नाम ‘छिन्नमस्ता’ है, जिसका अर्थ होता है- ‘जिसका सिर कटा हुआ हो.’
मां छिन्नमस्ता के एक हाथ में उनका अपना कटा हुआ सिर होता है और दूसरे हाथ में तलवार होती है. उनका यह रूप हमें यह सिखाता है कि इंसान को अपने अहंकार, इच्छाओं और लालसाओं का त्याग करना चाहिए.
मां छिन्नमस्ता का महत्व
मां छिन्नमस्ता तंत्र साधना में छठी महाविद्या मानी जाती हैं. वे काली कुल से जुड़ी हुई देवी हैं. उन्हें ऐसी देवी माना जाता है जो भक्तों की परेशानियाँ और चिंताएँ दूर करती हैं और उनकी मनचाही इच्छाएं पूरी करती हैं. इसी कारण उन्हें चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है. मां छिन्नमस्ता की साधना बहुत गुप्त और उग्र मानी जाती है. यह साधना आसान नहीं होती, लेकिन जो साधक सही विधि और श्रद्धा से इसे करता है, उसे विशेष और अद्भुत शक्तियां प्राप्त होती हैं.
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ऐसे हुई मां छिन्नमस्ता की उत्पत्ति
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी पार्वती अपनी दो सहचरियों डाकिनी और शाकिनी के साथ बहुत देर से मंदाकिनी नदी में स्नान में लीन थीं. इसी बीच उनकी सहचरियों को भूख लग गई और उन्होंने मां पार्वती से भोजन मांगा और कहा- ‘भूख से व्याकुल सहचरियों ने कहा कि मां तो बच्चों के लिए रक्त तक दे देती है, पर आप हमारी भूख नहीं मिटा रहीं.’ यह सुनकर देवी पार्वती क्रोधित हो गईं. अपने खड्ग से अपना ही सिर धड़ से अलग कर दिया. जैसे ही सिर अलग हुआ, तीन रक्तधाराएं प्रवाहित हुईं, जिससे दोनों से सहचरियों की भूख शांत हुई और तीसरी रक्त-धारा से खुद को भी तृप्त किया. इसके बाद से मां पार्वती का यह रूप ‘मां छिन्नमस्ता’ के रूप में पूजित हुआ.
मां छिन्नमस्ता साधना मंत्र
छिन्नमस्ता बीज मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा.
यह मंत्र अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है और शत्रुओं पर विजय, व्यापारिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य और कठिन कार्यों की सफलता के लिए जपा जाता है.
छिन्नमस्ता गायत्री मंत्र
ॐ वैरोचन्यै विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्.
यह मंत्र मन को शान्त करने, बुद्धि और ज्ञान बढ़ाने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए जपा जाता है.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.