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Holi 2026: 300 सालों से इन 2 गांव में बंद है रंग-गुलाल, होली के दिन नहीं पड़ती है ढोल-नगाड़ों पर थाप, वजह कर देगी हैरान

Holi 2026: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के खुरजान और क्विली गांवों में होली के दिन 300 सालों से होली पर सन्नाटा रहता है.आइए जानते हैं कि इन 2 गांवों मे इस मौके पर क्यों नहीं बजते ढोल-नगाड़े और क्यों नहीं खेलते हैं लोग रंग-गुलाल? वजह, जानकर आप भी सोच में पड़ जाएंगे.

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Holi 2026: जब पूरे देश में होली हर्ष और रंगों के साथ मनाई जाती है.लोग ढोल-नगाड़ों पर थिरकते हैं और रंग-गुलाल खेलते हैं.लेकिन उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में खुरजान और क्विली नाम के दो छोटे गांव हैं, जहां इससे बचे रहने की शत-प्रतिशत कोशिश होती है.वाकई में इन दो गांवों में होली के दिन भी सन्नाटा रहता है.गलियों में न रंग दिखते हैं और न ही ढोल की थाप सुनाई देती है.इसकी वजह भी काफी हैरान करने वाली है.

मां त्रिपुरा सुंदरी की नाराजगी का डर

गांव के लोग मानते हैं कि उनकी इष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी शोर-शराबा और चमकीले रंगों को पसंद नहीं करतीं.उनका विश्वास है कि अगर होली का उत्सव धूमधाम से मनाया गया, तो देवी की शांति भंग हो सकती है.यह डर पीढ़ियों से चलता आ रहा है.यही वजह है कि यहां के लोग होली के दिन केवल देवी की पूजा करते हैं, लेकिन रंगों का प्रयोग नहीं करते।

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होली पर भारी पड़ी महामारी

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा 150 से 300 साल पुरानी है.एक समय ऐसा भी आया जब गांव वालों ने पुरानी मान्यताओं को नजरअंदाज कर होली बड़ी धूमधाम से मनाई.इसके कुछ समय बाद गांव में हैजा जैसी महामारी फैल गई.कई परिवार बर्बाद हो गए और लोगों की जान चली गई.तब से गांव वालों ने इसे देवी का प्रकोप माना और तय किया कि अब कभी होली का शोर-गुलाल नहीं होगा।

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आज भी बनी हुई आस्था

आधुनिकता के बावजूद खुरजान और क्विली के लोग इस परंपरा पर अडिग हैं.होली के दिन वे विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन रंगों का प्रयोग सपने में भी नहीं करते.नई पीढ़ी भी इस मान्यता का सम्मान करती है और जानती है कि देवी की कृपा और गांव की खुशहाली उनके लिए सबसे बड़ा त्यौहार है।

अलग मायने रखती है इनकी होली

ये गांव त्योहारों के विभिन्न रूपों का उदाहरण हैं.जहां देशभर में होली उत्सव और रंगों का प्रतीक है, वहीं यहां यह आत्मसंयम और आस्था का प्रतीक बन गई है.आसपास के क्षेत्र में होली धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन खुरजान और क्विली में कदम रखते ही शांति का अनुभव होता है.यह परंपरा दर्शाती है कि हिमालय की गोद में बसे इन गांवों के लिए आस्था ही सबसे बड़ा नियम है।

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First published on: Feb 25, 2026 06:56 PM

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Shyamnandan

श्यामनंदन पिछले 20 से अधिक वर्षों से पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में सक्रिय हैं। वर्तमान में वे News24 में धर्म और ज्योतिष सेक्शन के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जहां उनकी कोशिश रहती है कि पाठकों को सटीक, सरल और उपयोगी जानकारी मिल सके। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से पत्रकारिता में एम.ए. की पढ़ाई की है और भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से ज्योतिष का सांगोपांग अध्ययन किया है। वे इस क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता रखते हैं और स्वयं एक प्रगतिशील ज्योतिषविद हैं, जो साल 2015 से धर्म और ज्योतिष विषय पर लगातार लिख रहे हैं। धार्मिक परंपराओं, वैदिक ज्योतिष, ग्रह-गोचर, राशिफल, अंक ज्योतिष, वास्तु, सामुद्रिक शास्त्र, व्रत-त्योहार, पूजा-पद्धति और आध्यात्मिक विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पहचान है। डिजिटल मीडिया, SEO और कंटेंट रणनीति की उन्हें गहरी और अच्छी समझ है।

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