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हिमालय, जिसे दुनिया की छत कहा जाता है और पूरे एशिया में इसका ही पानी बहता है, लेकिन आज हिमालय का अस्तित्व एक गहरे संकट से जूझ रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय की वो बर्फीली चोटियां भी झुलस चुकी हैं जो सदियों से एशिया की 200 करोड़ से ज्यादा की आबादी के लिए जीवनदायी बनी हुई थीं. म्यांमार से अफगानिस्तान तक फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला अब अपनी बर्फ की सफेद चादर खो रही है. बर्फबारी में आई यह रिकॉर्ड गिरावट केवल एक पर्यावरण मुद्दा नहीं है बल्कि यह करोड़ों लोगों के भविष्य, उनकी खेती और उनकी प्यास पर भी मंडरा रहा एक खतरा है.
डराने वाली है ICIMOD की स्नो अपडेट 2026 की रिपोर्ट

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इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की स्नो अपडेट 2026 की रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं. इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में इस बार बर्फ का कवर औसत से 27.8 प्रतिशत कम रहा है. पिछले दो दशकों में यह सबसे निचला स्तर है.
क्या होती है स्नो परसिस्टेंस

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वैज्ञानिकों के लिए स्नो परसिस्टेंस यानी बर्फ के जमीन पर टिके रहने का समय, पहाड़ों के स्वास्थ्य का बैरोमीटर होती है. जब यह अवधि इतनी तेजी से घटती है तो इसका मतलब है कि हिमालय अपना सुरक्षा कवच खो रहा है. यह सिर्फ एक साल का आंकड़ा नहीं हैं बल्कि लगातार चौथी सर्दी है जब बर्फबारी में ऐसी कमी देखी गई है.
ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार लगातार बढ़ रही

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उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा नदी का मुख्य स्त्रोत है, इस जलवायु त्रासदी का सबसे बड़ा गवाह है. इसके पिघलने की रफ्तार पिछले दो दशकों में दोगुनी हो गई है. 1940 के दशक से अब तक गंगोत्री 1700 मीटर तक पीछे हट चुका है और हर साल यह लगभग 28 से 30 मीटर की दर से सिमट रहा है.
गंगा नदी का मुख्य स्त्रोत सूख रहा

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गंगा भारत की जीवनरेखा है और अगर उसका मुख्य स्त्रोत इस गति से सूखता रहा, तो आने वाले समय में उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में पानी का गंभीर संकट पैदा हो सकता है. गंगोत्री का इस तरह सिमटना उस बड़े खतरे की आहट है जो धीरे-धीरे हमारे जल-तंत्र को खत्म कर रहा है.
हिमालय से निकलने वाली नदियां यहीं से लेती हैं पानी

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हिमालयी बर्फ केवल सुंदरता का केंद्र नहीं, बल्कि यह एक 'स्लो रिलीज वॉटर बैंक' है. हिमालय से निकलने वाली 12 प्रमुख नदियां इसी बैंक से साल भर पानी प्राप्त करती हैं. इन नदियों के सालाना जल प्रवाह का लगभग एक चौथाई हिस्सा बर्फ के पिघलने से आता है. यह पानी खेतों की सिंचाई करता है, हाईड्रोपावर प्लांट चलाता है और काबुल से लेकर कोलकाता तक के करोड़ों लोगों की प्यास बुझाता है.
क्या 80 प्रतिशत ग्लेशियर बन जाएंगे इतिहास

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इसके अलावा वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि ग्लोबल तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर गई तो इस सदी के अंत तक 80 प्रतिशत ग्लेशियर इतिहास बन जाएंगे.
पूरे एशिया में बर्फबारी में असमान गिरावट

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पूरे एशिया में बर्फबारी में आई यह गिरावट असमान है, जिससे कुछ क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. मेकांग बेसिन में सामान्य से 59.5 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो चीन से लेकर थाईलैंड और कम्बोडिया तक के लिए भी खतरे की घंटी है. तिब्बती पठार, जहां से सिंधु, ब्रह्मपुत्र और यांग्त्जी जैसी प्रमुख नदियां निकलती हैं वहां, 47.4 प्रतिशत बर्फ कम हुई है.