कोरोना-निपाह हो या शिलेगा... केरल में ही क्यों सामने आते हैं खतरनाक वायरस के केस? वजह चौंका देगी

भारत में जब भी कोई नया और घातक वायरस दस्तक देता है तो अक्सर उनका पहला मामला केरल राज्य से ही सामने आता है. कोरोना महामारी से लेकर निपाह, शिगेला, मंकीपॉक्स जैसे संक्रमणों की शुरुआत हमेशा सबसे पहले केरल में ही देखने को मिलती है. हाल ही में राज्य में निपाह वायरस का प्रकोप भी देखने को मिल रहा है. इसके साथ ही शिगेला इंफेक्शन के कारण एक बच्चे की जान भी चली गई है.

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लोगों के मन में उठता केरल को लेकर सवाल

लोगों के मन में उठता केरल को लेकर सवाल2 / 8

इस स्थिति को देखते हुए हर किसी के मन में ये सवाल उठता है कि आखिर बार-बार केरल ही इन संक्रामक बीमारियों का घर बनता है और हर बीमारी केरल से ही क्यों भारत में अपनी एंट्री करती है. इसके पीछे वहां की भौगोलिक स्थिति, आबादी का ढांचा और स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़े हुए कई महत्वपूर्ण कारण जिम्मेदार होते हैं, जिन्हें आज हम इस खबर में समझने की कोशिश करेंगे.

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ताड़ी और दूषित फलों का सेवन मुसीबत

ताड़ी और दूषित फलों का सेवन मुसीबत 3 / 8

केरल के ग्रामीण इलाकों में आज भी पेड़ों से निकलने वाली ताड़ी और ताजे फलों का सेवन करने का चलन बहुत ज्यादा है. जंगलों के करीब होने के कारण चमगागड़ अक्सर इन फलों या ताड़ी के बर्तनों पर बैठते हैं और अपनी लार या मल-मूत्र उसमें गिरा कर उसे दूषित कर देते हैं. जब स्थानीय लोग अनजाने में ऐसे संक्रमित फलों या ताड़ी का इस्तेमाल करते हैं तो निपाह जैसे जानलेवा वायरस की सीधे उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है. इस तरह का सीधा संपर्क इंसानों में जूनोटिक यानी जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के फैसले एक जरिया है. यह भी पढ़ें- केरल में मिला निपाह वायरस का नया केस, क्वारंटाइन किए गए 15 लोग; जानें कितना खतरनाक है संक्रमण?

जंगलों की कटाई और वन्यजीवों से संपर्क

जंगलों की कटाई और वन्यजीवों से संपर्क4 / 8

केरल का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी घाट के घने जंगलों से घिरा हुआ है, जो प्राकृतिक रूप से फ्रूट बैट्स यानी फल खाने वाले चमगादड़ों का मुख्य घर है. पिछले कुछ सालों से राज्य में विकास और शहरीकरण की रफ्तार बहुत तेज हो गई है, जिसके कारण वहां पर जंगलों को लगातार काटा जा रहा है. जब इन चमगादड़ों के रहने के ठिकाने लगातार नष्ट और बर्बाद हो रहे हैं तो उन्होंने इंसानी बस्तियों के आस-पास अपना नया डेरा बसा लिया है. इस बदलाव के कारण अब इंसानों और जंगली जीवों के बीच की दूरी भी बेहद कम हो गई है और यही कारण है कि जानवरों में पनपने वाले वायरस सीधा इंसानी आबादी के बीच पहुंच चुका है.

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केरल की घनी आबादी

केरल की घनी आबादी 5 / 8

केरल में जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है. इसका मतलब ये है कि यहां बहुत ही कम दायरे में बहुत ज्यादा लोग एकसाथ मिलकर रहते हैं. घनी आबादी होने का सबसे बड़ा नुकसान यह भी होता है कि जब भी कोई नया संक्रामक वायरस किसी एक व्यक्ति को अपना शिकार बनाता है, तो वह बहुत ही कम समय में दूसरों तक पहुंच जाता है. सामाजिक और पारिवारिक रूप से बेहद जुड़े होने के कारण भी यहां एक मरीज की देखभाल करने वाले घर के लोगों या डॉक्टरों में वायरस का प्रसार बहुत तेजी से देखने को मिलता है.

उत्तरी केरल के इलाकों में निपाह दे रहा बार-बार दस्तक

उत्तरी केरल के इलाकों में निपाह दे रहा बार-बार दस्तक6 / 8

केरल के निपाह वायरस किसी भयानक त्रासदी से कम नहीं है. केरल में निपाह वायरस की एंट्री बाहर से नहीं होती हैं बल्कि यहीं के जंगलों में निपाह पनपता है. राज्य में अब तक निपाह के कुल 4 प्रकोप देखे जा चुके हैं. जिनमें से 3 बार यह संक्रमण कोझिकोड और मलप्पुरम जैसे उत्तरी केरल के खास जिलों में ही फैला है.

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कोरोना महामारी ने दी थी केरल से ही दस्तक

कोरोना महामारी ने दी थी केरल से ही दस्तक7 / 8

वैश्विक यात्रा के नेटवर्क का नतीजा था कि भारत में सदी की सबसे बड़ी महामारी कोरोना का पहला मामला भी केरल में ही दर्ज किया गया था. साल 2020 की 27 जनवरी को चीन की वुहान यूनिवर्सिटी से पढ़कर लौटी एक 20 साल की छात्रा में इस वायरस की पुष्टि हुई थी, जो केरल के त्रिशूर के एक अस्पताल में भर्ती थी. इस घटना से साफ हो जाता है कि दुनिया के किसी भी कोने में फैलने वाला नया वायरस अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के जरिए सबसे पहले केरल ही पहुंचता है.

केरल में पारदर्शिता और लोगों में सजगता

केरल में पारदर्शिता और लोगों में सजगता8 / 8

वहीं, अगर हम किसी और दूसरे राज्य जैसे बिहार, यूपी की बात करें तो वहां कमजोर निगरानी तंत्र के कारण कोई भी वायरस हफ्तों तक लोगों के बीच घूम सकता है लेकिन केरल में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार बेहद पारदर्शी तरीके से हर एक संदिग्ध मामले की तुरंत रिपोर्टिंग की जाती है. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि केरल में बीमारियां ज्यादा हैं, बल्कि इसका सीधा सा मतलब यह है कि केरल के पास नए संक्रमणों को समय रहते पहचानने के लिए देश में सबसे बेहतर और सजग तंत्र मौजूद हैं.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

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वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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