Hearing Loss: हियरिंग लॉस यानी सुनने की क्षमता में कमी को अक्सर लोग उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. कई लोग तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक समस्या काफी गंभीर न हो जाए. हालांकि, इसको लेकर हुए एक शोध में बताया गया है कि कम सुनाई देने का असर कानों के साथ-साथ दिमाग और याददाश्त पर भी पड़ता है. लेकर डॉक्टर राजेश भारद्वाज (जो मेड फर्स्ट ईएनटी सेंटर में ईएनटी विशेषज्ञ एवं सलाहकार हैं) का कहना है कि जब किसी इंसान की सोचने की क्षमता कम होने लगती है तो दिमाग को आवाज और शब्दों को समझने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है.इसलिए दिमाग पर असर ज्यादा पड़ने लगता है.
हियरिंग लॉस की समस्या

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हियरिंग लॉस से पीड़ित लोग अक्सर लोगों से दूरी बनाने लगते हैं क्योंकि उन्हें बातचीत समझने में परेशानी होती है. धीरे-धीरे वे परिवार, दोस्तों और सामाजिक कार्यक्रमों में कम भाग लेने लगते हैं.
सामाजिक अलगाव महसूस करना

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इस बीमारी में लोगों को सामाजिक अलगाव महसूस होने लगता है, क्योंकि इंसान बातों को कम समझता है. साथ ही,यह मानसिक उत्तेजना को कम कर सकता है, जो याददाश्त को हेल्दी बनाने का काम करते हैं.
डिमेंशिया से क्या है संबंध?

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कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि हियरिंग लॉस वाले लोगों में डिमेंशिया जैसी बीमारी का खतरा कम हो सकता है. हालांकि, हियरिंग लॉस सीधे डिमेंशिया का कारण हो यह बिल्कुल भी जरूरत नहीं है.
वक्त पर कराएं इलाज

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अगर वक्त पर इस बीमारी का पता लगाकर इलाज कराया जाए तो काफी हद तक परेशानी हल की जा सकती है. अगर किसी इंसान को बातचीत सुनने में परेशानी हो रही है, टीवी की आवाज बार-बार बढ़ानी पड़ती है तो टेस्ट जरूर करवाएं.
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