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फाल्गुन का आगमन होते ही प्रकृति जैसे रंगों का व्याकरण लिखने लगती है। सरसों के खेत पीली आभा से चमक उठते हैं, आम्र-मंजरियों की गंध हवा में फैलती है और कोयल की कूक किसी अंतरंग स्मृति को जगा देती है। वसंत का यह क्रम अंततः होली में अपने पूर्ण रूप में प्रकट होता है— उल्लास, गीत और रंगों के सामूहिक उत्सव के रूप में।

“सदा आनंद रहे यही द्वारे, मोहन खेले होरी हो!” भाषिक दृष्टि से देखें तो ‘होली’ शब्द ‘होलिका’ से व्युत्पन्न है। ‘होलिका’ के अर्थ की कई व्याख्याएँ मिलती हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार होलिका विनाशकारी शक्ति का प्रतीक है, जबकि ‘प्रह्लाद’ विशिष्ट ‘आह्लाद’ का। कथा का संकेत स्पष्ट है— विनाश अंततः आह्लाद और सत्य के सामने टिक नहीं पाता।

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पुराणों में ‘होलिका’ का संबंध ‘होम’ से भी जोड़ा गया है- “सर्वदुष्टापहो होमः सर्वरोगोपशान्तये । क्रियतेऽस्यां द्विजैः पार्थ तेन सा होलिका स्मृता ।।” इसी कारण अग्नि में सेंके गये चने, गेहूँ या यव को ‘होला’ कहा जाने लगा।

एक अन्य पुराणकथा में ‘ढुंढा’ नामक राक्षसी का उल्लेख है। भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से ‘ढुंढा’ को ‘धुंध’ का रूप मानें तो अर्थ और स्पष्ट हो जाता है— अज्ञान का धुंध ही असली राक्षस है और ज्ञान की अग्नि ही उसका नाश करती है।

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रंगोत्सव से पूर्व होने वाला ‘होलिका-दहन’ इसी अग्नि-परंपरा का प्रतीक है। यजुर्वेद में भी अग्नि की इसी रक्षात्मक शक्ति का संकेत मिलता है- “ऊँ रक्षोहणं वलगहनं वष्णवीमिदमहं तं वलगमुत्किरामि स्वाहा।”

इतिहास और साहित्य में भी होली का उल्लेख बार-बार मिलता है। संस्कृत नाटकों— हर्ष की प्रियदर्शिका और रत्नावली, तथा कालिदास की मालविकाग्निमित्रम् और कुमारसंभवम्— में वसंत और रंगोत्सव की छवियाँ उपस्थित हैं। ऋतुसंहार का एक सर्ग तो पूर्णतः वसंतोत्सव को समर्पित है।
मध्यकाल में चंद बरदाई के पृथ्वीराज रासो में भी होली का वर्णन मिलता है। ब्रज में राधा-कृष्ण की होली, अवध में राम-सीता की होली और शैव परंपरा में शिव की मसान होली— ये सभी भारतीय सांस्कृतिक विविधता के रंग हैं।

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अजमेर की दरगाह में गाया जाने वाला सूफी गीत- “आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री”— भी इसी रंग परंपरा का विस्तार है।

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संगीत में भी होली का विशेष स्थान है। धमार और ध्रुपद की परंपरा में होरी के अनेक पद मिलते हैं- “चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर” और “खेलत हरि संग सकल, रंग भरी होरी सखी।” फ़िल्मी संगीत में भी यह परंपरा जीवित है—“रंग बरसे भीगे चुनर वाली” से लेकर “आया होली का त्योहार” तक।

रंग की बात हो तो एक ही रंग की कितनी छटाएँ हैं, यह जानना रोचक है। उदाहरण के लिए, स्वयं बसंत का रंग ‘बसंती’ है, जो पीले रंग की एक छटा है। बसंती से कुछ गाढ़ा पीला हो तो ‘सरसई’(सरसों-पीला), उससे अधिक गाढ़ा हो तो ‘कनेरी’ और उससे भी अधिक गाढ़ा हो जाए तो ‘हल्दी’ रंग कहलाता है। इससे इतर पियराह, कनेरी, चम्पई, कुंदन इत्यादिक भी पीले-रंग या पीत-वर्ण की विविध छटाएँ हैं।

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इसी प्रकार, सावन का अपना रंग भले ही ‘हरा’ माना जाता है, पर इसमें भी सबसे हलके को ‘अँगूरी’, उससे गाढ़े को ‘धानी’, चटकीले को ‘सुगापंखी’ कहा जाता है। इतना ही नहीं, यह हरा जब स्याहपन के साथ रहे तो ‘मूँगिया’ और नीलेपन के साथ ‘फ़ीरोज़ी’ (इसी को फिरोजी भी लिख दिया जाता है।) कहा जाता है। इसी प्रकार, अन्य सभी रंगों के साथ भी उनके आनुषंगिक रंगों का एक विविधवर्णी संसार है।

अब यदि भाषा-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ‘रंग’ शब्द संस्कृत धातु रंज् से बना है। ‘रंज्’ का अर्थ है—रंगना, प्रभावित करना, अनुरंजित करना। इसी से ‘रंज’, ‘अनुरंजन’, ‘मनोरंजन’ और ‘राग’ जैसे शब्द बने।

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राग और रंग का संबंध अत्यंत गहरा है। राग जितना अधिक, रंग उतना ही गहरा। राग समाप्त हुआ तो विराग— बैराग-बीतराग की अवस्था आती है। पर तब भी एक रंग शेष रहता है—लाल। वही सूर्य का रंग है, अग्नि का रंग है और वैराग्य का भी रंग।

होली की चर्चा ब्रज के बिना अधूरी है। ब्रज श्रीकृष्ण के राग-रंग और रास की भूमि है। भाषिक दृष्टि से ‘रस’ से ‘रास’ बना है—जहाँ रस की धारा है, वहीं रास है। राधा क्या है? राधा शब्द की व्युत्पत्ति ‘राध्’ धातु से है, जिसमें मनाने और प्रसन्न करने का भाव है। राधा कृष्ण को प्रसन्न कर सकीं और हम ‘राधे-राधे’ कहकर कृष्ण को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। ‘राध्’ धातु से ही ‘आराधन’ शब्द बना है। [आ + राध् + ल्युट् = आराधन]

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हमने भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से देखा कि ‘राध्’ से राधा शब्द की व्युत्पत्ति है, जिससे आराधना आदि शब्द बने हैं; परंतु विचारणीय है कि साहित्यिक अर्थ में राधा ‘धारा’ का विलोम है; विपर्यय है। राधा–धारा–राधा। जो धारा के विपरीत बहे, वह राधा है। ‘राधा’ अति-विशिष्ट है। उसका प्रेम विशिष्ट है। राधा ‘कृष्ण’ के कर्षण में कर्षित होती है, खिंचती है; लेकिन बाँधना या माँगना नहीं जानती। राधा केवल कृष्ण की हुई; जबकि कृष्ण सबके हुए।

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कृष्ण का अर्थ ही है, जो सबको अपनी ओर खींचे। अस्तु, राधा के हृदय का विस्तार अपार है; क्योंकि उसका प्रेम ससीम नहीं, असीम है। वह कृष्ण को नहीं बाँधती। वह प्रेम को नहीं बाँधती, उसे मुक्त कर देती है। राधा की कोई माँग नहीं, कोई बंधन नहीं; इसलिए विराट् हो गई। प्रेम में विराट् (विराट अशुद्ध है।) होने का प्रतिदान यह हुआ कि प्रेमी 64 कलाओं से पूर्ण योगिराज(योगीराज अशुद्ध है।) कृष्ण हुए; ‘राधा’ उनसे भी पहले स्मरण में आती है– ‘राधे-कृष्ण’। बरसाने की होली इसी राधा-परंपरा का उत्सव है—जहाँ प्रेम, राग और रंग एक साथ उपस्थित हैं।

होली अंततः हमें यही बताती है कि रंग केवल शरीर पर नहीं लगते, वे मन को भी रंगते हैं।
शुभ होली!

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(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News24 उत्तरदायी नहीं है.)

First published on: Mar 04, 2026 02:20 PM

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Raghav Tiwari

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