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Mahabharata Facts: पांचजन्य से मणिपुष्पक तक, जानें महाभारत के दिव्य शंख और उनकी अद्भुत शक्तियां

Mahabharata Facts: प्राचीन काल में शंख केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि युद्ध का एक शक्तिशाली हिस्सा हुआ करते थे. आइए जानते हैं महाभारत के प्रमुख योद्धाओं और उनके पास मौजूद चमत्कारी शंखों के बारे में कि किसके पास कौन-सा शंख था और उसका असर क्या होता था?

Author Written By: Shyamnandan Updated: Feb 11, 2026 13:29
MAHABHARAT

Mahabharata Facts: महाभारत का युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का खेल नहीं था या केवल मनोबल की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह ध्वनियों और ऊर्जा का भी संगम था. हिंदू धर्म में शंख को ‘हरिप्रिय’ और ‘पावनध्वनि’ जैसे नामों से जाना जाता है. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, कुरुक्षेत्र के मैदान में जब युद्ध की घोषणा हुई, तो आकाश विभिन्न शंखों की गूंज से थर्रा उठा था. कहते हैं, हर शंख एक योद्धा की पहचान था. उसका स्वर सेना का उत्साह बढ़ाता था और विरोधी के मन में भय पैदा करता था. आइए जानते हैं, महाभारत के प्रमुख योद्धाओं और उनके पास मौजूद चमत्कारी शंखों के बारे में.

पांचजन्य: भगवान कृष्ण का दिव्य शंख

श्रीमद्भगवद गीता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपना शंख ‘पांचजन्य’ बजाया. कथा है कि उन्होंने पंचजन नामक दैत्य का वध कर यह शंख प्राप्त किया था. इसकी ध्वनि कई योजन दूर तक सुनाई देती थी. पांचजन्य की गर्जना से अधर्मियों के हृदय कांप उठते थे. इसे समुद्र मंथन के रत्नों में गिना गया है. इसे धर्म और साहस का प्रतीक माना गया.

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देवदत्त और पौण्ड्र की गर्जना

पांडु पुत्र अर्जुन के पास ‘देवदत्त’ नामक विशाल शंख था, जिसके नाद से शत्रुओं की सेना में हड़कंप मच जाता था. महाभारत के आदिपर्व के अनुसार अग्नि को खांडव वन दहन में सहायता देने के बाद वरुण देव ने अर्जुन को गांडीव धनुष, अक्षय तूणीर और देवदत्त शंख प्रदान किया. भीम का शंख ‘पौण्ड्र’ कहलाता था. भीम की विशाल काया और अपार शक्ति की तरह ही उनके शंख की आवाज भी किसी गर्जना जैसी भयानक थी.

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अनंतविजय, सुघोष और मणिपुष्पक

धर्मराज युधिष्ठिर ने ‘अनंतविजय’ शंख बजाया था, जो सतत विजय का संकेत देता है. इसकी ध्वनि शांति और न्याय की स्थापना का प्रतीक मानी जाती थी. नकुल का शंख ‘सुघोष’ था, जिसका अर्थ है मधुर ध्वनि. सहदेव के शंख का नाम ‘मणिपुष्पक’ था, जो मन-मस्तिष्क को शांत करता था. इन तीनों शंखों का वर्णन गीता के प्रथम अध्याय में मिलता है. हर शंख का स्वर अलग था और उसका मनोवैज्ञानिक असर भी अलग माना जाता था.

भीष्म और कौरव पक्ष

गीता में वर्णन है कि कौरव सेना की ओर से सबसे पहले भीष्म पितामह ने सिंहनाद के समान शंख बजाया. उनके शंख का नाम ग्रंथ में स्पष्ट नहीं दिया गया, लेकिन कहीं-कहीं इस नाम ‘पौण्ड्रिक’ मिलता है, जिसकी आवाज बहुत गंभीर और प्रभावशाली थी. द्रोण, कर्ण और अन्य महारथियों ने भी अपने शंख बजाए, पर उनके नामों का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है.

शंख का विज्ञान

शंख को ‘समुद्रज’ और ‘जलोद्भव’ भी कहा जाता है क्योंकि इसकी उत्पत्ति जल से हुई है. आयुर्वेद और विज्ञान के अनुसार, शंख बजाने से फेफड़े मजबूत होते हैं और वातावरण से हानिकारक कीटाणु नष्ट होते हैं. महाभारत में शंखनाद केवल जोश भरने के लिए नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध जीतने के लिए भी किया जाता था. आज भी मंदिरों और घरों में शंख बजाना शुभता और विजय का प्रतीक माना जाता है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Feb 11, 2026 01:29 PM

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