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1 जनवरी 2027 से जांच और न्याय व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल करने की तैयारी!

सरकार का कहना है कि डिजिटल व्यवस्था से जांच में तेजी, न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी तथा आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने में आसानी होगी.

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देश में लागू तीन नए आपराधिक कानूनों – भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)- को 1 जुलाई 2026 को दो वर्ष पूरे हो गए हैं. केंद्र सरकार का दावा है कि 1 जनवरी 2027 से जांच और न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाने का लक्ष्य रखा गया है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस दिशा में अभी भी कई व्यावहारिक और बुनियादी चुनौतियां मौजूद हैं.

1 जुलाई 2024 से लागू इन नए कानूनों का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज, जवाबदेह और तकनीक आधारित बनाना है. सरकार के मुताबिक, नए कानून साइबर अपराध, संगठित अपराध और आधुनिक अपराधों से निपटने के लिए नई व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं, साथ ही पीड़ितों को समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने पर जोर देते हैं.

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डिजिटल जांच में ये राज्य सबसे आगे

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एफआईआर से लेकर अदालत की कार्रवाई तक पूरी प्रक्रिया को डिजिटाइज करने में हरियाणा, असम, चंडीगढ़, गोवा और पंजाब सबसे आगे हैं. वहीं, देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 23 राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं.

जीरो एफआईआर को मिला बढ़ावा

नए कानूनों के लागू होने के बाद देशभर में अब तक करीब 63 हजार जीरो एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं. इनमें लगभग 13 हजार मामले ऐसे हैं, जिनमें घटना किसी दूसरे राज्य की थी, लेकिन एफआईआर दूसरे राज्य में दर्ज की गई. नई व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी थाने में शिकायत दर्ज कराने से इनकार न किया जाए. बाद में मामला संबंधित राज्य और थाने को स्थानांतरित कर दिया जाता है.

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डिजिटल न्याय व्यवस्था के प्रमुख फायदे

  • सरकार के अनुसार नए कानूनों के तहत कई महत्वपूर्ण डिजिटल प्रावधान लागू किए गए.
  • ई-एफआईआर और डिजिटल रिकॉर्डिंग के जरिए शिकायत दर्ज कराने की सुविधा.
  • घटनास्थल और जब्त संपत्ति की अनिवार्य वीडियोग्राफी से जांच में पारदर्शिता.
  • ईमेल, डिजिटल दस्तावेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को कानूनी मान्यता.
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई, जिससे समय की बचत और मामलों के शीघ्र निपटारे में मदद.
  • ई-समन और डिजिटल केस मैनेजमेंट के जरिए मुकदमों में अनावश्यक देरी कम करने का प्रयास.

अभी भी कई चुनौतियां बाकी

हालांकि, सरकार 1 जनवरी 2027 से पूरी तरह डिजिटल जांच और न्याय प्रणाली लागू करने का लक्ष्य बता रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं. इनमें डिजिटल बुनियादी ढांचे की कमी, पुलिस और कानूनी पेशेवरों का पर्याप्त प्रशिक्षण, अदालतों पर बढ़ता कार्यभार, तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता और नए प्रावधानों की व्याख्या को लेकर शुरुआती भ्रम प्रमुख हैं.

सरकार का कहना है कि डिजिटल व्यवस्था से जांच में तेजी, न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी तथा आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने में आसानी होगी. अब चुनौती इस महत्वाकांक्षी योजना को देशभर में समान रूप से प्रभावी ढंग से लागू करने की है.

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First published on: Jun 30, 2026 05:54 PM

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