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23 साल से मृत बेटे की शादी रचा रहे माता-पिता, हैरान कर देगी तेलंगाना की ये अनोखी परंपरा

तेलंगाना के एक कपल पिछले 23 सालों से अपने मृत बेटे की शादी हर साल पूरे रीति-रिवाज से करते हैं. दुख की वजह से जन्मी ये परंपरा अब पूरे गांव की आस्था का हिस्सा बन चुकी है.

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Written By: Varsha Sikri Updated: Mar 28, 2026 16:29
Telangana Couple Holds Annual Wedding Ceremony For Their Dead Son
Credit: Social Media

तेलंगाना से एक बेहद भावुक और अनोखी खबर सामने आई है, जिसने लोगों को हैरान भी किया है और भावुक भी. यहां एक दंपति पिछले 23 सालों से अपने मृत बेटे की शादी हर साल पूरे रीति-रिवाज के साथ करवाते हैं. ये घटना तेलंगाना के महबूबाबाद जिले की है, जहां ये परंपरा अब एक धार्मिक आस्था और सामाजिक आयोजन का रूप ले चुकी है. जानकारी के मुताबिक, लालू और सुक्कम्मा नाम के दंपति का बेटा राम कोटी साल 2003 में अपनी लव स्टोरी पूरी ना होने की वजह से दुनिया छोड़ गया. बताया जाता है कि लड़की के परिवार ने उसके प्रेम विवाह का विरोध किया था, जिसके चलते राम कोटी ने आत्महत्या कर ली. इसके कुछ ही समय बाद उसकी प्रेमिका ने भी अपनी जान दे दी.

बेटे की मौत से टूट गया परिवार

इस दुखद घटना ने परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया. लेकिन समय के साथ माता-पिता ने अपने बेटे की याद को जिंदा रखने का एक अनोखा रास्ता चुना. सुक्कम्मा के मुताबिक, बेटे की मृत्यु के बाद वो उनके सपने में आया और उनसे मंदिर बनाने और उसकी शादी कराने की इच्छा जताई. इसके बाद दंपति ने अपने घर में एक छोटा सा मंदिर बनवाया और उसमें बेटे और उसकी प्रेमिका की मूर्तियां स्थापित कर दीं. तभी से हर साल राम नवमी के दिन दोनों की शादी पूरे विधि-विधान के साथ कराई जाती है. इस आयोजन में पूजा, मंत्र, प्रसाद और सभी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं, जैसे किसी जीवित व्यक्ति की शादी हो रही हो.

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राम नवमी पर ही क्यों होती है ये रस्म?

राम नवमी के अवसर पर भगवान राम और सीता के विवाह की परंपरा से प्रेरित होकर ये आयोजन किया जाता है. दंपति इन मूर्तियों को भगवान के रूप में मानकर उनकी शादी कराते हैं. धीरे-धीरे ये आयोजन सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब पूरे गांव के लोग इसमें शामिल होते हैं. हर साल इस खास मौके पर गांव और आसपास के लोग बड़ी संख्या में जुटते हैं. लोग इसे श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक मानते हैं. जो परंपरा कभी एक परिवार के दर्द से शुरू हुई थी, वो अब एक सामूहिक आस्था बन चुकी है. ये सिर्फ माता-पिता के अपने बच्चे के प्रति अटूट प्रेम की दास्तां है, बल्कि ये भी बताती है कि कैसे दुख को आस्था और परंपरा में बदलकर लोग अपने जख्मों को भरने की कोशिश करते हैं.

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First published on: Mar 28, 2026 04:29 PM

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