भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं और चर्चित क्रांतिकारियों की कहानियों तक सीमित नहीं है. इस संघर्ष में हजारों ऐसे महिला और पुरुष स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन आज उनकी कहानियां इतिहास के पन्नों तक सिमटकर रह गई हैं. ऐसी ही एक साहसी महिला थीं बीना दास, जिन्होंने महज 21 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती दी थी.

बीना दास ने 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान तत्कालीन बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोलियां चला दी थीं. संयोग देखिए कि जिस दिन वह अंग्रेज गवर्नर पर हमला कर रही थीं, उसी दिन उन्हें विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री भी प्राप्त करनी थी. किन ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का यह कदम उनके लिए आसान नहीं था. उन्हें गिरफ्तार किया गया और नौ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई. हालांकि उनकी चलाई गई गोलियों में से कोई भी गवर्नर को नहीं लगी.

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दीक्षांत समारोह में गूंजी थीं गोलियों की आवाज

1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह चल रहा था. मंच पर बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन भाषण दे रहे थे. इसी दौरान बीना दास ने पिस्तौल निकालकर उन पर गोली चला दी. पहली गोली जैक्सन के कान के पास से निकल गई. अचानक हुए हमले से गवर्नर नीचे झुक गए. मंच पर मौजूद कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति लेफ्टिनेंट कर्नल हसन सुहरावर्दी ने तुरंत बीना दास को पकड़ने की कोशिश की. उन्होंने बीना दास को काबू करने और हथियार छीनने का प्रयास किया. इसके बावजूद बीना दास ने पिस्तौल से बची हुई गोलियां भी चला दीं. आखिरकार उन्हें पकड़ लिया गया. हमले में गवर्नर स्टेनली जैक्सन घायल नहीं हुए. लेकिन इस घटना ने ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया और पूरे बंगाल में इसकी चर्चा हुई.

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अदालत में बीना दास का बयान बना इतिहास

मुकदमे के दौरान बीना दास ने अपने कृत्य से पीछे हटने के बजाय उसकी जिम्मेदारी स्वीकार की. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. अदालत में उन्होंने कहा कि एक इंसान के रूप में स्टेनली जैक्सन उनके लिए उनके पिता जैसे हैं और लेडी जैक्सन उनकी मां जैसी. लेकिन बंगाल का गवर्नर उस ब्रिटिश व्यवस्था का प्रतिनिधि है, जिसने उनके देशवासियों को गुलाम बना रखा है. उनके इस बयान ने स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि औपनिवेशिक शासन और गुलामी की व्यवस्था के खिलाफ था. बीना दास को इस हमले के लिए नौ वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई.

जेल से बाहर आने के बाद भी नहीं रुका संघर्ष

रिहाई के बाद बीना दास कांग्रेस से जुड़ गईं. वर्ष 1941 में उन्हें कांग्रेस की दक्षिण कलकत्ता शाखा का नेतृत्व सौंपा गया. उन्होंने मजदूरों के मुद्दों को लेकर भी सक्रिय भूमिका निभाई और श्रमिक आंदोलनों को संगठित किया. 1942 में जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन की लहर उठी, तब बीना दास ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. उन्होंने दक्षिण कलकत्ता के हाजरा क्रॉसिंग पर एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया. उस समय पुलिस ने ऐसी सभाओं पर रोक लगा रखी थी. इसके बावजूद बीना दास ने सभा आयोजित की. सभा के दौरान पुलिस बल वहां पहुंचा और प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिश की. इसी दौरान एक पुलिस सार्जेंट ने उनकी एक सहयोगी पर लाठी चलाने की कोशिश की. बीना दास ने उसे रोकने का प्रयास किया. इसके बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और तीन वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई.

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आजादी के बाद बनीं पश्चिम बंगाल की विधायक

देश की आजादी के बाद भी बीना दास का सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ. वर्ष 1946 से 1951 तक वह बंगाल की राज्य विधानसभा की सदस्य रहीं. 1947 में उन्होंने अपने साथी स्वतंत्रता सेनानी जतिश भौमिक से विवाह किया. लेकिन देश को आजादी मिलने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक न्याय को लेकर उनका संघर्ष जारी रहा. 1951-52 के आसपास कोलकाता के प्रमुख अखबार अमृत बाजार पत्रिका के कर्मचारियों ने बेहतर वेतन और काम की परिस्थितियों में सुधार की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया. बीना दास उस समय ट्रेड यूनियन से जुड़ी थीं और उन्होंने मजदूरों का समर्थन किया. उनका रुख कांग्रेस सरकार की उस समय की नीति से भी अलग था, क्योंकि पार्टी प्रबंधन के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही थी.

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शरणार्थियों के सवाल पर पेंशन तक ठुकरा दी

भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आए. जब इन शरणार्थियों को कलकत्ता में बसने की अनुमति नहीं दी गई और उन्हें मध्य प्रदेश के दूरदराज इलाके दंडकारण्य में भेजा गया, तो बीना दास और उनके पति जतिश भौमिक ने सरकार के फैसले का विरोध किया. दोनों ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की ओर से दी जाने वाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन तक स्वीकार करने से इनकार कर दिया. यह फैसला बताता है कि बीना दास के लिए स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों से राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं थी. वह सामाजिक न्याय और आम लोगों के अधिकारों को भी आजादी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती थीं.

जिंदगी के अंतिम वर्षों में बढ़ती गई गुमनामी

बाद के वर्षों में बीना दास ने कुछ समय स्कूलों में अध्यापन भी किया. लेकिन उनके जीवन का अंतिम दौर बेहद दुखद रहा. 1986 में उनके पति जतिश भौमिक की मृत्यु के बाद वह धीरे-धीरे लोगों से कटने लगीं. उन्होंने करीबी दोस्तों और परिवार के सदस्यों से भी मिलना-जुलना कम कर दिया. इसके बाद उन्होंने कोलकाता छोड़ दिया और ऋषिकेश चली गईं. वहां उनका जीवन बेहद गरीबी और अकेलेपन में बीता. फिर 26 दिसंबर 1986 को ऋषिकेश में सड़क किनारे एक महिला का सड़ा-गला शव मिला. शव की पहचान तुरंत नहीं हो सकी. करीब एक महीने बाद पता चला कि यह किसी और का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी बीना दास का शव था. जिस महिला ने कभी ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देकर पूरे देश का ध्यान खींचा था, उसके जीवन का अंत इतनी गुमनामी में हुआ कि उसकी पहचान तक करने में लगभग एक महीना लग गया.

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‘श्रृंखल झंकार’ में दर्ज है बीना दास की पीड़ा

बीना दास ने अपनी आत्मकथा ‘श्रृंखल झंकार’ यानी ‘Rattling the Chains’ में अपने संघर्ष और देशवासियों की पीड़ा को शब्द दिए थे. उन्होंने लिखा था कि आज भी मुझे उनकी चीखें सुनाई देती हैं, भूखों की कराह और गरीबों की मौन पीड़ा. यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है. मेरे हृदय में आज भी मेरे ईश्वर के ढोल की आवाज गूंजती है और वह मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, आगे, आगे और हमेशा आगे. बीना दास को बाद में देश ने पद्मश्री से सम्मानित किया. लेकिन उनका जीवन भारतीय इतिहास का एक बेहद मार्मिक अध्याय भी है.

इतिहास के पन्नों में दर्ज रहनी चाहिए कहानी

बीना दास की कहानी केवल 21 वर्ष की एक युवती द्वारा ब्रिटिश गवर्नर पर गोली चलाने की घटना नहीं है. यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने गुलामी के खिलाफ हथियार उठाया, जेल की यातनाएं झेलीं, आजादी के बाद मजदूरों और शरणार्थियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. उनका अंतिम जीवन भले ही गरीबी और गुमनामी में बीता, लेकिन उनका संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में हमेशा याद किया जाना चाहिए. बीना दास की जिंदगी हमें यह याद दिलाती है कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान और समानता के लिए लगातार चलने वाला संघर्ष भी है.