भारत में रेलवे का इतिहास लगभग 173 साल पुराना है. इस दौरान हिंदुस्तान भाप और डीजल इंजन से लेकर हाईड्रोजन इंजन वाली ट्रेनों का गवाह बन चुका है. आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय रेलवे की 99.6 प्रतिशत ट्रेनें आज बिजली पर दौड़ रही है, लेकिन तकनीक बदलने के बाद भी इंडियन रेलवे डीजल इंजन को पूरी तरह बंद नहीं सकता. मार्च 2026 तक 70,142 रूट किलोमीटर (RKM) में से करीब 69,873 RKM पर बिजली पहुंच चुकी थी. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर रेलवे डीजल इंजन को पूरी तरह टाटा बाय-बाय करने की स्थिति में क्यों नहीं है.
12 साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़े बिजली रूट
गौरतलब है कि भारतीय रेलवे में बिजली के रूटों की रफ्तार पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है. 2009-10 में सिर्फ 18,927 RKM रेल नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड था. जबकि मार्च 2014 तक यह आंकड़ा 21,614 RKM तक पहुंच गया. इसके बाद 2026 तक यह नंबर 69,873 RKM पर पहुंच गया. रेलवे के मुताबिक, 2004-14 के दौरान रोजाना औसतन करीब 1.42 किलोमीटर ट्रैक का इलेक्ट्रिफाइड होता था. 2019-25 के बीच यह रफ्तार बढ़कर 15 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक हो गई.
डीजल की खपत में आई बड़ी गिरावट
रेल मंत्रालय के अनुसार, 2024-25 में इलेक्ट्रिफाइड रूटों की वजह से करीब 180 करोड़ लीटर डीजल की बचत हुई. इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के साथ विदेशी मुद्रा की भी बचत हुई. रेल मंत्रालय के मुताबिक इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन, डीजल की तुलना में करीब 70 प्रतिशत अधिक किफायती है और इलेक्ट्रिफाइड से करीब 6,000 करोड़ रुपये की बचत हुई.
फिर डीजल इंजन की जरूरत क्यों?
99.6 प्रतिशत रूटों पर बिजली की ट्रेनें दौड़ने के बावजूद डीजल इंजन की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता. इलेक्ट्रिक इंजन की सबसे बड़ी निर्भरता बिजली आपूर्ति और ओवरहेड इलेक्ट्रिक इक्विपमेंट (OHE) पर होती है. बिजली ग्रिड में खराबी, प्राकृतिक आपदा या ओवरहेड तारों को नुकसान पहुंचने की स्थिति में ट्रेन संचालन प्रभावित हो सकता है. इसीलिए रेलवे डीजल इंजनों को आपात स्थिति में बैकअप के तौर पर रखता है. रेलवे मंत्रालय ने संसद को बताया है कि डीजल इंजन संकट प्रबंधन योजना का अहम हिस्सा हैं. इनका इस्तेमाल शंटिंग, रेलवे यार्ड, साइडिंग और रणनीतिक जरूरतों में भी होता है.