दिल्ली में द्वारका स्थित इस्कॉन टेंपल में जन्माष्टमी पर प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना डॉ. यास्मीन सिंह ने अपने ग्रुप के साथ शानदार परफॉर्मेंस दी. जिसके बाद उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण के चरणों में डांस परफॉर्म करके हम अत्यंत प्रसन्न हैं. हम सचमुच आनंदित हो गए हैं, एक कलाकार को इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता, जहां दर्शक श्री कृष्ण की जयंती की भावना में इतने मग्न हैं कि हम भी उसी भक्ति से परिपूर्ण हो गए हैं. हमें खुशी है कि यह उत्सव इतने शानदार मंच पर और इतने भावपूर्ण दर्शकों के साथ आयोजित किया गया है. एक कलाकार जीवन में और क्या ही चाह सकता है?
परफॉर्म करके ईश्वर की प्राप्ति अनुभव हुई
डॉ. यास्मीन सिंह ने कहा कि आज जन्माष्टमी के मौके पर इस्कॉन टेंपल में परफॉर्म करके ऐसा लग रहा है, मानो हमारी आध्यात्मिक साधना पूर्ण हो गई है. ईश्वर ने हमें वर्षों की भक्ति का परम फल प्रदान किया है. ऐसा लगा रहा है मानो हमने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है. आज हमने अपने हृदय में उनकी उपस्थिति को काफी नजदीक से महसूस किया है. हमने आज ईश्वर को गहराई से महसूस किया क्योंकि हमने उनके प्रांगण में उनके रंग में रंगकर प्रस्तुति दी है, जहां इतने सारे भक्त समान भक्ति भाव से एकत्रित हुए थे. आज की हमारी प्रस्तुति अन्य प्रस्तुतियों से बिल्कुल अलग थी.
गीता के एक श्लोक को जीवन प्रेरणा बताया
डॉ. यास्मीन सिंह ने कहा कि आज हमारी परफॉर्मेंस वास्तव में अद्वितीय थी और हमने अपार आनंद का अनुभव किया. मैं ‘यदा यदा ही धर्मस्य’ के संदेश की बहुत प्रशंसा करती हूं. मैं इस श्लोक को बहुत महत्व देती हूं और अपने जीवन में इसकी शिक्षाओं का पालन करने का भरसक प्रयास करती हूं. श्री कृष्ण की जयंती के अवसर पर मंदिरों में ऐसे आयोजन होते रहे हैं, क्योंकि हमारे देश में हमेशा से ही ऐसे त्योहारों को बड़े हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है. श्री कृष्ण की जयंती पर उनके मंदिरों को हमेशा सजाया जाता रहा है. और समय के साथ जैसे-जैसे समाज में बदलाव आते गए, इन आयोजनों का पैमाना भी बढ़ता गया. ऐसे ही एक आयोजन में आज मैंने ग्रुप के साथ परफॉर्म किया.
देशभर के युवाओं को विशेष संदेश दिया
डॉ. यास्मीन सिंह ने कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर मैं देशवासियों को एक संदेश देना चाहती हूं. जैसा कि श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि हमें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए. इसी प्रकार मैं अपने देश के युवाओं से कहना चाहती हूं कि वे अपना काम करते रहें. हमें ईश्वर के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर बिना परिणामों की इच्छा किए चलते रहना चाहिए, क्योंकि ईश्वर ही कर्मों का फल प्रदान करते हैं. कथक नृत्य की उत्पत्ति स्वयं श्री कृष्ण ने की है. वे नाग के फन पर खड़े होकर नृत्य करते थे और अपने पैरों को नाग के फन पर रखकर तट-तट-थेई-थेई-तट की लय उत्पन्न करते थे. ऐसा माना जाता है कि कथक की उत्पत्ति वहीं से हुई और आज यह भारतीय लोक संस्कृति की पहचान है.
कत्थक नृत्य को श्री कृष्ण की उत्पत्ति बताया
डॉ. यास्मीन सिंह ने कहा कि एक कलाकार के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है कि कलाकार अपने अभ्यास और नृत्य के फल श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करे. यह हमारी भक्ति है, क्योंकि कथक नृत्य की उत्पत्ति श्री कृष्ण से हुई है. जब हम कथक का अभ्यास करते हैं तो हमें हर चीज में श्री कृष्ण दिखाई देते हैं, हर लय में वे नजर आते हैं और हमारी भावनाएं भी फिर केवल श्री कृष्ण पर केंद्रित हो जाती हैं. सच में आज परफॉर्म करके मन तृप्त हो गया.
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