Friday, December 2, 2022
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Opinion: क्या वाकई कांग्रेस की नैय्या डूब रही है?

Opinion: इन दिनों देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आसपी खींचतान चल रही है। एक के बाद एक कई दिग्गज नेता कांग्रेस का हाथ छोड़ दूसरी पार्टियों का दामन थाम रहे हैं। वहीं कई ऐसे भी हैं, जो पार्टी के बड़े पदों पर नहीं बैठना चाहते।

राजीव रंजन, नई दिल्ली: 73 साल के गुलाम नबी आज़ाद को कांग्रेस ने इस साल जुलाई में राज्यसभा नहीं भेजा तो वो बाग़ी हो गए। 45 साल संसद में रहे। मुख्यमंत्री रहे। उन्हें ठीक से याद भी नहीं होगा कितने साल केन्द्र में मंत्री रहे। उसी जम्मू कश्मीर से एक बार लोकसभा न जीत पाए जहां पर अब पार्टी बनाए हैं।

74 साल के कपिल सिब्बल को कांग्रेस ने 12 साल राज्यसभा भेजा। दस साल लोकसभा में रहे और दस साल लगातार कैबिनेट मंत्री रहे। इस साल उन्हें भी राज्यसभा में मौक़ा नहीं मिलने वाला था तो उन्हें कांग्रेस की नैय्या डूबती दिखाई देने लगी। तुरंत सपा के सहयोग से राज्यसभा पहुंच गए।

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69 साल के आनंद शर्मा ने तो लोकसभा का मुंह नहीं देखा और 24 साल राज्यसभा में रहे। सुना है कांग्रेस से उनका भी मोहभंग है। अब 71 साल के अशोक गहलोत 15 साल मुख्यमंत्री रहे। केंद्रीय मंत्री रहे। देख ही रहे हैं उनके तेवर। अब जरा युवाओं की तरफ देखिए- सिंधिया, आरपीएन और जितिन प्रसाद जिस उम्र में केंद्र में मंत्री बन गए, दूसरी पार्टी में विधायक का टिकट न मिलता, परिवारवाद के नाम पे ही सही, लेकिन जब तक कांग्रेस में थे तब तक परिवारवाद। बीजेपी में तो संगठन में काम कर रहे हैं।

इसी कांग्रेस में कामराज जैसे नेता थे जो नेहरू जी और शास्त्री जी के निधन यानि दोनों प्रधानमंत्रियों के निधन के वक्त कांग्रेस अध्यक्ष थे। कद्दावर राजनेता थे। चाहते तो दोनों मौकों पर पीएम बन सकते थे लेकिन पहले शास्त्री जी को फिर इंदिरा जी को उन्होंने चुना। फिर पार्टी में नई जान लाने के लिए कामराज प्लान लाया कि बुजुर्ग और सीनियर नेता सरकार से पद त्याग करें और संगठन में लगें। लेकिन सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी में लोकतंत्र के नाम पर चापलूसी करने वालों ने इतनी मलाई खाई कि संगठन एकदम खोखला हो गया।

शायद कांग्रेस दुनिया की अकेली पार्टी होगी जो देश में तो दस साल राज करती रही लेकिन संगठन उन्हीं दस सालों में मरणासन्न हो गया। ज़मीनी कार्यकर्ताओं की न सिर्फ़ उपेक्षा की गई बल्कि बेइज्जत किया गया और जिनको पद ओहदे मिले वो अपने और अपनों का ख़्याल रखने में लगे रहे। पार्टी का ख़्याल सिर्फ़ गांधी परिवार का विभाग बना रह गया।

दूसरी तरफ़ बीजेपी है जिसकी केंद्र में सत्ता आई तो नोटबंदी के तुंरत बाद और पहले कार्यकाल के ख़त्म होने से पहले सैकड़ों ज़िलों में करोड़ों की लागत से पार्टी कार्यालय बनके तैयार हो गए। मिनट भर में केंद्रीय मंत्री पार्टी के प्रवक्ता बना दिए जाते हैं और चूं तक नहीं बोलते।

मुझे लगता है जब तक राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा ख़त्म होगी तब तक मनमोहन सरकार में दस साल लगातार रहे मंत्री में एकाध ही कांग्रेस में रहेंगे। यही फ़र्क़ इक़बाल का होता है। एक साल पहले गुजरात में विधानसभाध्यक्ष, मुख्यमंत्री समेत सारे मंत्री एक साथ हटा दिए गए और किसी की हलक से ज़ुबान तक न निकली। सुशील मोदी बिहार में दस साल डिप्टी सीएम रहे। दिनेश शर्मा यूपी के डिप्टी सीएम रहे। हटा दिए गए। आपने कुछ सुना।

केजरीवाल ने आप के सारे संस्थापक बड़े चेहरों को एक एक कर निकाल दिया। समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों को अभी पैदल मार्च में हांफते हुए देखा गया। विपक्षी एकता के झंडाबरदार बने नीतीश कुमार ने शरद यादव को कैसे दूध में मक्खी की तरह निकाल दिया जब बीजेपी से सटना था। और कैसे आरसीपी को धक्का दिया जब लालू से सटना था।

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माया और ममता के बारे में तो कहना ही क्या। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पार्टियों में ख़त्म होता लोकतंत्र आज देश की सबसे बड़ी चिंताजनक बात है। चुनाव में जीते कोई हारे कोई। लोकतंत्र दिनोंदिन सियासत में ख़त्म होता जा रहा है और मज़ेदार बात ये कि परिवारों में बढ़ता जा रहा है। अब भारतीय परिवारों में ही लोकतंत्र ज़िंदा है।

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