Petrol and Diesel Prices : मिडिल ईस्ट में चल रही जंग की तपिश अब सीधे भारतीय परिवारों की रसोई और जेब तक पहुंचने लगी है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव के कारण देश में दूध, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस समेत कई जरूरी सामान महंगे हो गए हैं. आर्थिक जानकारों का साफ कहना है कि अगर दोनों देशों के बीच यह टकराव जल्द खत्म नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में इसके बेहद भयावह नतीजे देखने को मिल सकते हैं.
हालांकि, अप्रैल के महीने में दोनों पक्षों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम हुआ था, लेकिन मई महीने में भी स्थिति सुधरती नहीं दिख रही है. समुद्री रास्तों में सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं. एक तरफ अमेरिका ने समुद्र में अपनी नौसेना की ताकत बढ़ा दी है, तो दूसरी तरफ ईरान भी वहां से गुजरने वाले जहाजों की कड़ी जांच और निगरानी कर दबाव बना रहा है. इस खींचतान की वजह से दुनिया भर में एनर्जी (ऊर्जा) सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. स्थिति अभी विश्व युद्ध जैसी नहीं है, लेकिन अगर अमेरिका-ईरान में सीधी जंग हुई, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है.
पेट्रोल-डीजल और गैस पर सबसे बड़ा खतरा
भारत अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा कच्चा तेल खाड़ी देशों से ही खरीदता है. 'स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़' (समुद्री रास्ता) में जरा सी भी रुकावट आते ही कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हो जाती है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि देश में ट्रांसपोर्टेशन (माल ढुलाई) का खर्च बढ़ेगा, जिससे फल, सब्जी, राशन और एफएमसीजी (रोजमर्रा का सामान) जैसी हर चीज महंगी हो जाएगी. इससे आम जनता का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है.
खाड़ी में रहने वाले भारतीयों की बढ़ी टेंशन
इस तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिख रहा है. पेंट, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और एविएशन (विमानन) जैसे सेक्टरों की लागत बढ़ने से उन पर दबाव है. इसके साथ ही, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं और कमाते हैं. अगर वहां हालात और बिगड़े, तो उनकी सुरक्षा और नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है, जिससे भारत आने वाले पैसे (रेमिटेंस) में भी कमी आएगी. फिलहाल, भारत सरकार इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. एक तरफ वह अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्ते संतुलित रख रही है, तो दूसरी तरफ कच्चे तेल के लिए दूसरे देशों (वैकल्पिक स्रोतों) की तलाश भी कर रही है.
Petrol and Diesel Prices : मिडिल ईस्ट में चल रही जंग की तपिश अब सीधे भारतीय परिवारों की रसोई और जेब तक पहुंचने लगी है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव के कारण देश में दूध, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस समेत कई जरूरी सामान महंगे हो गए हैं. आर्थिक जानकारों का साफ कहना है कि अगर दोनों देशों के बीच यह टकराव जल्द खत्म नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में इसके बेहद भयावह नतीजे देखने को मिल सकते हैं.
हालांकि, अप्रैल के महीने में दोनों पक्षों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम हुआ था, लेकिन मई महीने में भी स्थिति सुधरती नहीं दिख रही है. समुद्री रास्तों में सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं. एक तरफ अमेरिका ने समुद्र में अपनी नौसेना की ताकत बढ़ा दी है, तो दूसरी तरफ ईरान भी वहां से गुजरने वाले जहाजों की कड़ी जांच और निगरानी कर दबाव बना रहा है. इस खींचतान की वजह से दुनिया भर में एनर्जी (ऊर्जा) सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. स्थिति अभी विश्व युद्ध जैसी नहीं है, लेकिन अगर अमेरिका-ईरान में सीधी जंग हुई, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है.
पेट्रोल-डीजल और गैस पर सबसे बड़ा खतरा
भारत अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा कच्चा तेल खाड़ी देशों से ही खरीदता है. ‘स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़’ (समुद्री रास्ता) में जरा सी भी रुकावट आते ही कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हो जाती है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि देश में ट्रांसपोर्टेशन (माल ढुलाई) का खर्च बढ़ेगा, जिससे फल, सब्जी, राशन और एफएमसीजी (रोजमर्रा का सामान) जैसी हर चीज महंगी हो जाएगी. इससे आम जनता का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है.
खाड़ी में रहने वाले भारतीयों की बढ़ी टेंशन
इस तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिख रहा है. पेंट, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और एविएशन (विमानन) जैसे सेक्टरों की लागत बढ़ने से उन पर दबाव है. इसके साथ ही, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं और कमाते हैं. अगर वहां हालात और बिगड़े, तो उनकी सुरक्षा और नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है, जिससे भारत आने वाले पैसे (रेमिटेंस) में भी कमी आएगी. फिलहाल, भारत सरकार इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. एक तरफ वह अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्ते संतुलित रख रही है, तो दूसरी तरफ कच्चे तेल के लिए दूसरे देशों (वैकल्पिक स्रोतों) की तलाश भी कर रही है.