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एयरपोर्ट हो या मेट्रो… क्यों भारत में ही होता है बॉडी टच सिक्योरिटी चेक, पाकिस्तान-बांग्लादेश में भी नहीं है ऐसा रूल

भारत में एयरपोर्ट्स, मेट्रो, मॉल्स में हर किसी की जांच हाथ से टच करके यानी फ्रिस्किंग और मेटल डिटेक्टर दोनों के साथ होती है. ये काफी हाई-टच है. दूसरे देशों में ज्यादातर जगह सिर्फ बैग स्कैन या रैंडम चेक होता है. रोजाना हर किसी को टच ककरके चेक नहीं करते है, अगर होता भी है तो किसी स्पेशल इवेंट्स, हाई अलर्ट या रैंडम.

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Edited By : Versha Singh Updated: Mar 30, 2026 21:03

भारत में एयरपोर्ट्स, मेट्रो, मॉल्स में हर किसी की जांच हाथ से टच करके यानी फ्रिस्किंग और मेटल डिटेक्टर दोनों के साथ होती है. ये काफी हाई-टच है. दूसरे देशों में ज्यादातर जगह सिर्फ बैग स्कैन या रैंडम चेक होता है. रोजाना हर किसी को टच ककरके चेक नहीं करते है, अगर होता भी है तो किसी स्पेशल इवेंट्स, हाई अलर्ट या रैंडम.

भारत में ये प्रक्रियाएं सबसे ज्यादा रूटीन तौर पर होती है जबकि दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता है. कई देशों में जरूरत पड़ने पर फिजिकल फ्रिस्किंग होती है लेकिन ये रूटीन में नहीं होती है और हर किसी को इससे नहीं गुजरना पड़ता है. इस तरह की जांच कुछ मामलों में ही होती है या फिर शक के आधार पर.

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आमतौर पर ज्यादातर देशों में प्राइमरी स्क्रीनिंग वॉक थ्रू मेटल डिटेक्ट, मिलीमीटर वेव बॉडी स्कैनर या एडवांस्ड सीटी स्कैनर से होती है. मैनुअल पैट-डाउन या फ्रिस्किंग केवल तब होती है जब मशीन में अलार्म या बीप बजे. रैंडम सेलेक्शन कभी कभार और बहुत कम फ्रीक्वेंसी पर होता है.

ज्यादातर यात्रियों को सिर्फ स्कैनर से गुजरना पड़ता है. फिजिकल टच बिल्कुल नहीं होता. कई यूरोपीय एयरपोर्ट्स पर तो शूज, बेल्ट उतारने की भी जरूरत नहीं पड़ता है औ पैट-डाउन तो बहुत ही रेयर कंडीशन में होता है.

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इसके अलावा अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर फुल-बॉडी स्कैनर पहले से ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिनसे लगभग 2-3 सेकंड में ही शरीर की स्कैनिंग हो जाती है और फ्रिक्सिंग की भी जरूरत नहीं होती है.

अलार्म या रैंडम पर होता है पैट-डाउन

अमेरिका में पैट-डाउन मुख्य रूप से अलार्म या रैंडम पर होता है. यहां हर किसी को नहीं छूते हैं. केवल 2-5% मामलों में या उससे भी कम में ये प्रक्रिया होती है, लेकिन जब होती है तो काफी डिटेल्ड इनवेसिव हो सकती है. यूरोप में ज्यादातर देशों में कम फिजिकल चेक है. स्कैनर से काम चल जाता है, पैट डाउन सिर्फ जरूरत पर होता है.

इजरायल में चेकिंग के नियम हैं सख्त

इजरायल में चेकिंग के नियम बेहद सख्त है लेकिन फिर भी यहां रूटीन फ्रिस्किंग नहीं बल्कि इंटेलिजेंस-बेस्ड और क्वेश्चनिंग ज्यादा होती है. लंदन ट्यूब, न्यूयॉर्क सबवे, दुबई मॉल्स में ज्यादातर सिर्फ बैग स्कैन या रैंडम चेक से लोगों को जाने दिया जाता है.

पैट डाउन क्या होता है?

पैट-डाउन सिक्योरिटी चेकिंग का एक तरीका होता है, जिसमें सुरक्षा अधिकारी हाथों से यात्री के कपड़ों के ऊपर से शरीर को टच करके चेक करते हैं कि कहीं कोई छिपा हुआ हथियार जैसे विस्फोटक या फिर कोई प्रतिबंधित सामान तो नहीं है. साधारण भाषा में समझें तो ये मैनुअल फ्रिस्किंग या हाथ से तलाशी का ही एक रूप है.

भारतीय बड़े हवाई अड्डों पर अभी भी हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर और पैट डाउन फ्रिक्सिंग आम है.

भारत में क्यों होती है ज्यादा चेकिंग?

भारत में बड़े पैमाने पर पैसेंजर्स होते हैं. हर दिन लाखों में यात्री जगह-जगह ट्रैवल करते हैं. भारत में आतंकवादी हमलों का पुराना इतिहास रहा है. सीआईएसएफ का इस मामले में स्पष्ट प्रोटोकॉल है- सुरक्षा को प्राथमिकता, भले थोड़ा समय ज्यादा लगे.

पाकिस्तान और बांग्लादेश में कैसे होती है चेकिंग?

पाकिस्तान और बांग्लादेश में एयरपोर्ट सिक्योरिटी चेकिंग का तरीका भारत से काफी अलग है. यहां भारत जितना रूटीन और हर यात्री पर मैनुअल फ्रिस्किंग नहीं होती है. पाकिस्तान में एयरपोर्ट्स पर चेकिंग एयरपोर्ट सेक्युरिटी फोर्स करती है. ये प्राइमरी स्क्रीनिंग वॉक-थ्रू मेटल डिटेक्टर, हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर और एक्स -रे स्कैनिंग से होता है.

मैनुअल फ्रीस्किंग रूटीन में हर यात्री के साथ नहीं किया जाता है. ज्यादातर मामलों में अगर मशीन में अलार्म या बीप बजे या कोई संदेह हो तो सेम जेंडर अफसर द्वारा पैट-डाउन या बॉडी सर्च की जाती है. भारत की तरह हर पैसेंजर को हाथ से फ्रिस्क नहीं करते. फिजिकल टच कंडीशनल है. हाई-रिस्क या इंटरनेशनल फ्लाइट्स पर ज्यादा सख्ती हो सकती है, लेकिन रूटीन यूनिवर्सल फ्रिस्किंग नहीं होती है.

वहीं, बांग्लादेश में प्राइमरी स्क्रीनिंग मेटल डिटेक्टर, X-रे बैग स्कैन से होती है. हाल के वर्षों में फुल-बॉडी स्कैनर लगाए गए हैं, जो 2020 से इस्तेमाल में हैं. ये स्कैनर बॉडी पर या अंदर छिपी चीजें डिटेक्ट करते हैं. मैनुअल फ्रिस्किंग रूटीन में बिल्कुल नहीं होती अगर स्कैनर में कुछ संदिग्ध दिखे, अलार्म बजे, हाई-रिस्क बैगेज हो तो ही मैनुअल चेक होती है. फुल-बॉडी स्कैनर से फिजिकल टच कम करने की कोशिश होती है. ये दोनों देश हाई थ्रेट एनवायरनमेंट में हैं लेकिन तकनीक ज्यादा यूज करते हैं ताकि फिजिकल चेक कम हो.

सेकेंड में होती है वियतनाम में चेकिंग

एशिया के वियतनाम जैसे देश में तो सेक्युरिटी चेक बहुत तेजी से होता है. उसने हाल के सालों में बायोमेट्रिक्स और ऑटोमेटेड गेट्स जैसे फेशियल रिकग्निशन को बहुत तेजी से अपनाया है. आप विश्वास नहीं करेंगे वियतनाम के तकरीबन सभी इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स पर सिक्योरिटी चेक अब 1-3 सेकंड में हो जाता है.

भारत में कब से हो रही रूटीन मैनुअल फ्रिस्किंग

भारत में एयरपोर्ट्स पर हर यात्री की रूटीन मैनुअल फ्रिस्किंग की परंपरा मुख्य रूप से 2000 के दशक में शुरू हुई, खासकर सीआईएसएफ के एयरपोर्ट सिक्योरिटी में शामिल होने के बाद. 1990 के दशक तक एयरपोर्ट सिक्योरिटी राज्य पुलिस या एयरपोर्ट अथॉरिटी के हाथ में थी. चेकिंग बेसिक थी यानि मेटल डिटेक्टर, X-रे के जरिए. रूटीन में हर यात्री पर हाथ से फ्रिस्किंग नहीं थी. यह ज्यादा संदिग्ध मामलों या हाई-रिस्क पर होती थी. लेकिन 1999-2000 एक तरह से टर्निंग पॉइंट था.

इंडियन एयरलाइंस IC-814 का हाईजैक बड़ा झटका था. इससे एविएशन सिक्योरिटी में बड़े बदलाव आए. सरकार ने 7 जनवरी 2000 को फैसला लिया कि सभी सिविल एयरपोर्ट्स की सिक्योरिटी सीआईएसएफ को सौंपी जाए. उसने प्रोटोकॉल में 100% मैनुअल पैट-डाउन और फ्रिस्किंग को रूटीन बनाया, बेशक मेटल डिटेक्टर में बीप न बजे. तब से ही ये स्टैंडर्ड बना हुआ है.

First published on: Mar 30, 2026 09:03 PM

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