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धर्म बदलने के बाद भी आदिवासियों को मिलेगा ST आरक्षण? जानिए क्या कहते हैं नियम

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक खास मामले पर सुनवाई करते हुए साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल देता है, तो उसकी आदिवासी पहचान को कोई छीन नहीं सकता और उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसला सुनाया है, जिसने पूरे देश में एक नई चर्चा छेड़ दी है. भारत में धर्म परिवर्तन और आरक्षण के नियमों को लेकर अदालत ने एक अहम फैसला दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक खास मामले पर सुनवाई करते हुए साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल देता है, तो उसकी आदिवासी पहचान को कोई छीन नहीं सकता और उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा.

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अदालत ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा इसके धर्म से जुड़ा नहीं हो सकता, बल्कि ये उसकी सामाजिक या सांस्कृतिक पहचान होती है. अदालत ने ये साफ किया कि अगर कोई ST हिंदू है और बाद में वो ईसाई या कोई और धर्म अपनाना चाहता है, तो उसकी पहचान नहीं बदलेगी. हाई कोर्ट ने अधिकारियों से साफ कहा है कि किसी भी अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

भारत के संविधान में क्या प्रावधान?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, वो संविधान के तहत है. कानून के मुताबिक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नियम में एक बड़ा अंतर है. SC के लिए कानून ये कहता है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई और धर्म अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म होता है. लेकिन अनुसूचित जनजाति के लिए ये नियम पूरी तरह अलग है. ST के मामले में ऐसी कोई धार्मिक रुकावट नहीं है. अगर कोई अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति कभी भी बदलकर कोई भी धर्म अपनाता है तो भी उसे रिजर्वेशन के फायदे मिलते रहेंगे.

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ST समुदाय को बड़ी राहत

दरअसल, लंबे वक्त से इस बात पर बहस छिड़ी है कि अनुसूचित जनजाति के धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए. कई जगहों पर ईसाई धर्म अपनाने वालों लोगों को रिजर्वेशन नहीं दिया जा रहा था. लेकिन अब इलहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद उन लोगों को राहत मिली है जिन्हें किसी वजह से धर्म बदलना पड़ा था. इस फैसले ने ये साफ कर दिया है कि ST समुदाय के लोगों को सरकारी नौकरियों, दाखिलों और बाकी योजनाओं से मिलने वाला रिजर्वेशन पूरी तरह सुरक्षित रहेगा. कोर्ट ने अधिकारियों से कहा है कि धर्म बदलने पर आदिवासी समुदाय के लोगों को जाति प्रमाणपत्र मिलता रहना चाहिए.

OBC के लिए क्या है कानून?

संविधान में अनुसूचित जातियों के आरक्षण के मामले में प्रावधान पूरे देश में एक जैसे है, लेकिन OBC कैटेगरी में राज्यों को कुछ हद तक नीति बनाने का अधिकार है. OBC लिस्ट और उससे जुड़ी नीतियों में राज्यों की भूमिका ज्यादा होती है. यही वजह है कि अलग-अलग राज्यों में अलग व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट कोई संवैधानिक सिद्धांत तय करता है या संसद नया कानून लेकर आती है, तब पूरे देश में ज्यादा समानता होने की उम्मीद है. वहीं, अगर केंद्र सरकार चाहे तो संसद के जरिए संविधान (Scheduled Castes) Order, 1950 या उससे जुड़े कानूनों में संशोधन कर सकती है.

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First published on: Sep 19, 2026 12:20 PM

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About the Author

Varsha Sikri

वर्षा सिकरी News24 हिंदी डिजिटल में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. जर्नलिज्म में 9 साल का अनुभव रखने वाली वर्षा सिकरी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. वर्षा सिकरी ने सितंबर 2017 में इंडिया टीवी से अपने करियर की शुरुआत की थी, जिसके बाद से उन्होंने रिपब्लिक टीवी, जी न्यूज, आज तक जैसे चैनलों में काम किया. फिलहाल वो News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 9 साल के करियर में वर्षा सिकरी ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. वर्षा सिकरी का पत्रकारिता में अनुभव: 9 साल योग्यता: NRAI स्कूल ऑफ मास कम्यूनिकेशन से ग्रेजुएशन करने के बाद वर्षा सिकरी ने मीडिया में अपने करियर की शुरुआत की. उन्होंने बतौर एंकर और रिपोर्टर भी काम किया है.

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