SC/ST राहत राशि मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, दुरुपयोग की शिकायत मिलने पर पूरे राज्य में जांच के आदेश

SC/ST एक्ट के तहत पीड़ितों को मिलने वाली राहत राशि में कथित अनियमितताओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने सरकारी धन के इस्तेमाल की जांच के निर्देश देते हुए राहत वितरण में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर दिया.

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SC/ST राहत राशि के दुरुपयोग पर HC सख्त (फोटो- X)

Allahabad High Court Decision: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ितों को मिलने वाली आर्थिक सहायता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने राहत राशि के वितरण और उसके दावों में संभावित गड़बड़ी को गंभीरता से लेते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में व्यवस्था की जांच के आदेश दिए हैं. कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि सरकारी धन से दी जाने वाली राहत वास्तव में जरूरतमंद पीड़ितों तक पहुंच रही है या कहीं इसका गलत इस्तेमाल तो नहीं हो रहा.

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बता दें कि ये मामला झांसी जिले से जुड़ी कुछ आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान सामने आया. सुनवाई में राहत राशि के भुगतान को लेकर कई सवाल उठे. अदालत को बताया गया कि कुछ मामलों में पीड़ितों के लिए निर्धारित आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन भुगतान की प्रक्रिया में पूरी राशि जारी नहीं की गई. इससे राहत योजना के क्रियान्वयन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हुए.

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जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने झांसी निवासी अरविंद कुमार और संतोष कुमार धोहरे समेत अन्य की ओर से दाखिल आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. ये अपीलें झांसी की विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) अदालत द्वारा 23 जुलाई 2024 को दिए गए निर्णय को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थीं. निचली अदालत ने अपने फैसले में बकाया राहत राशि के भुगतान की मांग को लेकर दाखिल आवेदनों को स्वीकार नहीं किया था. इसी आदेश के खिलाफ अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया था. वहीं, पहला मामला झांसी के थाना कोतवाली में IPC की धारा 170, 323, 504, 506, SC/ST एक्ट और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत दर्ज की गई है. वहीं, दूसरा मामला थाना सिपरी बाजार में दर्ज FIR से जुड़ा हुआ है.

क्या है पूरा मामला?

अपीलकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट ब्रज मोहन सिंह ने अदालत को बताया कि मामले की जांच पूरी होने के बाद विवेचक ने प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि दिए जाने की सिफारिश की थी. SC/ST नियमों के मुताबिक, चार्जशीट दाखिल होने तक इस राशि का 75 फीसदी हिस्सा यानी 1.50 लाख रुपये पीड़ित को मिल जाना चाहिए था.

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आरोप है कि झांसी के जिला समाज कल्याण अधिकारी ने नियमों के अनुरूप पूरी रकम जारी करने के बजाय महज 37.5 फीसदी, यानी 75 हजार रुपये का ही भुगतान किया. पीड़ितों ने शेष राशि हासिल करने के लिए कई बार अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उन्हें बकाया रकम नहीं मिली.

इसके बाद पीड़ितों ने SC/ST नियमावली के नियम 12(4) और 12(7) का हवाला देते हुए विशेष अदालत में आवेदन दाखिल किया. हालांकि, विशेष अदालत ने यह कहते हुए उनकी मांग खारिज कर दी कि उसे अपराध की प्रकृति तय करने या राहत राशि की रकम में इजाफा करने का अधिकार नहीं है. इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.

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हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संतोष राय की बेंच ने निचली अदालत के फैसले को सही नहीं माना. हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत की भूमिका केवल मामले की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे यह भी देखना होगा कि पीड़ित को नियमों के मुताबिक राहत राशि समय पर और पूरी मिली या नहीं.

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित अधिकारी राहत राशि जारी करने में मनमानी करते हैं या नियमों के विपरीत रकम कम कर देते हैं, तो विशेष अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. ऐसी स्थिति में अदालत बकाया राहत राशि का भुगतान कराने का आदेश भी दे सकती है.

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हाईकोर्ट ने माना कि नियम 12(7) की निचली अदालत ने गलत व्याख्या की थी. अदालत के मुताबिक, विशेष न्यायालयों को केवल औपचारिक संस्था मानना SC/ST कानून के उस उद्देश्य के खिलाफ है, जिसके तहत पीड़ितों को समय पर न्याय और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है.

झांसी DM और SSP तीन महीने में पूरी करें जांच-HC

हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार की ओर से दर्ज कराए गए सभी मुकदमों और इन मामलों में मिली राहत राशि की निष्पक्ष जांच करने का निर्देश दिया है. अदालत ने दोनों अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ यह जांच तीन महीने में पूरी करने को कहा है.

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान यदि सरकारी योजना के दुरुपयोग, फर्जी दावे या किसी तरह की धोखाधड़ी सामने आती है तो केवल संबंधित लाभार्थियों पर ही कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि मामले में भूमिका निभाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कानूनी और आपराधिक कार्रवाई की जाएगी.

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पूरे प्रदेश में दावों की जांच के निर्देश

हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट और नियमावली 1995 के तहत बार-बार मुआवजे या राहत का दावा करने वाले लोगों के मामलों की प्रदेश भर में जांच कराने के निर्देश दिए हैं. अदालत ने राज्य सरकार से ऐसी व्यवस्था तैयार करने को कहा है, जिससे इन योजनाओं की निगरानी प्रभावी तरीके से की जा सके और गलत दावों पर समय रहते रोक लगाई जा सके.

अदालत ने सरकार को एक मजबूत नियामक तंत्र और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली सरकारी सहायता का लाभ वास्तविक पीड़ितों तक ही पहुंचे और योजना का किसी भी स्तर पर दुरुपयोग न हो.

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इसके साथ ही प्रदेश के सभी जिलों में एससी/एसटी एक्ट के तहत मामलों की सुनवाई करने वाले विशेष न्यायाधीशों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है. कोर्ट ने कहा कि मामलों की गंभीरता से निगरानी जरूरी है, ताकि कानून के प्रावधानों और सरकारी सहायता का गलत इस्तेमाल न किया जा सके.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

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वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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