महिला आरक्षण कितनी बड़ी 'अग्नि परीक्षा'… क्या मोदी सरकार जुटा पाएगी वो 'जादुई नंबर'? समझिए आंकड़ों का खेल

किसी भी सामान्य विधेयक को पारित करने के लिए साधारण बहुमत काफी होता है, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लिए नियम कड़े हैं. सरकार को इसे पारित कराने के लिए ‘विशेष बहुमत’ की आवश्यकता होगी.

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भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर उबाल पर है. केंद्र सरकार की ओर से महिला आरक्षण को 2029 तक प्रभावी बनाने के मकसद से लाए गए तीन विधेयकों ने संसद के भीतर ‘शक्ति परीक्षण’ की स्थिति पैदा कर दी है. जहां इस बिल को लेकर विपक्ष दल भाजपा पर सियासत करने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं पीएम मोदी कह रहे है कि हमें क्रेडिट नहीं चाहिए, बेशक आप ले लिजिए, आप बस बिल पास कराने में मदद कर दीजिए. साथ ही कहा कि इसके लिए मैं ब्लैंक चेक देकर इसकी गारंटी दे सकता हूं.

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क्यों अहम है ‘विशेष बहुमत’ की चुनौती?

किसी भी सामान्य विधेयक को पारित करने के लिए साधारण बहुमत काफी होता है, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लिए नियम कड़े हैं. सरकार को इसे पारित कराने के लिए ‘विशेष बहुमत’ की आवश्यकता होगी. इसका मतलब है कि सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन, जो कि सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से कम न हो. यही वजह है कि विपक्ष अब आंकड़ों के जरिए सरकार की घेराबंदी करने में जुटा है.

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लोकसभा में क्या है जादुई आंकड़ा की तलाश

लोकसभा में अगर सभी सदस्य उपस्थित रहते हैं, तो संविधान संशोधन के लिए 360 वोटों की जरूरत होगी. अभी NDA का आंकड़ा देखें तो बीजेपी के पास अपने 240 सांसद हैं. सहयोगियों को मिलाकर एनडीए का कुल आंकड़ा 293 (बिना निर्दलीय) तक पहुंचता है. वहीं, विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले गैर-एनडीए खेमे के पास 241 सदस्य हैं. अकेले कांग्रेस के 98 सांसद हैं. साफ है कि लोकसभा में 360 का आंकड़ा छूने के लिए सरकार को एनडीए से बाहर की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन की सख्त जरूरत होगी.

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राज्यसभा में भी फंसा है पेच?

राज्यसभा में भी राह आसान नहीं है. यहां एनडीए की कुल ताकत फिलहाल 145 के आसपास है, जिसमें बीजेपी के 106 सदस्य और अन्य सहयोगियों (TDP, JD(U), NCP, आदि) के वोट शामिल हैं. वहीं, विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस (29), टीएमसी (13) और आप (10) जैसी पार्टियां एकजुट होकर कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं. यहां बीजेडी (6) और बीआरएस (3) जैसी पार्टियों का रुख निर्णायक साबित हो सकता है.

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लेखक के बारे में

Arif Khan

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आरिफ खान मंसूरी न्यूज 24 में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. आरिफ को डिजिटल पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा अनुभव हैं. उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लगातार तीन लोकसभा चुनाव के अलावा पिछले 15 सालों में देशभर में हुए विधानसभा चुनावों की भी व्यापक कवरेज की है. न्यूज 24 से पहले उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी, यहां देश, दुनिया और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम किया. आरिफ ने इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की हिंदी वेबसाइट जनसत्ता के साथ अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की हिंदी न्यूज वेबसाइट लाइवहिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. लाइवहिंदुस्तान.कॉम के बाद वह एनडीटीवी ग्रुप के साथ जुड़ गए. एनडीटीवी में करीब छह साल तक काम करने के बाद न्यूज24 के साथ जुड़ गए. न्यूज24 में भी होमपेज की जिम्मेदारी संभालते हैं. शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की है. आरिफ देश, विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरों के अलावा एक्सप्लेनर लिखने में भी माहिर हैं.
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