US-Iran War: क्या है अब्राहम अकॉर्ड? जिसमें ईरान को शामिल कर सकते हैं ट्रंप, जानें कहां तक पहुंची समझौते की बात
ईरान और अमेरिका की जंग खत्म होने के करीब है. दोनों देश अब एक डील फाइनल करने वाले हैं. इस फैसले से जहां पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है तो वहीं मुस्लिम देशों के लिए एक नई मुसीबत आने वाली है. ट्रंप मुस्लिम और अरब देशों पर इजरायल से संबंध सामान्य करने का दबाव बना रहे हैं.
Edited By : Versha Singh|Updated: May 25, 2026 10:39
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ईरान और अमेरिका की जंग खत्म होने के करीब है. दोनों देश अब एक डील फाइनल करने वाले हैं. इस फैसले से जहां पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है तो वहीं मुस्लिम देशों के लिए एक नई मुसीबत आने वाली है. ट्रंप मुस्लिम और अरब देशों पर इजरायल से संबंध सामान्य करने का दबाव बना रहे हैं.
मिली जानकारी के अनुसार, शनिवार को ट्रंप ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं के साथ फोन पर बात की. इसमें ट्रंप ने ऐसी बात कही, जिससे हर देश चौंक गया और कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया. ट्रंप ने कहा कि ईरान जंग खत्म होने के बाद अगला कदम होगा कि अरब और मुस्लिम देश इजरायल से समझौता सामान्य करें और अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों.
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, बातचीत का मकसद ईरान के साथ उभरती डील पर चर्चा करना था. इस दौरान यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद जैसे नेताओं ने डील का समर्थन किया. एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा, ‘सबने ट्रंप से कहा कि हम इस डील में आपके साथ हैं और अगर यह काम नहीं करती, तब भी हम आपके साथ हैं.’ लेकिन इसी बातचीत में ट्रंप ने अचानक नया मुद्दा उठा दिया.
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप ने नेताओं से कहा कि वह अब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन करने जा रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि जल्द ही इजरायल के नेता भी इसी तरह की कॉल में शामिल होंगे.
क्या है अब्राहम अकॉर्ड?
अब्राहम अकॉर्ड अमेरिकी मध्यस्थता में तैयार किया गया एक ऐतिहासिक समझौता है. इसका मकसद अरब देशों और इजरायल के बीच दुश्मनी को खत्म कर कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को सामान्य करना है. कोरोना काल में हुए इस समझौते से सबसे पहले बहरीन और यूएई जैसे देश जुड़े और इजरायल के साथ औपचारिक संबंधों की शुरुआत की. बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए. इस समझौते का एक बड़ा मकसद इजरायल और अरब देशों को एक साथ लाकर मिडिल ईस्ट में ईरान के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करना भी था. लेकिन अब ट्रंप खुद ईरान को ही इस ग्रुप में लाने की बात कह रहे हैं.
गौरतलब है कि साल 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान और इजरायल के बीच अच्छे संबंध थे. हालांकि अयातुल्लाओं के सत्ता में आने के बाद 'इजरायल की तबाही' ईरान की विदेश नीति का मुख्य हिस्सा बन गया. ईरान ने इजरायल सहित इलाके में अपने सभी दुश्मनों से लड़ने के लिए हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों का एक 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' खड़ा कर दिया. वहीं इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर हालिया हमलों से ईरान का पारा और बढ़ा दिया है. ऐसे में ईरान का अब्राहम अकॉर्ड से जुड़ना फिलहाल मुश्किल है.
ईरान भी अब्राहम समझौते में होगा शामिल?
इसके बाद ट्रंप ने कहा कि उनके दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ अगले कुछ हफ्तों में इस मुद्दे पर आगे बातचीत करेंगे. रविवार को ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर भी इस बात का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, ‘मैं मिडिल ईस्ट के सभी देशों को उनके समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं. यह सहयोग और मजबूत होगा अगर वे ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं.’
ट्रंप ने यहां तक इशारा किया कि एक दिन ईरान भी अब्राहम समझौते में शामिल हो सकता है. हालांकि इसके लिए तेहरान को इजरायल को मान्यता देनी होगी, जिसे ईरान दशकों से ठुकराता आया है.
क्या सऊदी अरब मानेगा ट्रंप की बात?
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी ट्रंप की इस पहल का समर्थन किया. ग्राहम ने एक्स पर लिखा, ‘अगर ईरान संघर्ष खत्म करने वाली बातचीत के नतीजे में हमारे अरब और मुस्लिम सहयोगी अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो यह मिडिल ईस्ट के इतिहास के सबसे बड़े समझौतों में से एक होगा.’ ग्राहम ने सऊदी अरब और दूसरे देशों को सीधी चेतावनी भी दी. उन्होंने लिखा, ‘अगर आप ट्रंप के सुझाए इस रास्ते पर नहीं चलते, तो हमारे भविष्य के रिश्तों पर गंभीर असर पड़ेगा और यह शांति प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं रहेगा. इतिहास इसे बड़ी भूल के तौर पर देखेगा.’ हालांकि सबसे बड़ा सवाल सऊदी अरब को लेकर है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन पिछले एक साल में उनका रुख ठंडा पड़ गया है.
मध्य पूर्व को बदलना होगा: ग्राहम
सऊदी अरब और बाकी देशों से अपील करते हुए ट्रंप के करीबी लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अब समय आ गया है कि एक नए मध्य-पूर्व के भविष्य के लिए हिम्मत दिखाएं. जैसा राष्ट्रपति ट्रंप ने सुझाव दिया है, अगर आप अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होंगे तो अरब-इजरायल संघर्ष को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे.
ईरान और अमेरिका की जंग खत्म होने के करीब है. दोनों देश अब एक डील फाइनल करने वाले हैं. इस फैसले से जहां पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है तो वहीं मुस्लिम देशों के लिए एक नई मुसीबत आने वाली है. ट्रंप मुस्लिम और अरब देशों पर इजरायल से संबंध सामान्य करने का दबाव बना रहे हैं.
मिली जानकारी के अनुसार, शनिवार को ट्रंप ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं के साथ फोन पर बात की. इसमें ट्रंप ने ऐसी बात कही, जिससे हर देश चौंक गया और कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया. ट्रंप ने कहा कि ईरान जंग खत्म होने के बाद अगला कदम होगा कि अरब और मुस्लिम देश इजरायल से समझौता सामान्य करें और अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों.
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अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, बातचीत का मकसद ईरान के साथ उभरती डील पर चर्चा करना था. इस दौरान यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद जैसे नेताओं ने डील का समर्थन किया. एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा, ‘सबने ट्रंप से कहा कि हम इस डील में आपके साथ हैं और अगर यह काम नहीं करती, तब भी हम आपके साथ हैं.’ लेकिन इसी बातचीत में ट्रंप ने अचानक नया मुद्दा उठा दिया.
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप ने नेताओं से कहा कि वह अब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन करने जा रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि जल्द ही इजरायल के नेता भी इसी तरह की कॉल में शामिल होंगे.
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क्या है अब्राहम अकॉर्ड?
अब्राहम अकॉर्ड अमेरिकी मध्यस्थता में तैयार किया गया एक ऐतिहासिक समझौता है. इसका मकसद अरब देशों और इजरायल के बीच दुश्मनी को खत्म कर कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को सामान्य करना है. कोरोना काल में हुए इस समझौते से सबसे पहले बहरीन और यूएई जैसे देश जुड़े और इजरायल के साथ औपचारिक संबंधों की शुरुआत की. बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए. इस समझौते का एक बड़ा मकसद इजरायल और अरब देशों को एक साथ लाकर मिडिल ईस्ट में ईरान के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करना भी था. लेकिन अब ट्रंप खुद ईरान को ही इस ग्रुप में लाने की बात कह रहे हैं.
गौरतलब है कि साल 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान और इजरायल के बीच अच्छे संबंध थे. हालांकि अयातुल्लाओं के सत्ता में आने के बाद ‘इजरायल की तबाही’ ईरान की विदेश नीति का मुख्य हिस्सा बन गया. ईरान ने इजरायल सहित इलाके में अपने सभी दुश्मनों से लड़ने के लिए हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों का एक ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ खड़ा कर दिया. वहीं इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर हालिया हमलों से ईरान का पारा और बढ़ा दिया है. ऐसे में ईरान का अब्राहम अकॉर्ड से जुड़ना फिलहाल मुश्किल है.
ईरान भी अब्राहम समझौते में होगा शामिल?
इसके बाद ट्रंप ने कहा कि उनके दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ अगले कुछ हफ्तों में इस मुद्दे पर आगे बातचीत करेंगे. रविवार को ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर भी इस बात का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, ‘मैं मिडिल ईस्ट के सभी देशों को उनके समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं. यह सहयोग और मजबूत होगा अगर वे ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं.’
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ट्रंप ने यहां तक इशारा किया कि एक दिन ईरान भी अब्राहम समझौते में शामिल हो सकता है. हालांकि इसके लिए तेहरान को इजरायल को मान्यता देनी होगी, जिसे ईरान दशकों से ठुकराता आया है.
क्या सऊदी अरब मानेगा ट्रंप की बात?
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी ट्रंप की इस पहल का समर्थन किया. ग्राहम ने एक्स पर लिखा, ‘अगर ईरान संघर्ष खत्म करने वाली बातचीत के नतीजे में हमारे अरब और मुस्लिम सहयोगी अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो यह मिडिल ईस्ट के इतिहास के सबसे बड़े समझौतों में से एक होगा.’ ग्राहम ने सऊदी अरब और दूसरे देशों को सीधी चेतावनी भी दी. उन्होंने लिखा, ‘अगर आप ट्रंप के सुझाए इस रास्ते पर नहीं चलते, तो हमारे भविष्य के रिश्तों पर गंभीर असर पड़ेगा और यह शांति प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं रहेगा. इतिहास इसे बड़ी भूल के तौर पर देखेगा.’ हालांकि सबसे बड़ा सवाल सऊदी अरब को लेकर है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन पिछले एक साल में उनका रुख ठंडा पड़ गया है.
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मध्य पूर्व को बदलना होगा: ग्राहम
सऊदी अरब और बाकी देशों से अपील करते हुए ट्रंप के करीबी लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अब समय आ गया है कि एक नए मध्य-पूर्व के भविष्य के लिए हिम्मत दिखाएं. जैसा राष्ट्रपति ट्रंप ने सुझाव दिया है, अगर आप अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होंगे तो अरब-इजरायल संघर्ष को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे.
If in fact as a result of these negotiations to end the Iranian conflict, our Arab and Muslim allies in the region agreed to join the Abraham Accords, it would make this agreement one of the most consequential in the history of the Middle East.