दिल्ली-NCR के लिए फेफड़ों का काम करने वाला 'अरावली का सुरक्षा कवच' खतरे में है. सुप्रीम कोर्ट की एक नई परिभाषा ने अरावली के 90% हिस्से को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया है. नई परिभाषा की वजह से जो क्षेत्र पहले संरक्षित थे, वे अब खनन और निर्माण के लिए खोले जा सकते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर अरावली की पहाड़ियों को काटकर वहां कंक्रीट का जंगल बनाया गया तो आने वाले समय में दिल्ली न केवल सांस लेने के लिए तरसेगी बल्कि भीषण जल संकट और रेगिस्तानी गर्मी की चपेट में भी आ जाएगी. अरावली पहाड़ियां करीब 1.5 बिलियन वर्ष पुरानी हैं. दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से है. दिल्ली-एनसीआर के लोग जो स्वच्छ हवा सांस में लेते हैं, वह केवल इन्हीं पहाड़ियों की वजह से मुमकिन हो रहा है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के मुताबिक, केवल उन्हीं पहाड़ियों को अरावली पर्वत माला जाएगा, जो स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक उंची हैं. हालांकि, इसको लेकर राजस्थान से लेकर दिल्ली तक काफी विवाद हो रहा है. इसको लेकर राजनेता और पर्यावरणविद चिंता के साथ-साथ अपना गुस्सा भी जाहिर कर रहे हैं. एक्सपर्ट्स के मुबातिक, अरावली की 90 फीसदी पहाड़ियां 100 मीटर से कम उंची हैं. ऐसे में ये पहाड़ियां संक्षरण से बाहर हो जाएंगी. इसकी वजह से यहां पर खनन और निर्माण कार्य बढ़ जाएगा. जिसकी वजह से पूरा इको-सिस्टम गड़बड़ हो सकता है.
अब जानिए, अगर अरावली की पहाड़ियों खत्म होती हैं तो दिल्ली-NCR के लोगों पर क्या असर पड़ेगा…
सांस के लिए साफ हवा नहीं
दिल्ली का अपना कोई जंगल नहीं है, इसलिए यह साफ हवा के लिए अरावली की पहाड़ियां पर निर्भर है. दिल्ली के नजदीक केवल यही एक बड़ा हरियाली वाला इलाका है. यह इसके लिए फेफड़ों की तरह काम करता है. इसकी वजह से दिल्ली के लोगों को सांस के लिए साफ हवा मिलती है. इसके बिना दिल्ली रहने लायक भी नहीं रहेगी.
यह भी पढ़ें : खतरे में अरावली, 90% पहाड़ियां सुरक्षा से बाहर, इकोसिस्टम तबाह कर सकता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश
चलेंगी धूल भरी आंधी
अरावली की पहाड़ियां राजस्थान से आने वाली गर्म और धूल भरी हवाओं को दिल्ली तक आने से रोकती हैं. अगर ये पहाड़ियां कमजोर हुईं तो दिल्ली में भीषण धूल भरी आंधियों, गर्म हवा चलेगी.
गर्मी से तपेगा शहर
इसके अलावा शहर के तापमान में भी बढ़ोतरी होगी, जिसकी वजह से यहां के लोगों को ज्यादा गर्मी का सामना करना पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अरावली पर्वत की बायोडायवर्सिटी प्रदूषण कंट्रोल में भी मदद करती है. इसके पेड़, मिट्टी और वनस्पतियां हानिकारक कणों को सोख लेती हैं.
तेजी से बढ़ेगा वायु प्रदूषण
दिल्ली पहले से ही सभी ऋतुओं में चरम मौसम का अनुभव करती है. यहां बारिश, गर्मी और सर्दी खूब पड़ती है. अरावली को नुकसान पहुंचने पर दिल्ली-एनसीआर की हवा तेजी से प्रदूषित होगी. गर्मियों में धूल और रेत का सामना करना पड़ सकता है.
यह भी पढ़ें : 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने जिस ‘100 मीटर’ फार्मूले को खारिज किया, उसे 2024 में भाजपा सरकार ने क्यों ठहराया सही?: अशोक गहलोत
गहरा जाएगा जल संकट
अरावली की पहाड़ियां बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने देती हैं. इससे ग्राउंड वाटर लेवल अच्छा रहता है. अगर अरावली की पहाड़ियों पर निर्माण कर दिया गया, तो पानी जमीन में जाने के बजाय बह जाएगा, जिससे दिल्ली का जल संकट और गहरा जाएगा. इतना ही नहीं, इसकी वजह से दिल्ली में बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है.
दिल्ली-NCR के लिए फेफड़ों का काम करने वाला ‘अरावली का सुरक्षा कवच’ खतरे में है. सुप्रीम कोर्ट की एक नई परिभाषा ने अरावली के 90% हिस्से को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया है. नई परिभाषा की वजह से जो क्षेत्र पहले संरक्षित थे, वे अब खनन और निर्माण के लिए खोले जा सकते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर अरावली की पहाड़ियों को काटकर वहां कंक्रीट का जंगल बनाया गया तो आने वाले समय में दिल्ली न केवल सांस लेने के लिए तरसेगी बल्कि भीषण जल संकट और रेगिस्तानी गर्मी की चपेट में भी आ जाएगी. अरावली पहाड़ियां करीब 1.5 बिलियन वर्ष पुरानी हैं. दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से है. दिल्ली-एनसीआर के लोग जो स्वच्छ हवा सांस में लेते हैं, वह केवल इन्हीं पहाड़ियों की वजह से मुमकिन हो रहा है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के मुताबिक, केवल उन्हीं पहाड़ियों को अरावली पर्वत माला जाएगा, जो स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक उंची हैं. हालांकि, इसको लेकर राजस्थान से लेकर दिल्ली तक काफी विवाद हो रहा है. इसको लेकर राजनेता और पर्यावरणविद चिंता के साथ-साथ अपना गुस्सा भी जाहिर कर रहे हैं. एक्सपर्ट्स के मुबातिक, अरावली की 90 फीसदी पहाड़ियां 100 मीटर से कम उंची हैं. ऐसे में ये पहाड़ियां संक्षरण से बाहर हो जाएंगी. इसकी वजह से यहां पर खनन और निर्माण कार्य बढ़ जाएगा. जिसकी वजह से पूरा इको-सिस्टम गड़बड़ हो सकता है.
अब जानिए, अगर अरावली की पहाड़ियों खत्म होती हैं तो दिल्ली-NCR के लोगों पर क्या असर पड़ेगा…
सांस के लिए साफ हवा नहीं
दिल्ली का अपना कोई जंगल नहीं है, इसलिए यह साफ हवा के लिए अरावली की पहाड़ियां पर निर्भर है. दिल्ली के नजदीक केवल यही एक बड़ा हरियाली वाला इलाका है. यह इसके लिए फेफड़ों की तरह काम करता है. इसकी वजह से दिल्ली के लोगों को सांस के लिए साफ हवा मिलती है. इसके बिना दिल्ली रहने लायक भी नहीं रहेगी.
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चलेंगी धूल भरी आंधी
अरावली की पहाड़ियां राजस्थान से आने वाली गर्म और धूल भरी हवाओं को दिल्ली तक आने से रोकती हैं. अगर ये पहाड़ियां कमजोर हुईं तो दिल्ली में भीषण धूल भरी आंधियों, गर्म हवा चलेगी.
गर्मी से तपेगा शहर
इसके अलावा शहर के तापमान में भी बढ़ोतरी होगी, जिसकी वजह से यहां के लोगों को ज्यादा गर्मी का सामना करना पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अरावली पर्वत की बायोडायवर्सिटी प्रदूषण कंट्रोल में भी मदद करती है. इसके पेड़, मिट्टी और वनस्पतियां हानिकारक कणों को सोख लेती हैं.
तेजी से बढ़ेगा वायु प्रदूषण
दिल्ली पहले से ही सभी ऋतुओं में चरम मौसम का अनुभव करती है. यहां बारिश, गर्मी और सर्दी खूब पड़ती है. अरावली को नुकसान पहुंचने पर दिल्ली-एनसीआर की हवा तेजी से प्रदूषित होगी. गर्मियों में धूल और रेत का सामना करना पड़ सकता है.
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गहरा जाएगा जल संकट
अरावली की पहाड़ियां बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने देती हैं. इससे ग्राउंड वाटर लेवल अच्छा रहता है. अगर अरावली की पहाड़ियों पर निर्माण कर दिया गया, तो पानी जमीन में जाने के बजाय बह जाएगा, जिससे दिल्ली का जल संकट और गहरा जाएगा. इतना ही नहीं, इसकी वजह से दिल्ली में बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है.