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65% साइलेंट वोटर्स ने बदला बांकीपुर का गणित! कैसे प्रशांत किशोर की पहली जीत ने किया BJP को सोचने को मजबूर

बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव ने राज्य की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों से हराकर न सिर्फ अपनी पहली विधानसभा जीत दर्ज की, बल्कि बीजेपी के संगठन, रणनीति और बूथ मैनेजमेंट पर भी बहस छेड़ दी है

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बिहार, मध्यप्रदेश और गुजरात की जिन तीन सीटों बांकीपुर, दतिया और मंजालपुर में उपचुनाव रहे हैं, ये तीनों बीजेपी की जिताऊ सीट रही हैं. लेकिन जीत मिली सिर्फ गुजरात की मंजिलपुर सीट पर. दो में बीजेपी को करारी हार का सामन करना पड़ा. राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है. खास कर बिहार की बांकीपुर विधानसभा की हार पर. बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव ने राज्य की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों से हराकर न सिर्फ अपनी पहली विधानसभा जीत दर्ज की, बल्कि बीजेपी के संगठन, रणनीति और बूथ मैनेजमेंट पर भी बहस छेड़ दी है.

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा मतदान का है. बांकीपुर विधानसभा में कुल 3,79,402 मतदाता थे, लेकिन मतदान केवल 1,30,313 लोगों ने किया. यानी महज 34.5 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि 2,49,089 मतदाता (करीब 65.65 प्रतिशत) वोट डालने ही नहीं पहुंचे.

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किसे कितने वोट मिले?

जनसुराज के प्रशांत किशोर – 64,115 वोट (49.23%)
बीजेपी के नीरज कुमार – 44,827 वोट (34.40%)
राजद की रेखा कुमारी – 14,273 वोट (10.95%)
अन्य 22 प्रत्याशी – 7,098 वोट
नोटा – 646 वोट

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इस उपचुनाव की सबसे बड़ी कहानी शायद जीत-हार से ज्यादा कम मतदान है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब ढाई लाख मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे? क्या यह मतदाताओं की उदासीनता थी, या उपचुनाव को लेकर उत्साह की कमी? या फिर राजनीतिक दल अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाने में विफल रहे?

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क्या बीजेपी ने उम्मीदवार चयन में गलती की?

राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि क्या बीजेपी ने उम्मीदवार चयन में चूक की. जिस सीट को पार्टी की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था, वहां उम्मीदवार को लेकर सवाल पहले से उठ रहे थे. इस चुनाव को इसलिए भी अहम माना जा रहा था क्योंकि इसे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की राजनीतिक साख से जोड़कर देखा जा रहा था. ऐसे में हार ने स्वाभाविक रूप से पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं.

बूथ मैनेजमेंट पर भी उठे सवाल

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसके बूथ मैनेजमेंट को माना जाता है. लेकिन जब कुल मतदान ही 34.5 प्रतिशत पर सिमट गया, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पार्टी अपने पारंपरिक वोटरों को मतदान केंद्र तक लाने में सफल नहीं रही? या फिर मतदाताओं ने जानबूझकर दूरी बनाई?

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क्या सीजेपी आंदोलन का असर दिखा?

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा भी है कि हाल के सीजेपी आंदोलन और उसके बाद बने राजनीतिक माहौल का इस चुनाव पर कोई प्रभाव पड़ा या नहीं. हालांकि, कम मतदान इस सवाल को भी जन्म देता है कि यदि माहौल इतना मजबूत था, तो बड़ी संख्या में मतदाता मतदान से दूर क्यों रहे?

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प्रशांत किशोर की संयमित प्रतिक्रिया

जीत के बाद प्रशांत किशोर का रवैया अपेक्षाकृत संयमित दिखाई दिया. उन्होंने आक्रामक राजनीतिक बयानबाजी से बचते हुए इसे जनता का जनादेश बताया. यह भी संकेत माना जा रहा है कि वे अब खुद को केवल आंदोलनकारी या चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि एक गंभीर विधायक और विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.

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बिहार की राजनीति में नई चुनौती

अब प्रशांत किशोर केवल चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा के सदस्य भी हैं. विधानसभा के भीतर उनकी सीधी राजनीतिक और वैचारिक टक्कर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और एनडीए सरकार से होगी.

बांकीपुर का यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का परिणाम नहीं है. यह बीजेपी के लिए आत्ममंथन का मौका है और प्रशांत किशोर के लिए बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में एक नई शुरुआत. हालांकि, यह देखना बाकी होगा कि इस जीत का असर अगले विधानसभा चुनाव तक कितना कायम रहता है और क्या यह परिणाम बिहार की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत है या केवल उपचुनाव तक सीमित संदेश.

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First published on: Aug 04, 2026 05:05 PM

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