Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस सबसे गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले विद्रोही गुट ने 60 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए खुद को ‘असली विधायी दल’ के रूप में पेश करने की कोशिश की है. इस हाई-प्रोफाइल बगावत के बाद अब बंगाल की राजनीति पूरी तरह कानूनी दांव-पेंचों और नंबर गेम में उलझ गई है. अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या टीएमसी का हाल भी एनसीपी और शिवसेना की तरह होगा. क्या टीएमसी भी दो हिस्सों में बंट जाएगी. खास ध्यान इस बात पर है कि इस पूरे मामले में दलबदल विरोधी कानून की क्या भूमिका रहती है? क्या टीएमसी के विद्रोही गुट को असली पार्टी का तमगा मिलता है या उनकी सदस्यता पर आंच आएगी.
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत अपनी सदस्यता बचाने के लिए बागी गुट को एक कड़ा नंबर पार करना होता है. अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल दल से अलग होते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता तुरंत रद्द नहीं की जा सकती.
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बंगाल विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायक हैं. इस लिहाज से बागी गुट को कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम 54 विधायकों का लिखित समर्थन दिखाना अनिवार्य होगा. विद्रोही गुट ने 60 विधायकों के हस्ताक्षर का दावा किया है. यदि यह संख्या जांच में सही पाई जाती है, तो बागी गुट खुद को विधानसभा में एक स्वतंत्र समूह के रूप में मान्यता दिलाने या किसी अन्य दल में विलय करने के लिए कानूनी रूप से पात्र हो जाएगा.
बागी गुट के दावे के बाद अब पूरी गेंद विधानसभा स्पीकर के पाले में है. इस स्थिति में स्पीकर की भूमिका सबसे निर्णायक हो जाती है. सबसे पहले स्पीकर यह जांच करेंगे कि बागी गुट द्वारा सौंपे गए विधायकों के हस्ताक्षर असली हैं या नहीं और क्या वाकई उनके पास 54 से अधिक विधायकों का समर्थन है.
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बागी गुट का दावा है कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि वही ‘असली टीएमसी’ हैं. ऐसे में स्पीकर को यह तय करना होगा कि सदन के भीतर आधिकारिक टीएमसी किसे माना जाए.
पॉलिटिकल ड्रामा में नंबर्स कभी भी बदल सकते हैं. अगर जांच के दौरान या किसी विधायक के पाला बदलने से बागियों की संख्या 54 से नीचे (दो-तिहाई से कम) गिर जाती है, तो पूरा परिदृश्य पलट जाएगा. दो-तिहाई से कम संख्या होने पर दलबदल विरोधी कानून के तहत सभी बागी विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द की जा सकती है. अगर बड़ी संख्या में विधायकों की सदस्यता जाती है, तो राज्य में बड़े पैमाने पर विधानसभा उपचुनावों की स्थिति बन जाएगी, जो राज्य की सत्ता का समीकरण बदल सकती है.
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यह लड़ाई सिर्फ विधानसभा के भीतर तक सीमित नहीं रहेगी. अगर यह विवाद लंबा खिंचता है, तो मामला चुनाव आयोग तक भी पहुंचेगा. सदन के बाहर ‘असली पार्टी’ कौन है और टीएमसी के चुनाव चिह्न पर किसका अधिकार होगा, इसका फैसला चुनाव आयोग विधायकों और सांसदों के कुल बहुमत के प्रतिशत के आधार पर करेगा.
टीएमसी की यह बगावत अब पूरी तरह से ‘नंबर गेम’ और ‘कानूनी व्याख्या’ के बीच फंस चुकी है. यदि ऋतब्रत बनर्जी अपने साथ 54 से अधिक विधायकों को अंत तक बनाए रखने में सफल होते हैं, तो वे कानूनी रूप से सुरक्षित रहेंगे. लेकिन अगर इस आंकड़े में जरा भी चूक हुई, तो ममता बनर्जी का पलटवार बागियों का सियासी करियर दांव पर लगा सकता है.
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टीएमसी की बागी विधायकों की मांग है कि ऋतब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष बनाया जाए, जिससे ममता बनर्जी ने इनकार कर दिया था. इसके बाद बुधवार को इस विद्रोही गुट ने सीधे विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित करने के लिए 60 विधायकों के हस्ताक्षरों की सूची सौंप दी. फिर स्पीकर ने नेता विपक्ष के तौर पर ऋतब्रत बनर्जी के नाम को मंजूरी भी दे दी.
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