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पुराने ‘दोस्त’ भी कांग्रेस को क्यों कह रहे ‘मुस्लिम लीग’? जानिए क्यों ‘जी का जंजाल’ बने ये चुनावी आंकड़े

कांग्रेस ने असम की 99 सीटों में से 19 पर जीत हासिल की, जिनमें जीतने वाले 18 मुस्लिम उम्मीदवार हैं. वहीं, बंगाल में 292 सीटों में से केवल दो सीटें कांग्रेस के खाते में आई हैं, वहां भी जीतने वाले दोनों ही मुस्लिम हैं.

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Edited By : Arif Khan Updated: May 5, 2026 20:46
कांग्रेस को इस 'छवि संकट' के बारे में साल 2014 में ही आगाह कर दिया गया था.

भारतीय जनता पार्टी आमतौर पर कांग्रेस पर ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ का आरोप लगाती रही है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद यह हमला कांग्रेस के ही एक पुराने सहयोगी ने किया है. असम में AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने बयान दिया है कि ‘कांग्रेस अब मुस्लिम लीग बन गई है’. इस बयान ने एक नई सियासी बहस छेड़ दी है.

क्या कहते हैं असम और बंगाल के आंकड़े

असम और पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस धारणा को सबसे ज्यादा हवा दी है. कांग्रेस इन राज्यों में जहां भी जीती है, वहां लगभग सभी चेहरे अल्पसंख्यक समुदाय के हैं. कांग्रेस ने असम की 126 में से 99 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 19 पर जीत हासिल की. इन 19 विजेताओं में से 18 मुस्लिम उम्मीदवार हैं. वहीं, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 292 सीटों पर किस्मत आजमाई लेकिन उसे सिर्फ 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. ये दोनों ही सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीती हैं. बंगाल में कांग्रेस ने TMC के 47 से भी ज्यादा 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था.

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केरल में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन

केरल में जहां कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF गठबंधन सत्ता में लौटा है, वहां भी सीटों का समीकरण कुछ इसी ओर इशारा करता है. UDF की 102 सीटों में से 22 सीटें ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) की हैं. केरल की नई विधानसभा में कुल 35 मुस्लिम विधायक होंगे, जिनमें से 30 अकेले UDF गठबंधन से हैं. इनमें से 22 IUML से हैं. कांग्रेस के 63 MLA में से आठ मुस्लिम हैं.

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तमिलनाडु में, जहां कांग्रेस ने DMK के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. उसने पांच सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे. उसने दो सीटें जीतीं, जिनमें से एक उम्मीदवार मुस्लिम है.

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केरल और असम में कांग्रेस और उसके सहयोगियों द्वारा खड़े किए गए मुस्लिम उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट 80% से ज्यादा है. इसका मतलब है कि उनकी ओर से खड़े किए गए 10 में से आठ मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं.

12 साल पुरानी वो चेतावनी

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस को इस ‘छवि संकट’ के बारे में साल 2014 में ही आगाह कर दिया गया था. 2014 के आम चुनाव में मिली करारी हार के बाद वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी. एंटनी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि अल्पसंख्यकों के साथ कांग्रेस की बढ़ती निकटता ने उसकी ‘धर्मनिरपेक्ष साख’ पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एंटनी ने आगाह किया था कि अगर इस धारणा को नहीं बदला गया, तो सांप्रदायिक ताकतों को कांग्रेस के भीतर जगह मिल सकती है.

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बदरुद्दीन अजमल ने क्यों कहा ‘मुस्लिम लीग’?

असम में कांग्रेस और AIUDF का रिश्ता काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है. कांग्रेस ने 2021 में अजमल के साथ गठबंधन किया था, लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. 2026 में कांग्रेस ने AIUDF से किनारा कर लिया क्योंकि उसे लगा कि वह खुद मुस्लिम वोटों को अपने खाते में ला सकती है. इस चुनाव में AIUDF सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस ने उनके वोट बैंक में सेंध लगाकर 18 मुस्लिम विधायक जिता लिए. इन नतीजों से बदरुद्दीन अजमल काफी नाराज दिख रहे हैं.

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कांग्रेस के लिए क्या है असली खतरा?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि कांग्रेस एक ‘बबल’ में फंसती जा रही है. असम और बंगाल में हिंदू वोटों का भारी ध्रुवीकरण बीजेपी के पक्ष में हुआ है. जिस पार्टी की पहचान ‘अम्ब्रेला पार्टी’ (सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली) की थी, वह अब चुनावी रूप से अल्पसंख्यक बहुल इलाकों तक सीमित होती दिख रही है.

First published on: May 05, 2026 08:45 PM

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