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West Bengal Chunav Result: рдкрд╢реНрдЪрд┐рдо рдмрдВрдЧрд╛рд▓ рдХреА рд░рд╛рдЬрдиреАрддрд┐ рдореЗрдВ рдореБрдЦреНрдпрдордВрддреНрд░реА рдордорддрд╛ рдмрдирд░реНрдЬреА рдХреА рднрд╡рд╛рдиреАрдкреБрд░ рд╕реЗ рд╣рд╛рд░ рд╕рдмрд╕реЗ рдмрдбрд╝рд╛ рдЙрд▓рдЯрдлреЗрд░ рд╣реИ, рдЬрд┐рд╕ рднрд╡рд╛рдиреАрдкреБрд░ рдХреЛ рдореБрдЦреНрдпрдордВрддреНрд░реА рдордорддрд╛ рдмрдирд░реНрдЬреА рдЕрдкрдирд╛ рд╕рдмрд╕реЗ рд╕реБрд░рдХреНрд╖рд┐рдд рдХрд┐рд▓рд╛ рдорд╛рдирддреА рдереАрдВ, рд╡рд╣рд╛рдВ рднрд╛рдЬрдкрд╛ рдХреЗ рджрд┐рдЧреНрдЧрдЬ рдиреЗрддрд╛ рд╕реБрд╡реЗрдВрджреБ рдЕрдзрд┐рдХрд╛рд░реА рдиреЗ рдЙрдиреНрд╣реЗрдВ 15,000 рд╡реЛрдЯреЛрдВ рдХреЗ рдЕрдВрддрд░ рд╕реЗ рдХрд░рд╛рд░реА рд╢рд┐рдХрд╕реНрдд рджреА рд╣реИ. рдЬрд╛рдиреЗрдВ, 'рджреАрджреА' рдХреА рд╣рд╛рд░ рдХреЗ 5 рдХрд╛рд░рдг

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Bhabanipur Vidhan Sabha Chunav Result: पश्चिम बंगाल की भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी की हार इसलिए भी भी ऐतिहासिक है क्योंकि ठीक पांच साल पहले सुवेंदु ने नंदीग्राम में ममता को हराया था और अब 2026 में उन्होंने भवानीपुर में उसी कारनामे को दोहराकर टीएमसी के 15 साल के शासन के अंत पर मुहर लगा दी है. सोमवार को हुई मतगणना किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं थी. सुबह डाक मतों की गिनती में सुवेंदु आगे रहे, लेकिन दोपहर होते-होते ममता बनर्जी ने जबरदस्त वापसी की और एक समय 19,000 वोटों की बढ़त बना ली. हालांकि, शाम ढलते ही पासा पलट गया. 20 में से 18 दौर की गिनती खत्म होते-होते सुवेंदु ने 11,000 की लीड ले ली और अंत में जीत का परचम लहराया. भवानीपुर में ममता की हार के पीछे कई बड़े कारण निकलकर सामने आ रहे हैं:

अपनी सुरक्षित सीट से क्यों हारीं ममता बनर्जी

ममता बनर्जी जिस कालीघाट में रहती हैं, वह भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र का ही हिस्सा है. इसी जगह से ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर को निखारा था.

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  • ‘मिनी इंडिया’ का बदला मिजाज: भवानीपुर की जनसांख्यिकी काफी दिलचस्प है. यहां 42% बंगाली हिंदू और 34% गैर-बंगाली (गुजराती, मारवाड़ी) हिंदू हैं. इस बार न केवल व्यापारी वर्ग, बल्कि बंगाली हिंदू मतदाताओं का भी रुझान सुवेंदु की ओर दिखा.
  • वोटर लिस्ट और सत्ता विरोधी लहर: हार का एक बड़ा कारण मतदाता सूची में हुआ विशेष संशोधन (SIR) भी रहा. भबनीपुर से लगभग 47,000 से 51,000 नाम हटा दिए गए, जिनमें बड़ी संख्या टीएमसी के पारंपरिक समर्थकों की बताई जा रही है. टीएमसी का आरोप है कि इसमें उनके कोर समर्थक शामिल थे, जिसका सीधा असर नतीजों पर पड़ा.
  • आरजी कर कांड का गहरा असर: ममता बनर्जी की चुनावी संभावनाओं पर सबसे बड़ा प्रहार आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार-हत्या मामले ने किया. इस घटना से पहले तक महिला सुरक्षा के मुद्दे पर ममता बनर्जी की जो एक ‘रक्षक’ वाली छवि थी, उसे इस कांड ने बुरी तरह धूमिल कर दिया. महिला मतदाताओं के मन में सुरक्षा को लेकर जो आक्रोश पैदा हुआ, उसने पोलिंग बूथ पर ममता के खिलाफ वोट के रूप में उपस्थिति दर्ज कराई.
  • सुशासन पर भारी पड़ा भ्रष्टाचार: 15 साल के शासन के बाद, टीएमसी के खिलाफ एक मजबूत सत्ता-विरोधी लहर भी साफ नजर आई. भ्रष्टाचार के आरोप, रिश्वतखोरी और सिंडिकेट प्रणाली जैसी समस्याओं ने ‘सुशासन’ के दावों की हवा निकाल दी. भवानीपुर के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि कल्याणकारी योजनाएं चुनाव जीतने का एक जरिया तो हो सकती हैं, लेकिन वे प्रशासन की कमियों और सुरक्षा के अभाव को हमेशा के लिए ढक नहीं सकतीं.

इमोशनल कार्ड और ममता की बेबसी

चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने अपनी पुरानी रणनीति अपनाई थी, ‘अपनी बेटी’ होने का भावनात्मक जुड़ाव और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाएं. लेकिन इस बार भवानीपुर की जनता का मूड कुछ और ही था. चुनाव प्रचार के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने सबको हैरान कर दिया था. ममता बनर्जी एक रैली में भाषण दे रही थीं, तभी पास में भाजपा की रैली के शोर से परेशान होकर उन्होंने मंच छोड़ दिया.
मंच से उतरते समय उनके शब्द थे, “अगर आप कर सकते हैं, तो कृपया मुझे वोट दें… मुझे यह बैठक भी नहीं करने दे रहे हैं.” उनकी इस अपील में झलकता डर और आत्मविश्वास की कमी अब हार के नतीजों में साफ दिख रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता को अपनी हार का अंदाजा पहले ही हो गया था.

योजनाओं के भरोसे जीत आसान नहीं

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर में हुई हार ने यह साफ कर दिया है कि जनता अब केवल मुफ्त सरकारी योजनाओं के भरोसे अपना भविष्य नहीं देख रही है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने चुनाव में अपनी प्रमुख योजनाओं— लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी को सुशासन के बड़े चेहरे के रूप में पेश किया था, लेकिन वोटरों के मूड ने संकेत दिया कि ये योजनाएं अब सरकार की डूबती नैया को बचाने के लिए काफी नहीं हैं.

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सिर्फ आर्थिक मदद ही काफी नहीं

भवानीपुर जैसे शहरी और मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में ममता की हार की एक बड़ी वजह मध्यम वर्ग और शिक्षित महिलाओं का बदलता नजरिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षित महिला मतदाता अब केवल 500-1000 रुपये की आर्थिक सहायता (लक्ष्मी भंडार) से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी प्राथमिकता अब अपने बच्चों के लिए रोजगार और सुरक्षित भविष्य है. सरकार की ओर से मिलने वाली छोटी आर्थिक मदद उन बड़े मुद्दों के सामने गौण हो गई जो बंगाल के शिक्षित समाज को परेशान कर रहे थे.

सुवेंदु का ‘मैथमेटिकल’ चक्रव्यूह

भाजपा ने इस बार भवानीपुर को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया था. भाजपा ने सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारकर इस लड़ाई को निजी बना दिया था. अमित शाह खुद सुवेंदु के नामांकन में शामिल हुए. सुवेंदु ने बूथ स्तर पर गैर-मुस्लिम वोटों को एकजुट किया. भाजपा की रणनीति तीन स्तंभों पर टिकी थी—बूथ स्तर पर सामाजिक समीकरण, गैर-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण और सटीक मैपिंग. भबनीपुर, जिसे ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, वहां की जनसांख्यिकी सुवेंदु के पक्ष में झुकी. इस बार केवल गुजराती या मारवाड़ी समाज ही नहीं, बल्कि बंगाली हिंदू मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने भी भाजपा का साथ दिया.

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First published on: May 05, 2026 09:43 AM

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Vijay Jain

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