एक दमदार फिल्म बनाने में पसीने के साथ पैसा भी खूब बहाना पड़ता है. लिहाजा कई बार इसके लिए किसी बैनर, स्टूडियो या स्पॉन्सरशिप की जरूरत पड़ती है. लेकिन आज हम जिस शख्स के बारे में बात कर रहे हैं , उसकी फिल्म बिना स्टूडियो, बिना स्पॉन्सरशिप के ऑस्कर तक पहुंच गई.
इस इंडिपेंडेंट इंडियन फिल्ममेकर ने वह कर दिखाया है जो बड़े स्टूडियो भी अक्सर करने में स्ट्रगल करते हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं, शादाब खान की. शादाब खान की डॉक्यूमेंट्री ‘आई एम नो क्वीन’ बिना किसी कंट्री-स्पॉन्सर्ड सबमिशन के – ऑफिशियली 98वें एकेडमी अवॉर्ड्स डॉक्यूमेंट्री फीचर रेस में शामिल हो गई है.
यह कोई आसान क्वालिफिकेशन नहीं थी. फिल्म ने एकेडमी के कुछ सबसे मुश्किल क्राइटेरिया को पास कर लिया. इसने असल दुनिया में भी असर डाला.
क्या है फिल्म की कहानी ?
एक स्टूडेंट की कहानी जो घर छोड़कर एक बड़े देश के लिए जाता है, इज्जत, मौके और बेसिक सर्वाइवल के लिए लड़ता है. ये डॉक्यूमेंट्री इतनी गहराई से जुड़ी कि सीनियर कैनेडियन अधिकारियों ने खुद ऑस्कर के लिए फिल्म को रिकमेंड कर दिया.
इस फिल्म ने इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए पॉलिसी रिफॉर्म्स लाने में मदद की, जो एक इंडिपेंडेंट डॉक्यूमेंट्री के लिए लगभग अनसुना है.
कौन है शादाब खान जिसने बनाई ये डॉक्यूमेंट्री ?
शादाब खान, डायरेक्टर हैं. इस फील्ड में उतरने से उन्होंने एक दशक मॉडलिंग में गुजारी है. शादाब उत्तर प्रदेश के अमरोहा के रहने वाले हैं और वहीं से पढ़ाई की. बाद में मुंबई आए और मॉडलिंग शुरू की. विजुअल सेंसटिविटी और कैमरे की समझ उनकी अच्छी है, इसलिए वो डायरेक्शन में उतर गए.
शादाब पूरी तरह से सेल्फ-मेड फिल्ममेकर हैं. उन्होंने पहले भी X या Y के लिए 23 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीते हैं. राबिया और ओलिविया के लिए 13 ग्लोबल पहचान और अब ‘आई एम नो क्वीन’ को सीधे ऑस्कर की रेस में ले जा रहे हैं.
उनकी Delhi 47 KM और BA Pass 2 ने भी खूब नाम कमाया है.










