बिहार में इन दिनों गैस सिलेंडर के लिए मची मारामारी और लंबी लाइनों ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण सप्लाई चैन ऐसी बिगड़ी कि रसोई का बजट और खाना दोनों ही प्रभावित होने लगे। ऐसे में बिहार की सरकार ने एक विंटेज समाधान पेश किया है, कोयला क्रांति। जी हां, अब बिहार के लोग राशन कार्ड लेकर सिर्फ चावल-दाल नहीं, बल्कि खाना पकाने के लिए कोयला भी घर ले जा सकेंगे।
यह फैसला उन लाखों परिवारों के लिए संजीवनी की तरह है जिनके घरों में सिलेंडर खत्म हो चुका है और रीफिलिंग का कहीं अता-पता नहीं है। हालांकि इस सुविधा का लाभ वो लोग ही ले पाएंगे, जिनका नाम राशन कार्ड में दर्ज है। यानी इस योजना का लाभ लेने के लिए आपके पास राशनकार्ड होना चाहिए
क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
पश्चिम एशिया में जारी संकट की वजह से भारत में एलपीजी की आवक कम हुई है। बिहार के कई जिलों में सिलेंडर की वेटिंग लिस्ट 15 से 20 दिनों तक पहुंच गई है। कमर्शियल गैस के बाद अब आम जनता को डर है कि कहीं घरेलू गैस के दाम भी बेकाबू न हो जाएं।
कैसी होगी व्यवस्था?
सरकार जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों के माध्यम से कोयले का वितरण करेगी। एक परिवार को महीने में कितना कोयला मिलेगा, इसके लिए एक कोटा तय किया जा रहा है ताकि कालाबाजारी न हो। यह कोयला बाजार भाव से काफी कम कीमत पर मुहैया कराया जाएगा ताकि गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ न पड़े।
गैस नहीं तो क्या, चूल्हा तो जलेगा
ग्रामीण इलाकों में लोग इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि आधुनिकता के चक्कर में हम अपनी पुरानी पद्धति भूल गए थे, अब कम से कम धुएं के बहाने ही सही, पेट तो भरेगा। हालांकि, पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन मौजूदा संकट को देखते हुए सरकार के पास विकल्प सीमित हैं।










