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Mahakumbh 2025 : किस अमृत की लालसा में महाकुंभ पहुंचते हैं साधु-संन्यासी और गृहस्थ?

Bharat Ek Soch : यूपी के प्रयागराज में 12 साल के बाद महाकुंभ का आयोजन हो रहा है। पूरी दुनिया इस ओर खिंची चली आ रही है। 40 करोड़ से अधिक लोग संगम में डुबकी लगाएंगे। आखिर किस अमृत की लालसा में साधु-संन्यासी और गृहस्थ महाकुंभ पहुंचते रहे हैं?

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Bharat Ek Soch : पूरी दुनिया हैरत भरी नजरों से प्रयागराज में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम की ओर देख रही है। उस सम्मोहन को समझने की कोशिश रही है, उस दिव्य शक्ति को डिकोड करने की कोशिश कर रही है, जो देश-दुनिया के 40 करोड़ से अधिक लोगों को अगले डेढ़ महीने तक अपनी ओर खींचेगी। आस्था, अध्यात्म, तप, जप, त्याग और ज्ञान का ऐसा संगम होगा, जिसके अमृत पान की लालसा न जाने कब से संन्यासी और गृहस्थ दोनों को महाकुंभ में डुबकी लगाने के लिए खींचती रही है। इस बार 144 साल बाद प्रयागराज में लगने वाले पूर्ण महाकुंभ में 40 करोड़ से अधिक लोगों के पहुंचने का अनुमान है। 45 दिनों तक संगम किनारे आस्था का एक ऐसा संसार बसेगा, जिसमें अमेरिका की आबादी से अधिक लोग पहुंचेंगे। जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन की आबादी को जोड़ दिया जाए तो भी डेढ़ महीने में महाकुंभ में जुटने वाले तीर्थयात्री अधिक होंगे, यानी महाकुंभ में जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या जोड़ दिया जाए तो वो आबादी के लिहाज से दुनिया का तीसरा बड़ा देश होगा।

महाकुंभ हमेशा से ही चिंतन, मनन और मंथन का केंद्र रहा है। यहां साधु-संत, संन्यासी और गृहस्थ सभी अपनी-अपनी जिज्ञासा के साथ पहुंचते हैं। शरीर पर भस्म की चादर ओढ़े नागा साधु महाकुंभ का सबसे बड़ा आकर्षण होते हैं। हर 12 साल में महाकुंभ का संसार किस तरह बसता है? वहां किस अमृत की लालसा में साधु-संन्यासी और गृहस्थ पहुंचते रहे हैं? महाकुंभ लोगों की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना को किस तरह जागृत करता है? प्रयागराज महाकुंभ पर किस तरह आधुनिकता की चटक छाप दिख रही है? 40 करोड़ लोगों के रहने और खाने-पीने का किस तरह होता है इंतजाम? महाकुंभ के जर्रे-जर्रे से किस तरह का संदेश निकलता है?

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किस अमृत की लालसा में महाकुंभ पहुंचते हैं लोग

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हर 12 साल में एक बार हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में महाकुंभ लगता है, जिसमें करोड़ों की संख्या में नागा, साधु-संन्यासी और गृहस्थ पहुंचते हैं। हरिद्वार और प्रयागराज में हर छह साल पर अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है। पवित्र नदियों में डुबकी लगाकर लोग पाप से मुक्ति की कामना करते हैं। लेकिन, क्या महाकुंभ का मतलब सिर्फ पवित्र नदियों में डुबकी लगाना और पाप से मुक्ति भर है। आखिर कौन सा अमृत पाने की चाह में दुनियाभर से 40 करोड़ से अधिक लोग प्रयागराज की धरती पर कदम रखेंगे और संगम में डुबकी लगाएंगे? कौन सी अदृश्य शक्ति लोगों को आपस में और कब से जोड़ती रही है? दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में इतना बड़ा धार्मिक आयोजन क्यों नहीं होता? महाकुंभ के लिए प्रयागराज किस तरह से तैयार है। इसे डिजिटल महाकुंभ क्यों कहा जा रहा है। परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम किस तरह से दिख रहा है।

प्रयागराज में 30 से 40 किमी के दायरे में बसा ये हाईटेक संसार

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इससे पहले महाकुंभ में कभी तकनीक का इस स्तर पर इस्तेमाल नहीं हुआ था। प्रयागराज में 30 से 40 किलोमीटर के दायरे में आस्था और आधुनिकता के बीच मेल करता एक ऐसा हाईटेक संसार बसा हुआ है, जहां एक ओर भस्म लपेटे नागा साधु घूम रहे हैं तो दूसरी ओर अत्याधुनिक तकनीक के जरिए पूरी दुनिया तक महाकुंभ का संदेश पहुंच रहा है। क्राउड मैनेजमेंट (Crowd Management) से लेकर पार्किंग तक में डिजिटल इंडिया के बढ़ते कदमों की छाप साफ-साफ दिख रही है। महाकुंभ का आम आदमी के लिए मतलब क्या है? महाकुंभ किस तरह से सामाजिक एकता और राष्ट्रीय एकता का संदेश देता रहा है। कुंभ किस तरह से प्रकृति और इंसान के बीच समन्वय का रास्ता दिखाता रहा है। महाकुंभ किस तरह से समानता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र से बहुत आगे का दर्शन रहा है?

ऋग्वेद और अथर्ववेद में कुंभ का जिक्र, लेकिन मेले का नहीं

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महाकुंभ की शुरुआत कब से हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। ऋग्वेद के 10वें मंडल के 89वें सूक्त में कुंभ का जिक्र है, लेकिन कुंभ मेले का नहीं है। ऋग्वेद से करीब 600 साल बाद लिखे गए अथर्ववेद में पूर्ण कुंभ का जिक्र है। संगम का इशारा भी वेद में मिल जाता है, लेकिन कुंभ मेले का नहीं है। महाकुंभ की शुरुआत कब से हुई ये कहना मुश्किल है। ऐसे में माना जाता है कि भारत में ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाने के मकसद से महाकुंभ की शुरुआत हुई होगी। जिसमें पहले साधु-संन्यासी यानी विद्वान शामिल होते होंगे। बाद में इसमें गृहस्थ भी जुड़े होंगे। अखाड़ों ने महाकुंभ की भव्यता को आगे बढ़ाया और उसके अमृत यानी ब्रह्मज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में बड़ा किरदार निभाया। महाकुंभ में किसी से कोई जाति नहीं पूछता, गरीब-अमीर के बीच भेद नहीं करता। एक-दूसरे से जुड़ने और जोड़ने की चाह साधु-संत, संन्यासी के साथ गृहस्थ सबको एक जगह लेकर आती है। कुंभ में ज्ञान, ध्यान और चेतना की धाराओं का संगम होता है, ये दिव्य-भव्य महाकुंभ ही है- जो उत्तर को दक्षिण से और पूरब को पश्चिम से जोड़ता रहा है। ये भारत की उस सनातन परंपरा से निकला समागम है, जिसमें इंसान खुद से साक्षात्कार करता है। जीवन का मर्म समझने की कोशिश करता है।

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किस तरह विश्व गुरु बना भारत?

आज की तारीख में तकनीक ने भले ही हमें आपस में जोड़ दिया हो, ज्ञान के आदान-प्रदान को तकनीक ने आसान कर दिया हो, लेकिन जरा सोचिए, हजार साल, पांच सौ साल, सौ साल या पचास साल पहले ज्ञान-विज्ञान पर तर्क-वितर्क कैसे होता रहा होगा? भारत किस तरह विश्व गुरु बना? संभवत: ज्ञान की इस धारा को मजबूत करने और एक-दूसरे तक पहुंचाने में महाकुंभ जैसे मंच ने बड़ी भूमिका निभाई। इतना ही नहीं महाकुंभ ने सामान्य गृहस्थ लोगों को पौराणिक कथाओं के जरिए मनुष्य के जीवन का मकसद समझाया तो पाप-पुण्य की अवधारणा के साथ सामाजिक व्यवस्था को समरस, संतुलित और संचालित करने का रास्ता दिखाया।

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महाकुंभ में मोक्ष खोजता है हर इंसान

महाकुंभ दुनिया में इकलौता ऐसा समागम है, जिसमें पहुंचने वाला हर शख्स खुद ईश्वर से साक्षात्कार करता है। हर किसी को खुद को समझने का मौका देता है। साधु-संतों का जीवन लोगों को सीमित संसाधनों में जिंदगी जीने का फलसफा सिखाता है। कुंभ मेले में शिविरों के बाहर ऐसे लोग दोनों हाथ जोड़े दिख जाएंगे, जो हर आने-जाने वाले से भोजन का आग्रह करते दिखे जाएंगे। महाकुंभ एक ऐसा धार्मिक और सांस्कृतिक समागम है, जो लोगों को लेना नहीं देना सिखाता है। गरीब से गरीब शख्स भी कुछ दान-पुण्य करने में अपना मोक्ष खोजता है। ये दान-पुण्य की आदत समाज के लिए कुछ करने का रास्ता दिखाती है। यही वो अमृत तत्व है, जिसे हासिल करने और पुण्य हासिल की सोच करोड़ों लोगों को एक साथ खड़ा कर देती है। सभी अपनी परंपरा, पूजा पद्धति और देवी-देवताओं के साथ मनुष्य जीवन के मर्म को समझने की कोशिश करते हैं। सामान्य लोगों के लिए इस काम को आसान बना देती है, महाकुंभ में साधु-संतों द्वारा कही जाने वाली कथा, भजन और कीर्तन।

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महाकुंभ अर्थव्यवस्था में दो लाख करोड़ रुपये जोड़ेगा

महाकुंभ का स्वरूप इतना उदार और समावेशी रहा है कि हर शख्स अपने जीवन का मकसद अपनी समझ के हिसाब से तलाश लेता है। सनातन परंपरा का ध्वजवाहक कुंभ पश्चिम की तरह किसी संहिता को मानने के लिए मजबूर नहीं करता, बल्कि समय चक्र के साथ संशोधनों को भी स्वीकार करता है। यही वजह से महाकुंभ वक्त के साथ आधुनिक और हाईटेक भी होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अनुमान है कि महाकुंभ अर्थव्यवस्था में इस साल करीब दो लाख करोड़ रुपये जोड़ेगा। ऐसे में महाकुंभ के अर्थशास्त्र को समझना भी जरूरी है।

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महाकुंभ में कास्ट और क्लास दोनों हो जाते हैं खत्म

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प्रयागराज में संगम किनारे बनाई गई अस्थायी सुपरसिटी दुनिया के अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों और मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए रिसर्च का विषय है। अर्थशास्त्री हिसाब लगा रहे हैं कि आस्था के इस दिव्य-भव्य, हरित, डिजिटल महाकुंभ से जो ईको सिस्टम तैयार हुआ है, वो देश की अर्थव्यवस्था को कितनी ताकत देगा? कितने लोगों को रोजगार मिल रहा है, आसपास के इलाकों में धार्मिक यात्राओं को कितना बढ़ावा मिलेगा? महाकुंभ में किन-किन क्षेत्रों में कायाकल्प होगा? समाजशास्त्री मंथन कर रहे हैं कि आखिर महाकुंभ में ऐसा क्या है, जहां कास्ट और क्लास दोनों खत्म हो जाते। संगम की धारा में डुबकी लगाने में ऊंच-नीच, गरीब-अमीर सब एक धरातल पर किस तरह खड़े हो जाते हैं? पश्चिम में हेल्थ-हाइजीन की बहुत बातें होती है पर महाकुंभ में एक साथ लाखों लोगों के डुबकी लगाने के बाद भी संक्रमण जैसी बातें क्यों नहीं सामने आती हैं? यहां स्वच्छता और पवित्रता का विचार पश्चिम के हाइजीन से बहुत आगे की सोच और लोगों के व्यवहार का हिस्सा रहा है। यही वजह है कि करोड़ों लोग महाकुंभ में डुबकी लगाकर भौतिक शरीर और चेतना को किस तरह जागृत कर वापस लौट जाते हैं? महाकुंभ सदियों से पूरी दुनिया के लिए किसी आश्चर्य की तरह रहा है और आज भी बना हुआ है। भारत की सनातन परंपरा और एकता के एजेंड़े को महाकुंभ बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ाता रहा है।

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First published on: Jan 12, 2025 07:58 AM

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About the Author

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।

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