अक्सर कहा जाता है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन निवेश पढ़ाई में होता, किसी को शिक्षित करने में होता, ये बात व्यक्ति या परिवार पर भी लागू होती है और किसी मुल्क पर भी. हमारे देश में साढ़े चार करोड़ से अधिक छात्र उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं. बच्चे इस उम्मीद से स्कूल-कॉलेज जाते हैं कि उनका भविष्य बेहतर होगा, पढ़ाई के बाद उन्हें नौकरी और रोजगार का बेहतर मौका मिलेगा, लेकिन, कितनों के सपने पूरे होते हैं? इस सवाल का जवाब बेरोजगार छात्र, शिक्षाविद् और हुक्मरान अपने-अपने एंगल से तलाशने की कोशिश करते हैं. दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के दूसरे हिस्सों में हुए Gen Z और Gen Alfa के विरोध प्रदर्शनों ने हुक्मरानों को एहसास करा दिया कि मौजूदा एजुकेशन सिस्टम के भीतर कई गंभीर खामियां हैं – जिसे दुरुस्त करना बहुत जरूरी है.

छात्रों ने अपने अनशन और आंदोलन से मोदी सरकार पर इतना दबाव बनाया कि धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. देश की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की जिम्मेदारी अब प्रह्लाद जोशी संभाल रहे हैं. लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी दिक्कतें दूर हो जाएंगी? आखिर, मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री सबसे अधिक सवालों में क्यों रहे? आखिरी मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर इतनी फिसलन क्यों? क्या अब पेपर लीक नहीं होगा? क्या अब सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा? क्या लोगों के सामने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने की मजबूरी नहीं होगी? आखिर हमारे देश में सरकारी स्कूलों पर ताला क्यों लगता जा रहा है? कहीं स्कूल है – तो शिक्षक नहीं. कहीं शिक्षक हैं – तो स्कूल नहीं. स्कूली शिक्षा की तरह सरकारी उच्च शिक्षा व्यवस्था की हालत भी दिनों-दिन क्यों जर्जर होती जा रही है? आखिर देश के ज्यादातर कॉलेजों की छवि बेरोजगार पैदा करने वाले कारखाने के तौर पर क्यों है? आखिर मोदी सरकार शिक्षा पर हर साल कितना खर्च कर रही है? क्या पिछली सरकारों की तुलना में वाकई शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने पर अधिक खर्च हो रहा है? उच्च शिक्षा के लिए प्राइवेट कॉलेज अधिक खुल रहे हैं या सरकारी? डॉक्टर मनमोहन सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी के दौर तक शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कितना काम हुआ? आज ऐसे ही कुछ सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

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करीब साल भर पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को भारत का बौद्धिक पुनर्जागरण बताया था. पिछले साल सोनिया गांधी ने भी एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा था–जिसमें जिक्र किया था कि नई शिक्षा नीति के जरिए मोदी सरकार अपने 3C एजेंडा को आगे बढ़ा रही है. सोनिया गांधी के 3C में पहला, Centralization यानि केंद्रीकरण. दूसरा, Commercialization यानि व्यवसायीकरण. तीसरा, Communalism यानी सांप्रदायिकता के एजेंडा को आगे बढ़ा रही है. तब सोनिया गांधी के उस लेख का बहुत अधिक जिक्र नहीं हुआ. लेकिन, अक्सर ये बातें उठती रहती हैं कि शिक्षा व्यवस्था में बीजेपी सरकारें संघ के एजेंडा को आगे बढ़ा रही हैं. इसके पीछे एक दलील ये भी जाती है कि अब तक इतिहास को गलत तरीके से बताया और पढ़ाया गया. इतिहास और शिक्षा व्यवस्था पर वामपंथी बुद्धिजीवियों का प्रभाव है. ऐसे में पिछले कुछ वर्षों में इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश भी हुई है या कहें इतिहास से कुछ पन्नों को हटाने की कोशिश हुई है. आज की तारीख में जब शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की बातें हो रही हैं – तो ये जिक्र करना भी जरूरी है कि क्या स्कूल की दीवारों का रंग भगवा कर देने भर से सोच की धारा को मोड़ा जा सकता है? पिछले 10-12 सालों में इतिहास के पन्नों को कम करने की कोशिश तो दिखी. लेकिन, दमदार तथ्य और दलीलों के साथ कितने नए पन्ने जोड़े गए? संभवत: यही वजह है कि मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर सबसे अधिक फिसलन रही.

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स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक', धर्मेंद्र प्रधान और अब प्रह्लाद जोशी. मोदी सरकार में पिछले 12 वर्षों में 4 शिक्षा मंत्री बदले गए और अब कमान प्रह्लाद जोशी के हाथों में है. ऐसा पहली बार हुआ - जब छात्र आंदोलन के दबाव में मोदी सरकार के किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा हुआ. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि आखिर मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री इतना विवादों में क्यों रहे?

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एनडीए सरकार में शिक्षा मंत्रालय एक सॉफ्ट पावर की तरह देखा जाता रहा है. वाजपेयी सरकार में भी शिक्षा मंत्रालय की कमान मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता के हाथों में रही. दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की शिक्षा व्यवस्था से वामपंथी विचारधारा वाली शिक्षा प्रणाली हटाना चाहता है.

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संघ की सोच है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों ने इतिहास की गलत व्याख्या की. संघ की सोच है कि मुगल घुसपैठिए थे. आजादी की लड़ाई, बंटवारा और आजादी के बाद भारत निर्माण को लेकर संघ का अपना नजरिया हैं. ऐसे में भीतरखाने शिक्षा व्यवस्था में वैचारिक बदलाव की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है.

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माना जा रहा है कि पिछले 12 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार से अधिक वैचारिक बदलावों पर जोर रहा. वहीं, सरकार इसे संरचनात्मक सुधारों की प्रक्रिया बताती रही है. ये बदलाव की एक कोशिश ही है - जिसमें कहीं-कहीं स्कूल की बिल्डिंग भगवा होने लगी है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि क्या बिल्डिंग का रंग बदलने से देश की शिक्षा व्यवस्था बदल जाएगी? क्या किताबों से मुगल इतिहास के कुछ पन्ने हटा देने भर से इतिहास की धारा बदल जाएगी?

साल 2014 में नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की शपथ ली – तो अमेठी में राहुल गांधी से चुनाव हराने वाली स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर बैठाया गया. लेकिन, स्मृति ईरानी अपनी डिग्री को लेकर विवादों में रहीं. तब JNU विवाद और रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मामलों को लेकर बहुत शोर हुआ तो उन्हें शिक्षा से कपड़ा मंत्रालय में शिफ्ट कर दिया गया. उनकी जगह प्रकाश जावडेकर को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गयी. जो स्मृति ईरानी की तरह मुखर नहीं थे. लेकिन, 2019 चुनाव के बाद जावड़ेकर राजनीति के नेपथ्य में चले गए. मोदी सरकार 2.0 में शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को बैठाया गया. लेकिन, 2021 के मंत्रिमंडल फेरबदल में निशंक को हटाकर शिक्षा मंत्रालय की कमान धर्मेंद्र प्रधान को सौंपी गयी. मोदी सरकार 3.0 में भी शिक्षा मंत्रालय के पास ही रहा.

बतौर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को बढ़ावा मिला. नई शिक्षा नीति को गुरुकुल परंपरा और आधुनिकता का मेल बताया गया. मातृभाषा और कई भाषाओं में पढ़ाई को भी मजबूती मिली. लेकिन, तीन भाषा फॉर्मूला पर विवाद भी हुआ. नई शिक्षा नीति ने केंद्र बनाम राज्य विवाद को नए सिरे से हवा दी.

राजनीतिक पंडितों की सोच है कि प्रधान बड़ी खामोशी से संघ के एजेंडा को शिक्षा में बढ़ा रहे थे. कॉलेज और विश्वविद्यालयों में संघ की विचारधारा और पृष्ठभूमि वाले लोग दाखिल हो रहे हैं. स्कूल की किताबों में इतिहास के पुराने पन्ने हटाए या कम किए जा रहे थे - लेकिन, ठोस तथ्यों के आधार पर क्या नया जोड़ा गया - ये भी एक यक्ष प्रश्न रहा है?

ये नए दौर की व्याख्या है – जिसमें पौराणिक ग्रंथों की घटनाओं के जरिए हजारों साल पहले भारत में विज्ञान और तरक्की की गाथा बताने की कोशिश हो रही है. ये नए दौर में इतिहास लेखन की नई परिपाटी है – जिसमें जो शख्स अर्थशास्त्र का विद्यार्थी रहा – वो इतिहास की नई व्याख्या कर रहा है. खास विचारधारा और सोच के आधार पर नए सिरे से इतिहास लिख रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वो शख्स सिर्फ किसी एक विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए इतिहास लिख रहा है या उसमें कुछ नया विचार जुड़ा है? अगर नया विचार जुड़ा तो क्या उसे किसी ने Authenticate किया है. दरअसल, आज की तारीख में कई ऐसे स्वंयभू इतिहासकार सामने आए हैं – जो कभी इतिहास की उत्तर-दक्षिण एंगल से व्याख्या कर रहे हैं. तो कभी हिंदू - मुस्लिम एंगल से, कभी जमीन के एंगल से, कभी संमदर के एंगल से. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अहम पदों पर ऐसे लोगों की एंट्री तेजी से बढ़ी है–जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि बहुत साधारण रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि पिछले 12 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में जिस तरह के बदलाव लाने की कोशिश हुई है–उसमें सरकारी शिक्षा व्यवस्था मजबूत हुई या कमजोर?

लोकसभा में शिक्षा राज्यमंत्री जयंत चौधरी ने एक सवाल के जवाब में बताया कि साल 2021-22 में देश में 10,22,386 सरकारी स्कूल थे. लेकिन, 2025-26 तक यह संख्या घटकर 10,05,245 हो गई. मतलब, पांच साल में 17,141 सरकारी स्कूल कम हुए. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हमारे देश में सरकारी स्कूलों की संख्या दिनों-दिन कम क्यों हो रही है?

सरकारी आंकड़े एक और तस्वीर बयां कर रहे हैं. देश के 1,00, 843 स्कूलों में सिर्फ एक टीचर हैं. मतलब, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है. ऐसे में समझा जा सकता है कि बिना टीचरों के स्कूल में पढाई कैसे होगी?

सरकारी स्कूलों में जाने वाले ज्यादातर बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं. जहां भूख मिटाने के लिए हर महीने मिलने वाले मुफ्त सरकारी अनाज का इंतजार रहता है. 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हमारे देश में हर महीने 81 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर है - वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं. यही वजह है कि आज की तारीख में देशभर में सवा तीन लाख से अधिक प्राइवेट स्कूल चल रहे हैं, जिनमें देश के करीब 30 से 35% बच्चे पढ़ाई के लिए जाते हैं.

सरकारी स्कूलों के रंग बदल रहे हैं. शिक्षकों के सामने पढ़ाने के अलावे भी कई काम है. ऐसे में देश में प्राइवेट स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2014-15 में प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,88,164 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 3,31,108 हो गई…मतलब, 10 साल 42,944 प्राइवेट स्कूल बढ़े.

अगर दूसरी तरह से देखा जाए तो देश में प्राइवेट स्कूलों की संख्या 14.9% की रफ्तार से बढ़ रही है. वहीं, सरकारी स्कूलों के घटने की रफ्तार करीब 8 फीसदी की रही है.

हायर एजुकेशन और प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए संस्थान तेजी से खुल रहे हैं. लेकिन, वहां से पासआउट छात्रों में से कितनों को उनकी डिग्री के हिसाब से नौकरी मिल पाती है? कितने जॉब मार्केट की जरूरतों के हिसाब से फिट बैठते हैं? इसे लेकर अलग-अलग आंकड़े हैं. एक स्टडी के मुताबिक, हर साल करीब 15 लाख युवा इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर जॉब मार्केट में उतरते हैं. इसमें मुश्किल से डेढ़ से ढाई लाख युवाओं को ही उनकी पढ़ाई के हिसाब से संतोषजनक नौकरी मिल पाती है. देश के ज्यादातर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें खाली रह जाती हैं. क्योंकि, वहां की पढ़ाई के आधार पर प्लेसमेंट के चांस कम हैं. इतना ही नहीं, अगर नौकरी मिल भी जाती है – तो बहुत मामूली तनख्वाह की. ऐसे में प्राइवेट प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट उन कमियों को तेजी से पूरा करने में लगे हैं – जहां सरकारी संस्थान पिछड़ते जा रहे हैं. आज की तारीख में प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए चल रहे कुछ सरकारी संस्थान वर्ल्ड लेवल के हैं. लेकिन, ज्यादातर की हालत और छवि ऐसी बनती जा रही है – जहां दाखिले को छात्र समय और पैसे की बर्बादी के तौर पर महसूस करने लगे हैं. ऐसे में अगर विकल्प मिलता है–तो मोटी फीस के बाद भी प्राइवेट संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं. सरकारी शिक्षण संस्थानों के खुलने की रफ्तार भी बहुत धीमी हुई है. एक स्टडी के मुताबिक, 2014 में जहां सरकारी कॉलेजों की संख्या 7,885 थी. जो 2024 में बढ़कर 7,994 हुई. मतलब, 10 वर्षों में सरकारी कॉलेज 1% बढ़े. इस दौरान प्राइवेट कॉलेजों की संख्या में 49%की बढ़ोतरी देखी गयी.

आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए उतरे Gen Z का सबसे बड़ा मुद्दा क्या था? भले ही ट्रिगर प्वाइंट NEET पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा रहा हो. लेकिन, असली आक्रोश तो देश की शिक्षा व्यवस्था के बीच से गुजर रही फाल्ट लाइनों को लेकर था. ज्यादातर युवाओं का सबसे बड़ा दर्द ये है कि कॉलेज से पासआउट होने के बाद नौकरी क्यों नहीं मिल रही?

देश में सरकारी उच्च शिक्षा के ज्यादातर संस्थानों यानि कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. जिस तरह की पढ़ाई हो रही है या कोर्स चल रहे हैं - उसके दम पर नौकरी हासिल करना बहुत आसान नहीं है. दूसरा, प्रोफेशनल कोर्सेज वाले बेहतरीन सरकारी संस्थानों के दाखिले में आरक्षण सिस्टम की वजह से भी मेधावी छात्र बाहर हो जाते हैं. सरकारी कॉलेजों की कमियों को भरने के लिए तेजी से प्राइवेट कॉलेज खुल रहे हैं-जहां पढ़ाई के लिए मोटी फीस चुकानी पड़ती है.

एक स्टडी के मुताबिक, साल 2014 में सरकारी कॉलेजों की संख्या 7,885 थी जो 2024 में बढ़कर 7,994 पर पहुंची. वहीं, 2014 में हमारे देश में 21,750 प्राइवेट कॉलेज थे जो 2024 में बढ़कर 32,513 हो गए.

ये किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी कॉलेज और प्राइवेट कॉलेजों की फीस में कितना अंतर है ? उसके बाद भी प्राइवेट कॉलेजों में दाखिले की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है. अगर हायर एजुकेशन में दाखिले का आंकड़ा देखा जाए तो साल 2013-14 में सरकारी शिक्षण संस्थानों में 1.34 करोड़ छात्रों का दाखिला रहा. वहीं, 10 साल बाद यानी 2023-24 में ये आंकड़ा बढ़कर 1.63 करोड़ पर पहुंचा. दूसरी ओर, 2013-14 के दौरान प्राइवेट कॉलेजों में कुल इनरोलमेंट 1.82 करोड़ रहा. जो 2023-24 में बढ़कर 3.57 करोड़ तक पहुंच गया.

मतलब, 10 वर्षों जहां सरकारी संस्थानों में Enrolment जहां 21% बढ़ा, वहीं, प्राइवेट संस्थानों में डबल से सिर्फ थोड़ा कम है.

प्रोफेशनल कोर्स के लिए खासतौर से खड़े ज्यादातर नामी प्राइवेट संस्थानों का जोर छात्रों को इस तरह तैयार करने पर रहता है - जिससे डिग्री से पहले ही उनके हाथों में नौकरी हो. ऐसे में उच्च शिक्षा के लिए बने सरकारी संस्थानों को भी प्राइवेट संस्थानों की तर्ज पर कुछ बदलाव करने की जरूरत है. मसलन, प्रोफेसरों की कमी पूरा करना, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से कोर्स और थ्योरी से अधिक प्रैक्टिकल पर जोर.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में पढ़ाई को थ्योरी से प्रैक्टिकल की ओर शिफ्ट करने की कोशिश हुई है. इसी तरह हायर एजुकेशन में भी ऐसे रास्ते खोले गए हैं- जिससे छात्र अपने बेहतर करियर के लिए एक साथ कई रास्ते चुन सकता है. लेकिन, एक सच्चाई ये भी है कि देश के ज्यादातर सरकारी शिक्षण संस्थान बेहतर शिक्षक और संसाधन दोनों की कमी से जूझ रहे हैं.

आज की तारीख में हमारे देश के भीतर कुल 1422 यूनिवर्सिटीज हैं. वहीं, कॉलेजों की संख्या 52 हजार से ऊपर है, जिस NEET-UG पेपर लीक के मुद्दे पर इतना बवाल हुआ, उसमें कितनी सीटें हैं? ये जानना-समझना भी जरूरी है. दरअसल, 2026-27 में MBBS में दाखिले के लिए कुल सीटें थी – 1,36,939 और मेडिकल कॉलेजों की संख्या है 823. लेकिन, मारा-मारी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की करीब 30 हजार सीटों के लिए है. प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से डिग्री लेने के लिए इतने रुपये खर्च करने पड़ते हैं – जिसमें एक मिडिल क्लास परिवार की पूरी जिंदगी में कमाई का सपना होता है. 2026-27 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों 63,296 सीटें थीं. वहीं, प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 73,643. पिछले कुछ वर्षों में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सीटों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है.

इस साल MBBS में दाखिले के लिए पेपरलीक विवाद के बाद दोबारा हुई NEET परीक्षा में करीब 20 लाख लाख बैठे मतलब हर सीट के लिए 14 से 15 दावेदार. लेकिन, ये MBBS में दाखिले की दौड़ की मुकम्मल तस्वीर नहीं है. आज की तारीख में मेडिकल के कुल 823 कॉलेज हैं. जिसमें से 441 सरकारी हैं और 382 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज. वहीं, सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सीटें तेजी से बढ़ाई जा रही हैं । आंकड़ों के मुताबिक, 2026-27 के लिए MBBS की कुल सीटों में से सरकारी कॉलेजों के लिए 63,296 सीटें हैं. वहीं, प्राइवेट कॉलेजों के लिए 73,643. इस साल जुड़ी मेडिकल की 9911 सीटों में से 7800 प्राइवेट कॉलेजों के खाते में गईं. तो सरकारी कॉलेजों के हिस्से आईं 2111 सीटें.

अब कुछ राज्यों में मेडिकल कोटे की सीटों का हिसाब-किताब भी समझना जरूरी है. कर्नाटक में मेडिकल की कुल सीटें हैं – 15,395. इसमें सरकारी 4,400 और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 10,995 सीटें. उत्तर प्रदेश में कुल सीटें हैं 14000. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 5700 सीटें तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 8300 सीटें. तमिलनाडु में MBBS के लिए कुल सीटें हैं – यूपी से एक कम यानी 13,999. इसमें से 5,349 सरकारी और 8,650 प्राइवेट कॉलेजों की हैं. महाराष्ट्र में कुल 13,099 सीटें हैं – जिसमें 6000 सरकारी और 7,099 प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खाते में हैं.

ऐसे में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए कंपीटिशन बहुत कड़ा है. दूसरी ओर, प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरी की डिग्री लेने के लिए बहुत मोटी फीस चुकानी पड़ती है.

देश के कुछ नामी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से MBBS की डिग्री हासिल तक का खर्चा एक से डेढ़ करोड़ के बीच बैठता है. वहीं, पढाई और ट्रेनिंग स्तर में सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फर्क है.

ऐसे में जो छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की दौड़ में पिछड़ जाते हैं - वो प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए जद्दोजहद करते हैं.

आंकड़े कहते हैं कि आजादी के बाद के 70 वर्षों में देश में सिर्फ 7 AIIMS बने. लेकिन, 2014 के बाद भारत के नक्शे पर AIIMS की संख्या 23 हो गयी है. लेकिन, क्या सभी AIIMS में पढ़ाई और इलाज का स्तर दिल्ली AIIMS के बराबर का है. इस सवाल पर गंभीरता से सोचना होगा? ज्यादातर सरकारी मेडिकल कॉलेज जहां बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं – वहीं प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में अत्याधुनिक सुविधाएं, बेहतरीन लैब और इलाज की अत्याधुनिक तकनीकों की छात्रों को जानकारी दी जा रही है. सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के बीच फीस में बहुत बड़ा अंतर है. ऐसे में सरकार को गंभीरता से सोचना होगा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस पर किस तरह कैपिंग की जाए. अक्सर दलील दी जाती है कि हाल के वर्षों में शिक्षा बजट में भारी बढ़ोत्तरी हुई है. मसलन, 2025-26 में उच्च शिक्षा विभाग का बजट जहां करीब 50,078 करोड़ रुपये का रहा. उसे 2026-27 में बढ़ाकर 55,727 करोड़ कर दिया गया. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि जिस भारत को 2047 तक विकसित देशों की कतार में खड़ा करने का लक्ष्य रखा गया है. क्या वहां उच्च शिक्षा के लिए 55 हजार करोड़ का बजट काफी है? एक स्टडी के मुताबिक, केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी पिछले 12 वर्षों में तेजी से घटी है. साल 2013-14 में कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार में 4.6% था. जो 2025-26 में घटकर 2.5% पर आ गया है. इतना ही नहीं, यूपीए सरकार में शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर इतनी फिसलन भी नहीं रही. 2004 से 2014 के बीच सिर्फ तीन शिक्षा मंत्री रहे. UPA वन में शिक्षा मंत्रालय की कमान अर्जुन सिंह जैसे मंझे राजनेता को सौंपी गयी. उसके बाद कानून के जानकार कपिल सिब्बल और फिर एम. एम. पल्लमराजू को. उस दौर में नए केंद्रीय संस्थानों की स्थापना और विस्तार यानी Expansion with exclusion पर खासा जोर दिया गया.

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के साथ पूरी दुनिया में बदलाव की तेज बयार चलने लगी. साल 2004 में जब मनमोहन सिंह की अगुवाई में UPA की सरकार बनी-तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार की रफ्तार को बढ़ाने का काम शुरू हुआ. इस कड़ी में नए IITs खोलने की पहल शुरू हुई. 2004 से पहले देश में सिर्फ 7 IITs थे - लेकिन, 2014 आते-आते IITs की संख्या 16 पर पहुंच गयी.

हैदराबाद, पटना, भुवनेश्वर, जोधपुर, गांधीनगर, इंदौर, मंडी और रोपड़ में IITs खुले. उस दौर में कंपनियों का मैनेजमेंट संभालने और चलाने के लिए युवा प्रोफेशनल तैयार करने की सोच के साथ शिलांग, रोहतक, रायपुर, रांची, त्रिची, काशीपुर, उदयपुर में IIM खुले. तब की यूपीए सरकार ने हर बड़े राज्य में केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की रणनीति आगे बढ़ाई. संभवत: सोच रही होगी-उच्च शिक्षा का देश के हर हिस्से में विस्तार. उसी दौर में Right to Education के जरिए समाज के आखिरी आदमी के बच्चे के लिए स्कूल का दरवाजा खोलने की कोशिश हुई.

बिना खर्च के पढ़ाई संभव नहीं है. ऐसे में वित्त वर्ष 2004-05 से 2013-14 के बीच शिक्षा बजट 13,098 करोड़ से बढ़कर 71,059 करोड़ पर पहुंच गया. साल 2014 में दिल्ली में सत्ता बदली. प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नरेंद्र मोदी. देश की स्कूल से कॉलेज तक की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत महसूस की गयी. दुनिया में होते बदलावों के हिसाब से नई शिक्षा नीति पर भी काम शुरू हुआ. UPA सरकार की तरह ही नए IITs, IIM जैसे संस्थान खुलने शुरू हुए. AIIMS की संख्या 7 से बढ़कर 20 पर पहुंच चुकी है, 5 अभी और खुलने हैं.

आंकड़े ये बता रहे हैं कि वित्त वर्ष 2014-15 में जहां शिक्षा बजट 68,874 करोड़ था. वो 2025-26 तक 1,28,650 करोड़ के निशान तक ही पहुंच पाया है. 2014-15 में जहां उच्च शिक्षा का बजट करीब 20 हजार करोड़ हुआ करता था - वो 2025-26 में 50,078 करोड़ तक पहुंचा है.

आज की तारीख में केंद्रीय विश्यविद्यालयों में प्रोफेसरों के आधे से अधिक पद खाली हैं. कई राज्य विश्वविद्यालय भी प्रोफेसरों की भारी कमी से जूझ रहे हैं. ऐसे में हिसाब लगाया जा सकता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत हो रही है और कमजोर?

पिछले कुछ दशकों में सरकारी स्कूलों की पढ़ाई के स्तर में बड़ी गिरावट महसूस की गयी है. यही वजह है कि प्राइवेट स्कूलों के खुलने की रफ्तार कई गुना तेज हुई है. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का जो हिसाब-किताब है. उसके आधार पर किसी अच्छे कॉलेज, यूनिवर्सिटी या प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला आसान नहीं है. ऐसे में 12वीं के बाद छात्रों की हायर एजुकेशन के लिए CUET, NEET, JEE और CLAT पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. अगर किसी तरह Central Universities में दाखिला मिल भी गया – तो वहां छात्रों को पढ़ाने के लिए प्रोफेसरों की भारी कमी है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरों के 56 फीसदी पद खाली हैं. इतना ही नहीं सरकारी शिक्षा व्यवस्था में Contract Teachers की बढ़ती संख्या भी पढ़ाई के स्तर को गिरा रही है. ऐसे में 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है. पहला, शिक्षा को रंग और राजनीति से चश्मे से देखने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी. दूसरा, शिक्षा बजट को बढ़ाकर कम से कम जीडीपी का 6 फीसदी किया जाना चाहिए. तीसरा, स्कूली शिक्षा ठीक करने के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और काबिल शिक्षक दोनों देने होंगे. चौथा, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज ऐसे कोर्सेज को सीमित करना होगा – जो जॉब मार्केट के हिसाब से प्रासंगिक नहीं हों. पांचवां, सरकारी संस्थानों में प्रोफेशनल कोर्सेज को इंडस्ट्री की जरुरतों के हिसाब से लगातार बदलना होगा - जिससे पासआउट होने के बाद युवाओं को नौकरी मिल सके. सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफा या हटाने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा. केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें शिक्षा में निवेश को एक लॉग टर्म निवेश के रूप में देखना होगा. उन स्थितियों को खत्म करने की ईमानदार राह निकालनी होगी – जो हमारी सरकारी शिक्षा प्रणाली को लगातार कमजोर कर रही हैं.