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अमेरिका के साथ शांति समझौते के बाद भी क्यों युद्ध का विजेता नजर आ रहा ईरान?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अमेरिका कथित तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर किसी भी तत्काल कटौती या रियायत की मांग न करने और इसके बजाय एक वार्ता प्रक्रिया शुरू करने पर सहमत हो गया है जो दो महीने तक चलेगी.

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यह 28 फरवरी 2026 की तारीख थी, जब अमेरिका और इजरायल ने पहली बार ईरान पर चौतरफा बमबारी की थी. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके जनरलों और खुफिया अधिकारियों को पूरा भरोसा रहा होगा कि अमेरिका और इजरायल की सैन्य ताकत ईरानी नेतृत्व को नेस्तनाबूद करने के लिए काफी होगी. उनका मानना था कि इस कार्रवाई से तेहरान ऐसी स्थिति में पहुंच जाएगा जहां वह मजबूत होकर बातचीत नहीं कर पाएगा. शुरुआत में ऐसा लगा भी कि यह योजना काम कर रही है, क्योंकि अमेरिकी और इजरायली सेना ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरानी सशस्त्र बलों के कई शक्तिशाली जनरलों को खत्म करने में सफल रही. लेकिन इस हमले के 100 से अधिक दिनों बाद, जब ट्रंप तेहरान के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने में सफल रहे, तो कई विशेषज्ञ एक ही सवाल पूछा- क्या अमेरिका और इजरायल ने इस्लामिक रिपब्लिक पर हमला करके आखिरकार उसे और मजबूत कर दिया?

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इजरायल और अमेरिका, ईरान को बड़ा सैन्य नुकसान पहुंचाने में कामयाब रहे. नातंज, इस्फहान और फोर्डो में ईरान के बहुचर्चित परमाणु ठिकानों को अमेरिकी और इजरायली लड़ाकू विमानों द्वारा किए गए योजनाबद्ध हवाई हमलों में काफी नुकसान पहुंचा. हालांकि, 15 जून को घोषित शांति समझौता यह संकेत देता है कि अमेरिका और इजरायल, ईरान को घुटनों पर लाने की अपनी योजना में विफल रहे. तेहरान इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में उभरता हुआ दिखाई दे रहा है, क्योंकि उसने न केवल अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य ताकत का सामना किया, बल्कि एक ऐसे समझौते पर भी हस्ताक्षर किए जो विश्लेषकों के अनुसार लंबे समय तक उसके लिए फायदेमंद हो सकता है.

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जानकारों का दावा है कि ईरान ने अपनी बुनियादी शर्तों पर अडिग रहते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ इस समझौते को अंतिम रूप दिया, जिन्होंने बार-बार ईरान को पूरी तरह से मिटा देने की धमकी दी थी. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि तेहरान ने ट्रंप को उन आर्थिक और राजनयिक रियायतों को मंजूरी देने के लिए मजबूर करके सभी को चौंका दिया, जो युद्ध शुरू होने से पहले असंभव लगती थीं.

शांति समझौते के तहत ट्रंप ने ईरान को क्या दिया?


सबसे पहली बात यह है कि अमेरिका और ईरान दोनों ने अभी तक इस समझौते के पूर्ण मसौदे को मीडिया के सामने सार्वजनिक नहीं किया है. हालांकि, कई रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि दोनों पक्षों के बीच हुए इस शांति समझौते के तहत ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने पर सहमत हो गया है, जबकि अमेरिका, ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी को खत्म करने के लिए तैयार हो गया है. इसके अतिरिक्त, तेहरान को अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिलने की उम्मीद है, जबकि यह समझौता अमेरिका सहित दुनियाभर के बैंकों में फ्रीज की गई अरबों डॉलर की ईरानी संपत्ति को भी अनलॉक कर सकता है.

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इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अमेरिका कथित तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर किसी भी तत्काल कटौती या रियायत की मांग न करने और इसके बजाय एक वार्ता प्रक्रिया शुरू करने पर सहमत हो गया है जो दो महीने तक चलेगी.

दूसरी ओर, तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम को तब तक के लिए अस्थायी रूप से रोकने पर सहमत हुआ है जब तक कि दोनों पक्ष इस विवादित मुद्दे पर व्यापक बातचीत के जरिए किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाते. यहीं पर विश्लेषक ईरान को विजेता मान रहे हैं, कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार और देश के उन्नत परमाणु बुनियादी ढांचे के भविष्य को लेकर चर्चाओं को आगे के लिए टाल दिया गया है. इन दोनों मुद्दों पर कोई स्पष्टता नहीं दी गई है. यह इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि अमेरिका और इजरायल दोनों ने कहा था कि ईरान पर हमला करने का प्राथमिक उद्देश्य उसके परमाणु ठिकानों को नष्ट करना और देश को भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था.

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इस युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?


सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान से कोई खास कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है, क्योंकि यह शांति समझौता ईरान के यूरेनियम भंडार या उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम जैसे मुद्दों का समाधान नहीं करता है, जिसका इस्तेमाल तेहरान ने युद्ध के दौरान इजरायल और मध्य-पूर्व में अन्य अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाने के लिए किया था. कुछ रिपोर्टों का दावा है कि हिजबुल्लाह, हमास और हूतियों जैसे प्रोक्सी समूहों के लिए तेहरान के समर्थन जैसे मुद्दों पर बाद के चरण में चर्चा की जाएगी.

सैन्य नुकसान के बावजूद ईरान ने कैसे पलटी बाजी?


ईरान ने न केवल अमेरिका और इजरायल बल्कि पूरी दुनिया को तब चौंका दिया जब उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कर लिया और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावी रूप से बंधक बना लिया. तेहरान ने होर्मुज में अपनी स्थिति का भरपूर फायदा उठाया, क्योंकि इस जलमार्ग का उपयोग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति के परिवहन के लिए किया जाता है. ईरान ने होर्मुज के माध्यम से तेल और एलएनजी शिपमेंट की आवाजाही को बाधित करने के लिए अपने सशस्त्र बलों का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिका और भारत सहित दुनिया भर के कई अन्य देशों पर भारी दबाव बन गया. यह कहना गलत नहीं होगा कि होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर पूरा नियंत्रण करके ईरान ने युद्ध के दौरान एक नया रणनीतिक हथियार खोज लिया.

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ईरान या अमेरिका: असल में कौन बना विजेता?


इसमें कोई शक नहीं कि ईरान को इस संघर्ष के दौरान भारी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा और बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. हालांकि, दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक परिणामों के मामले में तेहरान विजेता बनकर उभरा है.

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के अनुसार, जब बात परमाणु महत्वाकांक्षाओं की आती है तो तेहरान का पलड़ा अभी भी भारी दिखाई देता है. सबसे बड़ी बात यह है कि प्रतिबंधों को हटाने के लिए ट्रंप को राजी करने का श्रेय ईरानी नेतृत्व को जाता है, जो एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है और इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी मजबूती मिल सकती है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण दो दशकों से अधिक समय से गंभीर आर्थिक दबाव से जूझ रहा है.

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अब यह देखना बाकी है कि ईरान इस समझौते का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कैसे करता है, लेकिन यह कहा जा सकता है कि तेहरान ने अपनी स्थिति को उस बिंदु तक मजबूत कर लिया है जहां वह एक बार फिर अपनी शर्तों पर बातचीत करने में सक्षम है. युद्ध की शुरुआत में यह पूरी तरह से असंभव लग रहा था, और यही कारण है कि कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर बढ़त हासिल कर ली है.

First published on: Jun 15, 2026 06:25 PM

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