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पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने एक इंटरव्यू में ऐसा बयान दिया है जिससे एक बार फिर पाक की आतंकवाद पर दोहरी नीति और पाखंड उजागर हो गया है। अल जजीरा को दिए गए इस इंटरव्यू में उन्होंने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर की लोकेशन को लेकर चौंकाने वाली बात कही है। बिलावल के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार को यह नहीं पता कि मसूद अजहर कहां है, और संभव है कि वह इस वक्त अफगानिस्तान में हो।
बिलावल ने कहा कि भारत ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान को मसूद अजहर की मौजूदगी की जानकारी दी थी, लेकिन इसके बावजूद पाक सरकार उसकी मौजूदगी को लेकर अनजान होने का दावा कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को आतंकवाद के पनाहगाह के रूप में चिन्हित करता रहा है।
बिलावल भुट्टो का कहना कि “हमें नहीं पता मसूद अजहर कहां है, वह अफगानिस्तान में हो सकता है,” सिर्फ एक राजनीतिक पैंतरा है या किसी गहरी सच्चाई की ओर इशारा करता है, यह सवाल अब खड़ा हो गया है। क्या बिलावल भुट्टो पाकिस्तानी सेना और ISI की उन नीतियों की तरफ इशारा कर रहे हैं जो चरमपंथियों को संरक्षण देने का आरोप झेलती रही हैं? या यह एक सोची-समझी रणनीति है अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने की?
बिलावल से जब इंटरव्यू में जमात-उद-दावा के प्रमुख और 26/11 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि “हाफिज थोड़े समय की हिरासत के बावजूद आज़ाद व्यक्ति है।” यह बयान भी पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के खोखले दावों को उजागर करता है।
बता दें कि मसूद अजहर, जो 2000 के दशक की शुरुआत से ही भारत के खिलाफ कई बड़े आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मसूद अजहर को एक वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा चुका है। फिर भी वह आज तक पाकिस्तान में खुला घूमता रहा है। माना जाता है कि उसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का संरक्षण प्राप्त है।
पाकिस्तान बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा करता रहा है कि वह आतंकवाद के खिलाफ “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति अपनाता है। लेकिन हकीकत यह है कि कई प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के नेता पाकिस्तान में न सिर्फ सुरक्षित रहते हैं, बल्कि राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा जैसे संगठनों पर कार्रवाई केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते कागज़ों पर ही होती है।
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