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मुर्गे सिर्फ बांग नहीं देते, गुस्सा और दर्द भी जताते हैं, AI ने ऐसे पहचानी भाषा

Japanese scientists decoded the language of chickens with artificial intelligence: भले ही हमें मुर्गे की भाषा समझ में न आए, लेकिन जब वह भोर में बांग देता है तो लोग समझ जाते हैं कि सुबह हो गई। लेकिन जापान के वैज्ञानिकों ने मुर्गों की भाषा को डिकोड करने का दावा किया है। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल […]

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Japanese scientists decoded the language of chickens with artificial intelligence: भले ही हमें मुर्गे की भाषा समझ में न आए, लेकिन जब वह भोर में बांग देता है तो लोग समझ जाते हैं कि सुबह हो गई। लेकिन जापान के वैज्ञानिकों ने मुर्गों की भाषा को डिकोड करने का दावा किया है। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से यह पहेली सुलझाई है। एआई सॉफ्टवेयर मुर्गियां क्या कह रही हैं, उसका ट्रांसलेशन करता है। वे एक दूसरे से क्या बातें कर रहे हैं, यह भी समझने में सक्षम है।

विशेषज्ञों ने अपनी यह रिसर्च एक पेपर में ऑनलाइन जारी किया है। टोक्यो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एड्रियन डेविड चियोक ने रिसर्च का नेतृत्व किया है।

मैथमैटिकल मॉडल की मदद से पाई सफलता

प्रोफेसर चियोक का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग में एडवांस मैथमैटिकल मॉडल की मदद से हमने भूख, भय, क्रोध, संतोष, उत्तेजना और संकट सहित मुर्गियों में विभिन्न भावनात्मक स्थितियों को समझने में एक सक्षम सिस्टम डेवलप किया है।

प्रोफेसर का कहना है कि रिसर्च की प्रक्रिया में मुर्गियों में बदलते स्वर पैटर्न को सुनना शामिल था। इन पैटर्न को समझने और पहचानने के लिए एआई सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।

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Bird-brained

रिसर्च में 8 मुर्गियों को किया शामिल

रिसर्च की प्रक्रिया में 80 मुर्गियों को शामिल किया गया था। उनकी रिकॉर्डिंग का विश्लेषण किया गया। फिर आठ पशु मनोवैज्ञानिकों और पशु चिकित्सा सर्जनों की एक टीम का उपयोग मुर्गियों के शोर के आधार पर उनकी मानसिक स्थिति का पता लगाने के लिए किया गया।

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चेओक ने एक बयान में कहा कि यह साइंस के लिए एक शानदार सफलता है। फिलहाल यह सिर्फ शुरुआती फेज में है। हमें उम्मीद है कि हम इन एआई और मशीन लर्निंग तकनीकों को अन्य जानवरों के लिए भी अनुकूल बनाने में सक्षम होंगे।

उन्होंने बताया कि जानवरों को समझने से हमें उनके लिए एक बेहतर दुनिया बनाने में मदद मिल सकती है। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया को अन्य नस्लों में आसानी से ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है और इस क्षेत्र में अधिक शोध की आवश्यकता है।

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First published on: Sep 22, 2023 05:35 PM

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