EC के आदेश के तुरंत बाद एक्टिव हुईं ममता बनर्जी, आधी रात भेजे पसंद के पार्टी नाम और चुनाव चिह्न

चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ को लेकर विवाद में शामिल दोनों पक्षों को निर्देश दिया था कि वे आगामी बंगाल उपचुनाव के लिए पार्टी के नाम और उसके ‘दो फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न का इस्तेमाल न करें.

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रेजीनगर और नंदीग्राम में उपचुनाव छह अक्टूबर को होने हैं. (Image - ANI)

ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश पर अपना जवाब सौंपा है, जिसमें पश्चिम बंगाल में छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए मतपत्र से ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके ‘दो फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया गया है.

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सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने गुरुवार रात 11:36 बजे आयोग को आगामी चुनावों के लिए नए नामों और चुनाव चिह्नों के अपने विकल्प ईमेल के जरिए भेजे और उन्होंने चुनाव आयोग के इस फैसले पर कड़ा विरोध जताया है. रेजीनगर और नंदीग्राम में उपचुनाव छह अक्टूबर को होने हैं.

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EC ने क्या दिया था आदेश

अपने अंतरिम आदेश में, निर्वाचन आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ को लेकर विवाद में शामिल दोनों पक्षों को निर्देश दिया था कि वे आगामी पश्चिम बंगाल उपचुनावों के लिए पार्टी के नाम और उसके ‘दो फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न का इस्तेमाल न करें. आयोग ने उनसे शुक्रवार सुबह तक अपनी पसंद के नाम और चुनाव चिह्न बताने को कहा.

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आयोग ने कहा कि प्रस्तावित नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ से मिलता-जुलता हो सकता है, और चुनाव चिह्न निर्दलीय उम्मीदवारों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए अधिसूचित खाली या उपलब्ध चुनाव चिह्नों की सूची में से चुना जाना चाहिए.

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निर्वाचन आयोग ने कहा कि ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के पैराग्राफ 15 के तहत कार्यवाही पूरी करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था, लेकिन उसने आगामी उपचुनावों के लिए पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न की जरूरत को ध्यान में रखा. आयोग ने कहा कि यह अंतरिम व्यवस्था खास तौर पर आगामी उपचुनावों के लिए की गई है और यह तब तक लागू रहेगी जब तक कि ‘चुनाव चिह्न आदेश’ के पैरा 15 के तहत विवाद का अंतिम समाधान नहीं हो जाता.

क्या है विवाद?

निर्वाचन आयोग का यह आदेश उस बगावत के बाद आया है जो मई में विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में शुरू हुई थी और बाद में संसद तक पहुंच गई थी. जून में, 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी से निकाले गए नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता हासिल की, जो 28 साल के इतिहास में पहली बार पार्टी में विभाजन का संकेत था.

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पांच दिन बाद, यह बगावत संसद तक पहुंच गई. वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 लोकसभा सदस्यों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) पार्टी का दामन थामा और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट के तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दिया. इससे पार्टी के संसदीय खेमे में दरार और गहरी हो गई.

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यह कदम ममता के लिए एक झटका है. कांग्रेस से अलग होकर 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के बाद से ही अपने हाथ से बनाया गया चुनाव चिह्न पार्टी की पहचान का अहम हिस्सा रहा है.

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