जिस मां की गोद में बच्चों का बचपन महफूज होना चाहिए था. आज वही मां अपने बच्चों का पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है आंखों में आंसू हैं चेहरे पर बेबसी है सिर पर छत नहीं पैरों तले अपनी जमीन नहीं और जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द ये कि मां के चारों बच्चे दिव्यांग हैं. पैसों के अभाव में बच्चों का इलाज भी नहीं कर सके, टूटी-फूटी झोपड़ी में गुजर रही जिंदगी बारिश में टपकती छत पन्नी के सहारे कटती रातें और भूख मिटाने के लिए कभी-कभी भीख मांगने की मजबूरी सरकारी मदद की आस में परिवार ने दफ्तरों के चक्कर लगाए लेकिन परिवार का दावा है कि मदद के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिला.ये कहानी है नगर पंचायत नगर के वार्ड नंबर 10 भगत सिंह नगर के भैरोपुर में रहने वाले राम किशन के परिवार की है.
ये तस्वीरें सिर्फ एक गरीब परिवार की नहीं बल्कि उस बेबसी की तस्वीर हैं, जहां जिंदगी हर दिन एक नई परीक्षा ले रही है.घास-फूस और पन्नी से बने इस टूटे-फूटे आशियाने में राम किशन अपनी पत्नी और चार दिव्यांग बच्चों के साथ रहने को मजबूर हैं.परिवार के मुताबिक राम किशन खुद भी शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, जबकि उनके चारों बच्चे पूर्ण रूप से दिव्यांग हैं.बच्चों की हालत ऐसी है कि वे खुद अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर सकते. लिहाजा परिवार की पूरी जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई है. मां की आंखें छलक पड़ती हैं जब वो बताती है कि कई बार बच्चों का पेट भरने के लिए उसे दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है. कभी बच्चों की भूख तो कभी छत की चिंता इसी के बीच परिवार को अपनी जमीन का भी दर्द सता रहा है. परिवार का कहना है कि जिस जमीन पर उनका आशियाना बना है, वह जमीन उनके नाम नहीं है.
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राम किशन के मुताबिक उन्होंने मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह करीब डेढ़ लाख रुपये जमीन के लिए दिए थे. परिवार का आरोप है कि पैसे देने के बावजूद जमीन अब तक उनके नाम नहीं की गई.यानी एक तरफ अपना घर बनाने के लिए जमीन नहीं दूसरी तरफ बच्चों की जिंदगी संभालने के लिए पर्याप्त साधन नहीं और तीसरी तरफ सरकारी मदद की उम्मीद.परिवार का कहना है कि दिव्यांग बच्चों और आवास समेत सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए उन्होंने कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए, लेकिन अभी तक उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी. हर गुजरते दिन के साथ मां की चिंता बढ़ती जा रही है. वो चाहती है कि उसके बच्चों को किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े उन्हें एक सुरक्षित छत मिले और परिवार को रहने के लिए अपनी जमीन मिले.
सवाल सिर्फ ये नहीं कि इस परिवार की गरीबी कब दूर होगी सवाल ये है कि चार दिव्यांग बच्चों की जिंदगी कब आसान होगी कब जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस परिवार तक पहुंचेगी कब इस मां की आंखों से बेबसी के आंसू की जगह सुकून के आंसू निकलेंगे और सबसे बड़ा सवाल क्या सरकारी योजनाओं का फायदा उस परिवार तक पहुंच पाएगा, जिसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है
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नगर पंचायत नगर के वार्ड नंबर 10 भगत सिंह नगर के भैरोपुर से सामने आई ये तस्वीर सिस्टम से सिर्फ मदद नहीं इंसानियत के साथ एक जवाब भी मांग रही है.अब परिवार की एक ही गुहार है न जमीन है न पक्का घर चार बच्चे दिव्यांग हैं और मां कब तक बच्चों का पेट भरने के लिए हाथ फैलाती रहेगी अब तो सुन लो सरकार इस परिवार के लिए कोई तारनहार बनकर आगे आए.
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