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राजस्थान

‘कल्चरल मजदूर’ बनती Gen Z: ब्रांड, एल्गोरिदम और दिखावे की दौड़ में उलझी नई पीढ़ी

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में Gen Z की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका पर हुई चर्चा ने डिजिटल दौर की नई पीढ़ी की जटिलताओं को बेनकाब किया. क्रिएटर और लेखक अनुराग माइनस वर्मा ने Gen Z को ‘कल्चरल मजदूर’ करार देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी एल्गोरिदम, ब्रांड और ट्रेंड के दबाव में जी रही है, जहां पहचान मेहनत या विचारों से नहीं, बल्कि उपभोग और दिखावे से तय हो रही है.

Author Written By: kj.srivatsan Updated: Jan 19, 2026 23:02
फाइल फोटो
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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में Gen Z की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका पर हुई चर्चा ने डिजिटल दौर की नई पीढ़ी की जटिलताओं को बेनकाब किया. क्रिएटर और लेखक अनुराग माइनस वर्मा ने Gen Z को ‘कल्चरल मजदूर’ करार देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी एल्गोरिदम, ब्रांड और ट्रेंड के दबाव में जी रही है, जहां पहचान मेहनत या विचारों से नहीं, बल्कि उपभोग और दिखावे से तय हो रही है. मोबाइल और स्क्रीन की बढ़ती मौजूदगी ने ऑनलाइन-ऑफलाइन जीवन के बीच ऐसा टकराव पैदा कर दिया है, जिसने युवाओं को वास्तविक दुनिया से दूर कर दिया है.

प्रगति चाहिए, बदलाव नहीं

JLF के इस खास सत्र में सब्जेक्ट एक्सपर्ट संतोष देसाई, लेखक अनुराग माइनस वर्मा और जर्नलिस्ट रिया चोपड़ा ने मॉडरेटर चिराग ठक्कर के साथ Gen Z, मिलेनियल्स और बदलते समाज पर खुलकर बातचीत की.
संतोष देसाई ने कहा कि भारत खुद को महाशक्ति मानता है, लेकिन असल समस्या यह है कि समाज प्रगति चाहता है, बदलाव नहीं. उनके मुताबिक विकास की बातें पसंद की जाती हैं, लेकिन जब वास्तविक परिवर्तन की बात आती है, तो विरोध शुरू हो जाता है. राजनीति, जो कभी समाज को बदलने का माध्यम थी, आज समाज और संस्थानों के दबाव में ढल चुकी है. डिजिटल संस्कृति व्यक्तिगत स्तर पर भले ही परिवर्तनकारी हो, लेकिन सामूहिक तौर पर समाज अब भी बदलाव से डरता है.

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Gen Z की ‘क्रांति’ क्या है?

जर्नलिस्ट रिया चोपड़ा ने कहा कि जिसे ‘Gen Z की क्रांति’ कहा जा रहा है, वह असल में उन व्यवस्थाओं के खिलाफ प्रतिक्रिया है जो अब युवाओं के लिए काम नहीं कर रहीं. उन्होंने इसे परमाक्राइसिस की स्थिति बताया—जहां हेल्थ सिस्टम, राजनीति और जलवायु हर स्तर पर विफलताएं दिख रही हैं. दिल्ली का प्रदूषण इसका बड़ा उदाहरण है—समस्या साफ दिखती है, समाधान नहीं. ऐसे में युवाओं को लगता है कि बदलाव के लिए उन्हें खुद ही आगे आना होगा.

हर राज्य की अलग-अलग Gen Z

अनुराग वर्मा ने साफ किया कि Gen Z कोई एक जैसी पीढ़ी नहीं है. दिल्ली का युवा टेलर स्विफ्ट के कॉन्सर्ट के लिए उत्साहित हो सकता है, तो राजस्थान का सपना चौधरी के लिए. मुंबई का Gen Z जोहरान ममदानी का फैन हो सकता है, तो राजस्थान का कोई युवा अशोक गहलोत का. हर राज्य और समाज की अपनी जातिगत-वर्गीय सच्चाइयां हैं. इसलिए Gen Z को एक ही खांचे में रखकर ‘क्रांति’ की बात करना आसान नहीं. बिहार और राजस्थान में पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन भी Gen Z की ही लड़ाई हैं, भले ही वे ‘ग्लैमरस क्रांति’ न कहलाएं.

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डिजिटल आजादी बनाम रिश्तों की हकीकत

सेशन में डिजिटल रिश्तों पर असर भी चर्चा का बड़ा मुद्दा रहा. अनुराग ने कहा कि ट्विटर और रेडिट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कुछ पुरुष समूहों में जेंडर को लेकर नफरत भरी भाषा बढ़ रही है. ऑफलाइन संवाद कम होने और सिर्फ ऑनलाइन बातचीत पर निर्भरता ने जेंडर के बीच दूरी बढ़ा दी है.

उन्होंने बताया कि डेटिंग ऐप्स के बावजूद भारत में शादियां आज भी जाति और वर्ग के दायरे में ही हो रही हैं, जहां माता-पिता और समाज की मंजूरी सबसे अहम है. छोटे शहरों में डेटिंग ऐप्स को शक की नजर से देखा जाता है, जबकि मैट्रिमोनियल साइट्स पूरी तरह स्वीकार्य हैं. इंटरनेट, जिसे बराबरी का मंच माना गया था, असल में ऑफलाइन जाति-वर्ग की हायरार्की को ही दोहरा रहा है—इसे उन्होंने ‘डिजिटल जाति पुराण’ कहा.

पहचान भी अब एल्गोरिदम तय कर रहा

संतोष देसाई ने कहा कि आज पहचान ‘पिक्सलेटेड’ हो गई है. लोग क्या पहनें, क्या खरीदें, क्या पोस्ट करें—इन छोटे फैसलों से हर दिन खुद को दोबारा गढ़ रहे हैं, जैसे पूरी जिंदगी अपने ही बीटा वर्जन में चल रही हो.
रिया चोपड़ा ने जोड़ा कि कंज्यूमैरिज्म अब जरूरत नहीं, बल्कि पहचान का जरिया बन चुका है. टोट बैग, ब्रांड्स और ‘बाय नाउ, पे लेटर’ जैसी स्कीमें युवाओं को बेफिक्र खर्च की ओर धकेल रही हैं, जिसका असर पर्यावरण और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा है.

First published on: Jan 19, 2026 10:58 PM

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