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Chandigarh News: चंडीगढ़ पंजाब के लिए एक शरीर ही नहीं बल्कि इसकी आत्मा भी है और चंडीगढ़ के साथ पंजाब ही नहीं बल्कि विदेशों में बैठे हर पंजाबी चाहे वह किसी भी धर्म जात का हो उसकी भावनाएं जुड़ी हुई है, लेकिन चंडीगढ़ पंजाब का मुद्दा नया नहीं है. यह कई दशकों से पंजाब ओर हरियाणा के बीच चलता आ रहा है. जिसमें दोनों राज्य उसके ऊपर अपना अपना हक जताते आ रहे है. चंडीगढ़ महा पंजाब का एक हिस्सा था. जिसको फ़्रांस के आर्किटेक्ट ली कार्बुजिया ने बसाया था. इसमें उसने हर एक चीज का ध्यान रखा था, खासकर भविष्य की आने वाली मुश्किलों को लेकर यहां पर विधासनभा भी बनाई गई और एक सिविल सेक्रेट्रिएट भी बनाया गया.
चंडीगढ़ में एक झील भी बनाई गई थी. पंजाब और हरियाणा बनाने के बाद चंडीगढ़ की समस्या का जन्म भी हुआ. इससे पहले हिमाचल, पंजाब और हरियाणा एक पंजाब था. जिसके टुकड़े टुकड़े करके छोटे छोटे राज्य बना दिए गए. इसका विवाद भी उसी समय से चला आ रहा है. चाहे एसवाईएल नहर हो या फिर चंडीगढ़ पंजाब को देने की बात हो. इन्हीं मांगों के कारण पंजाब ने दशकों तक आंतकवाद का जख्म झेला है. पाकिस्तान हमेशा से ही पंजाब के भावनात्मक मुद्दों को हवा देता आया है, लेकिन अब चंडीगढ़ का जिन्न केंद्र सरकार ने फिर से बोतल से निकाल दिया है. इससे पहले पंजाब यूनिवर्सिटी का मुद्दा गर्माया हुआ है और छात्र आज भी यूनिवर्सिटी की सीनेट चुनाव को लेकर धरने पर बैठे है. पंजाब के सारे राजनीतिक और सोशल संगठन उनकी मांगों का समर्थन कर रहे है. वहीं चंडीगढ़ के मुद्दे पर एक बार फिर से चंडीगढ़ को चाहने वाले राजनीतिक ओर सोशल संगठनों ने सोशल मीडिया पर अपनी आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है.
अकाली दल द्वारा चंडीगढ़ के लिए एक बड़ा प्रस्ताव श्री आनंदपुर साहिब का दशकों पहले पास किया हुआ है. अब श्री आनंदपुर साहिब में ही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब का 350 साला शहीदी पर्व मनाया जा रहा है. अचानक चंडीगढ़ के स्टेटस की धारा 239 से 240 करने और आने वाले पार्लियामेंट सेशन में लाने ने सबको हैरत में डाल दिया है. इसके पास होने पर इसकी सीधी कमान राष्ट्रपति के हाथ चली जाएगी. यहां का सारा प्रशाशन राष्ट्रपति के अधीन आ जाएगा. चंडीगढ़ पंजाब को देने की वकालत करने वाले कहते है कि चंडीगढ़ पंजाब के गांवों को उजाड़ कर बनाया गया था. पंजाब की जमीन पर इसकी नींव रखी गई. जिसके कारण पंजाबियों का हक इसपर बनता है. इसलिए पंजाब और हरियाणा के कारण इसको यूनियन टेरेटरी का दर्जा दिया गया. जिसमें काम करने वाले अधिकारियों को यहां पर 60-40 की रेशों से तैनात किया जाता है. अब इस रेशों के हिसाब को भी तोड़कर ज्यादा संख्या हरियाणा के अधिकारियों की कर दी गई. जिसका सामाजिक संगठन और राजनीतिक पार्टियां आरोप लगाती है.
चंडीगढ़ के हक का विवाद भी सत्तर वर्ष पुराना है. जिसकी शुरुआत महा पंजाब के पूर्वी पंजाब को तोड़कर शुरू हुई थी. 1966 से लेकर 1986 तक छह कमीशन बने, लेकिन इस विवाद का अंत नहीं हो पाया. ऐसे में अब संशोधन विधेयक ने आग पर घी का काम किया है. चंडीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाने का भी एक दिलचस्प किस्सा है. जो दो पंजाब को एक करने के बाद इसकी राजधानी बनाया गया. 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के ने इसकी नींव रखी थी. 7 अक्टूबर 1953 को उस समय के राष्ट्रपति जगजीवन लाल ने इसका उद्घाटन किया था. उस समय पेप्सू (पटियाला ओर ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन जिनमें पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, फरीदकोट, नालागढ़, कालका, फरीदकोट जिसकी राजधानी पटियाला थी. पूर्वी पंजाब की राजधानी एक नवंबर 1956 को मिलाकर महा पंजाब बनाया गया, तो चंडीगढ़ को पंजाब की राजधानी बना दिया गया था. उस समय चंडीगढ़ में एक विधानसभा थी. जो 1966 तक जारी रही.
इसके बाद हरियाणा का जन्म हुआ तो चंडीगढ़ में बनी विधानसभा में ही अलग से हरियाणा की विधानसभा बनाई गई. यहां से ही दोनों राज्यों का चंडीगढ़ को लेकर हक शुरू हुआ. 1980 के दशक के बाद पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत हुई. फिर 1984 के बाद उस समय शिरोमणी अकाली दल के अध्य्क्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल और राजीव गांधी के बीच समझौता हुआ. जिसमें चंडीगढ़ को पंजाब को देने की बात कही गई जो अब तक सिरे नहीं चढ़ पाया. फिलहाल पंजाब की सारी राजनीतिक पार्टियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी शुरू कर दी है. अपनी अपनी पार्टी की रणनीति बनाने में जुट गए है. जिसमें शिरोमणी अकाली दल ने एक कदम आगे बढ़कर कल अपनी पार्टी की एमरजेंसी कोर कमेटी की बैठक बुला ली है. वही पर कांग्रेस ओर आम आदमी पार्टी भी इसको लेकर योजना बना रही है.
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