Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने रेप की कोशिश से जुड़े करीब 26 साल पुराने मामले में अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि सिर्फ रात में महिला के घर में घुसना, उसके कपड़े उठाना और उसे पकड़ लेना, अपने आप में रेप की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक रेप करने की दिशा में कोई विशिष्ट और स्पष्ट प्रत्यक्ष कृत्य सामने न आए.
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने निचली अदालत के फैसले में बड़ा बदलाव करते हुए आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत मिली 4 साल की सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया. अदालत ने मामले को महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से किए गए हमले यानी धारा 354 IPC के तहत माना.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पीड़ित लड़की की पूरी गवाही को देखने पर आरोपी की ओर से ऐसा कोई खास प्रत्यक्ष कृत्य सामने नहीं आता, जिसे रेप करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सके. हालांकि, आरोपी का आचरण अश्लील हमला था, जिससे महिला की लज्जा भंग होने की आशंका थी.
क्या था पूरा मामला?
घटना 27 दिसंबर 1999 की देर रात पूर्वी सिंहभूम जिले के एक गांव की है. आरोप के मुताबिक महिला अपने घर में सो रही थी और उस समय घर में कोई पुरुष सदस्य मौजूद नहीं था. आधी रात के करीब आरोपी कथित तौर पर दरवाजा खोलकर कमरे में दाखिल हुआ और महिला के साथ आपत्तिजनक हरकत की. आरोप है कि उसने महिला के कपड़े उठाकर उसके साथ छेड़छाड़ की.
महिला के शोर मचाने पर परिवार के सदस्य और पड़ोसी मौके पर पहुंच गए. इसके बाद आरोपी वहां से फरार हो गया. घटना को लेकर में 31 दिसंबर 1999 को FIR दर्ज की गई. पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की. मामले की सुनवाई के बाद घाटशिला के एडिशनल सेशंस जज ने 28 जुलाई 2006 को आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराते हुए 4 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके खिलाफ आरोपी ने झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की.
हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई?
सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी ने अदालत के सामने दलील दी कि पीड़िता और गवाहों के बयानों से रेप के प्रयास के लिए जरूरी कानूनी तत्व साबित नहीं होते. हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का समग्र रूप से मूल्यांकन करने के बाद माना कि आरोपी का कृत्य धारा 376/511 के तहत रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने वाला हमला माना जाएगा.
अदालत ने ये भी ध्यान में रखा कि घटना को 26 साल से अधिक समय बीत चुका है, आरोपी का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उसकी उम्र, चरित्र तथा पूर्ववृत्त को देखते हुए कठोर सजा देना न्यायहित में उचित नहीं होगा.इस आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को पहले ही जेल में बिताई करीब 8 महीने की अवधि को उसकी सजा माना. यानी 4 साल की सजा के बजाय आरोपी को उसकी तरफ से पहले से भुगती गई अवधि के बराबर सजा सुनाई गई. इस तरह हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा में संशोधन करते हुए आरोपी को धारा 376/511 के बजाय धारा 354 IPC के तहत दोषी माना और सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया.
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