हिमाचल प्रदेश में भूमिहीन किसानों को जमीन देने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद नीति न बनने और फोरलेन निर्माण के नाम पर हो रही मनमानी के खिलाफ किसान-बागवान सड़कों पर उतर आए हैं. हिमाचल किसान सभा और हिमाचल सेब उत्पादक संघ के आह्वान पर सोमवार को टॉलैंड से सचिवालय तक एक विशाल मार्च निकाला गया. इस प्रदर्शन का नेतृत्व प्रदेश किसान सभा अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर और पूर्व विधायक राकेश सिंघा ने किया. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रदेश सरकार ने आज तक भूमिहीन किसानों के हक में कोई ठोस नीति नहीं बनाई है. इसके विपरीत, बड़े प्रोजेक्ट्स के बहाने किसानों को उनकी जमीनों से लगातार बेदखल किया जा रहा है. किसान सभा ने इसे सरकार और भ्रष्ट अधिकारियों का कॉरपोरेट कंपनियों के साथ गठजोड़ करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है.
अवैज्ञानिक फोरलेन निर्माण और GSI-IIT से जांच कराने की उठती मांग
सचिवालय घेराव के दौरान किसान नेताओं ने फोरलेन निर्माण के अवैज्ञानिक तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. प्रदर्शनकारियों ने संजौली में भवन ढहने, भट्टाकुफर में सड़क धंसने और चलौंठी क्षेत्र में मकानों में आई दरारों का हवाला देते हुए कहा कि इन घटनाओं से कई परिवार बेघर हो गए हैं. हैरानी की बात यह है कि निर्माण कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है और न ही प्रभावितों को उचित मुआवजा मिल रहा है. राकेश सिंघा ने मांग की कि इन निर्माण कार्यों की 'भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था' (GSI), आईआईटी रुड़की और आईआईटी मंडी जैसे विशेषज्ञ संस्थानों से वैज्ञानिक जांच करवाई जाए. उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां मानकों की अनदेखी हुई है, वहां काम तुरंत रोका जाना चाहिए और दोषियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए.
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FTA समझौता और 5500 करोड़ के सेब उद्योग पर मंडराता खतरा
इस विरोध प्रदर्शन का एक प्रमुख मुद्दा दिसंबर 2025 में न्यूजीलैंड के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भी रहा. बागवानों का कहना है कि इस समझौते के बाद विदेशी सेब के आयात से हिमाचल के ढाई लाख से अधिक बागवानों का भविष्य दांव पर लग गया है. किसानों को डर है कि न्यूजीलैंड की आड़ में अब अमेरिका जैसे अन्य देश भी इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने का दबाव बनाएंगे, जिससे प्रदेश का करीब 5500 करोड़ रुपये का सेब उद्योग पूरी तरह तबाह हो जाएगा. राकेश सिंघा ने केंद्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह विदेशी बाजारों के फायदे के लिए घरेलू खेती को दांव पर लगा रही है. सस्ते आयातित सेब और लगातार बढ़ती उत्पादन लागत ने स्थानीय बागवानों की कमर तोड़ दी है, जिसका असर जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड तक देखने को मिलेगा.
शिमला में चक्का जाम और आंदोलन को और उग्र करने की चेतावनी
मार्च के चलते छोटा शिमला और सचिवालय क्षेत्र की ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई, जिससे आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी बैरिकेडिंग की थी, लेकिन किसान और बागवान केंद्र व राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए डटे रहे. राकेश सिंघा ने सरकार को दो टूक चेतावनी दी कि यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार भूमिहीन किसानों के लिए जल्द नीति नहीं बनाई गई और फोरलेन व सेब आयात के मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो यह आंदोलन आने वाले समय में और भी उग्र रूप धारण करेगा. किसान सभा ने साफ कर दिया है कि वे अपनी रोजी-रोटी और जमीन को बचाने के लिए किसी भी हद तक संघर्ष करने को तैयार हैं.
हिमाचल प्रदेश में भूमिहीन किसानों को जमीन देने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद नीति न बनने और फोरलेन निर्माण के नाम पर हो रही मनमानी के खिलाफ किसान-बागवान सड़कों पर उतर आए हैं. हिमाचल किसान सभा और हिमाचल सेब उत्पादक संघ के आह्वान पर सोमवार को टॉलैंड से सचिवालय तक एक विशाल मार्च निकाला गया. इस प्रदर्शन का नेतृत्व प्रदेश किसान सभा अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर और पूर्व विधायक राकेश सिंघा ने किया. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रदेश सरकार ने आज तक भूमिहीन किसानों के हक में कोई ठोस नीति नहीं बनाई है. इसके विपरीत, बड़े प्रोजेक्ट्स के बहाने किसानों को उनकी जमीनों से लगातार बेदखल किया जा रहा है. किसान सभा ने इसे सरकार और भ्रष्ट अधिकारियों का कॉरपोरेट कंपनियों के साथ गठजोड़ करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है.
अवैज्ञानिक फोरलेन निर्माण और GSI-IIT से जांच कराने की उठती मांग
सचिवालय घेराव के दौरान किसान नेताओं ने फोरलेन निर्माण के अवैज्ञानिक तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. प्रदर्शनकारियों ने संजौली में भवन ढहने, भट्टाकुफर में सड़क धंसने और चलौंठी क्षेत्र में मकानों में आई दरारों का हवाला देते हुए कहा कि इन घटनाओं से कई परिवार बेघर हो गए हैं. हैरानी की बात यह है कि निर्माण कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है और न ही प्रभावितों को उचित मुआवजा मिल रहा है. राकेश सिंघा ने मांग की कि इन निर्माण कार्यों की ‘भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था’ (GSI), आईआईटी रुड़की और आईआईटी मंडी जैसे विशेषज्ञ संस्थानों से वैज्ञानिक जांच करवाई जाए. उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां मानकों की अनदेखी हुई है, वहां काम तुरंत रोका जाना चाहिए और दोषियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए.
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FTA समझौता और 5500 करोड़ के सेब उद्योग पर मंडराता खतरा
इस विरोध प्रदर्शन का एक प्रमुख मुद्दा दिसंबर 2025 में न्यूजीलैंड के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भी रहा. बागवानों का कहना है कि इस समझौते के बाद विदेशी सेब के आयात से हिमाचल के ढाई लाख से अधिक बागवानों का भविष्य दांव पर लग गया है. किसानों को डर है कि न्यूजीलैंड की आड़ में अब अमेरिका जैसे अन्य देश भी इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने का दबाव बनाएंगे, जिससे प्रदेश का करीब 5500 करोड़ रुपये का सेब उद्योग पूरी तरह तबाह हो जाएगा. राकेश सिंघा ने केंद्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह विदेशी बाजारों के फायदे के लिए घरेलू खेती को दांव पर लगा रही है. सस्ते आयातित सेब और लगातार बढ़ती उत्पादन लागत ने स्थानीय बागवानों की कमर तोड़ दी है, जिसका असर जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड तक देखने को मिलेगा.
शिमला में चक्का जाम और आंदोलन को और उग्र करने की चेतावनी
मार्च के चलते छोटा शिमला और सचिवालय क्षेत्र की ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई, जिससे आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी बैरिकेडिंग की थी, लेकिन किसान और बागवान केंद्र व राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए डटे रहे. राकेश सिंघा ने सरकार को दो टूक चेतावनी दी कि यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार भूमिहीन किसानों के लिए जल्द नीति नहीं बनाई गई और फोरलेन व सेब आयात के मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो यह आंदोलन आने वाले समय में और भी उग्र रूप धारण करेगा. किसान सभा ने साफ कर दिया है कि वे अपनी रोजी-रोटी और जमीन को बचाने के लिए किसी भी हद तक संघर्ष करने को तैयार हैं.