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Religion

Magh Gupt Navratri 2026: माघ नवरात्रि के चौथे दिन आज होगी मां भुवनेश्वरी की पूजा, जानें महत्व, साधना विधि और मंत्र

Magh Gupt Navratri 2026: आज 22 जनवरी 2026 को माघ गुप्त नवरात्रि का चौथा दिन है, जब दस महाविद्याओं की चौथी देवी मां भुवनेश्वरी की पूजा होती है. क्यों खास है यह तिथि, क्या है देवी का स्वरूप और उनकी साधना से कौन से फल मिलते हैं? आइए जानते हैं, महत्व, पूजा विधि और साधना मंत्र

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Written By: Shyamnandan Updated: Jan 22, 2026 07:53
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Magh Gupt Navratri 2026: आज गुरुवार 22 जनवरी, 2026 को माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है और आज इस मास की गुप्त नवरात्रि का चौथा दिन है. आज के दिन गुप्त नवरात्रि की दस महाविद्या की चौथी देवी मां भुवनेश्वरी की पूजा का विधान है. आइए जानते हैं, गुप्त नवरात्रि के चौथे दिन का क्या महत्व है, मां भुवनेश्वरी का स्वरूप कैसा है, उनकी साधना से क्या फल मिलता है और पूजा विधि क्या है?

गुप्त नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व

मान्यता है की गुप्त नवरात्रि का चौथा दिन आंतरिक शक्ति को जागृत करने से जुडा होता है. साधक इस दिन ध्यान और मंत्र साधना के माध्यम से हृदय चक्र को सक्रिय करने का प्रयास करते हैं. माना जाता है कि मां भुवनेश्वरी की कृपा से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
मां भुवनेश्वरी कौन हैं?

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मां भुवनेश्वरी का दिव्य स्वरूप

मां भुवनेश्वरी दस महाविद्याओं में चौथे स्थान पर विराजमान हैं और उन्हें ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी तथा आदि पराशक्ति का दिव्य स्वरूप माना जाता है. वे संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति और संचालन की शक्ति हैं, जो सभी लोकों और ऐश्वर्य पर नियंत्रण रखती हैं. उनकी उपासना से साधक को मानसिक शांति, वैभव और आत्मिक चेतना की प्राप्ति होती है. उनका स्वरूप आकाश की भांति विशाल और दिव्य प्रकाश से युक्त माना गया है. वे अपने हाथों में चंद्रमा, पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा अभय और वरद मुद्रा से भक्तों को संरक्षण और आशीर्वाद प्रदान करती हैं.

साधना का फल

मां भुवनेश्वरी की पूजा से मानसिक स्थिरता, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता मजबूत होती है. उनकी साधना से धन, ऐश्वर्य और सामाजिक सम्मान की प्राप्ति मानी जाती है. साधक को भय, भ्रम और अस्थिरता से मुक्ति मिलती है. यह साधना जीवन में संतुलन और स्पष्टता लाने में सहायक मानी जाती है. मां भुवनेश्वरी को शताक्षी और शाकंभरी भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि सृष्टि की रक्षा के समय उन्होंने जल और औषधियों के माध्यम से समस्त प्राणियों का पालन और संरक्षण किया था.

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दुर्गमासुर का वध

पौराणिक मान्यता के अनुसार, दुर्गम नामक राक्षस के अत्याचारों से जब देवता अत्यंत पीडित हो गए, तब उन्होंने हिमालय में कठोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भुवनेश्वरी प्रकट हुईं. कहा जाता है कि उनके नेत्रों से निकली जलधाराओं से पृथ्वी पर जल का संचार हुआ और औषधियों का विकास हुआ, जिससे समस्त प्राणी जीवनदान पा सके. इसके बाद देवी ने दुर्गमासुर का संहार कर वेदों को पुनः देवताओं को सौंपा. उन्हें शताक्षी और शाकंभरी भी कहा जाता है.

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पूजा विधि

चौथे दिन प्रातः स्नान के बाद साफ स्थान पर पूजा वेदी तैयार की जाती है. साधक लाल या पीले वस्त्र पहनते हैं. वे मां भुवनेश्वरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करते हैं और दीपक जलाकर फूल, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करते हैं. इसके बाद मां के मंत्र का शांत मन से जाप करते हैं और ये ध्यान रखते हैं कि पूजा के दौरान मन एकाग्र और भाव शुद्ध रहे.

मां भुवनेश्वरी साधना मंत्र

मूल नमस्कार मंत्र

ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः

यह मंत्र सामान्य साधक भी जप सकते हैं. इससे मन की अशांति दूर होती है और जीवन में संतुलन व सकारात्मकता आती है.

पंचाक्षर मंत्र

ॐ श्रीं ऐं क्लीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः

इस मंत्र का जप विद्या, धन, प्रभाव और सर्वांगीण उन्नति के लिए किया जाता है. यह गृहस्थ और साधक दोनों के लिए उपयुक्त है.

दरिद्रता नाशक मंत्र

हूं हूं ह्रीं ह्रीं दारिद्रय नाशिनी भुवनेश्वरी ह्रीं ह्रीं हूं हूं फट्

इस मंत्र का जप आर्थिक संकट, कर्ज और बाधाओं से मुक्ति के लिए किया जाता है. इसे संयम और नियम के साथ जपना माना जाता है.

भुवनेश्वरी गायत्री मंत्र

ॐ नारायण्यै विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्

यह मंत्र ध्यान और मानसिक शुद्धता के लिए श्रेष्ठ माना जाता है. इससे विवेक, निर्णय शक्ति और आध्यात्मिक चेतना विकसित होती है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Jan 22, 2026 07:29 AM

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