कोटितीर्थ कुंड के जल के बिना अधूरी है महाकाल की पूजा, हनुमानजी लाए थे समस्त तीर्थों का जल, जानें पूरी कथा

Ujjain Mahakaleshwar: मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की सुबह में होने वाली भस्म आरती का विशेष महत्व है। इस आरती से पहले उनका विशेष जल से अभिषेक किया जाता है। आइए जानते हैं, यह पवित्र जल कहां से आता है और इसका महत्व क्या है?

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Ujjain Mahakaleshwar: भगवान शिव का प्रिय महीना सावन शुरू हो चुका है। इस मौके पर उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में श्री महाकाल की भस्म आरती के पहले विशेष जलाभिषेक किया जाता है। इस जल के बिना भगवान महाकाल की पूजा अधूरी मानी जाती है। कहते हैं, जिस जल से उनका अभिषेक होता है, उसमें भारत के सभी तीर्थों का जल होता है। आइए जानते हैं, इस पवित्र जल की विशेषताएं, महत्व और इतिहास।

कोटि तीर्थ कुंड से लाया जाता जल

सदियों से भगवान महाकाल की भस्म आरती से पहले चढ़ने वाला जल जल कोटितीर्थ कुंड से लाया जाता है। यह एक प्राकृतिक कुंड है, जो महाकाल मंदिर के पिछले हिस्से में स्थित है। मान्यता है कि इस कुंड का जल औषधि-युक्त जल है। इस कुंड के जल में के बारे कहा जाता है कि जो व्यक्ति इसे ग्रहण करता है, उसके सभी रोग और शोक खत्म हो जाते हैं, जीवन की बाधाएं दूर होने लगती है। बता दें, हजारों साल से शिप्रा नदी और इस पावन कुंड के जल से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक-पूजन होता आ रहा है।

हरिओम जल से होता है महाकाल का पंचामृत अभिषेक

प्रतिदिन सूर्योदय से पहले मदिर के गर्भगृह की सफाई के बाद भगवान महाकाल को स्नान करवाया जाता है। इसके बाद उनका ‘पंचामृत अभिषेक’ होता है। इस दौरान सारा जल कोटितीर्थ कुंड से लाया जाता है। इस जल को ‘हरिओम जल’ कहते हैं। इसके बाद बाबा महाकाल की भस्म आरती होती है। बता दें, सदियों से इसी जल का उपयोग मंदिर आने वाले शिव भक्त और श्रद्धालु भगवान महाकाल का अभिषेक करने के लिए करते आ रहे हैं।

हनुमानजी लाए थे सभी तीर्थों का जल

महाकाल की पावन नगरी उज्जैन स्थित कोटितीर्थ कुंड एक अतिप्राचीन प्राकृतिक सरोवर है। इस सरोवर यानी कुंड का वर्णन और महत्व पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंका विजय करने के बाद भगवान श्रीराम ने यज्ञ करने के लिए सभी तीर्थों का जल लाने का काम हनुमानजी को दिया था। भगवान हनुमान आखिरी में अवंतिका यानी उज्जैन नगरी पहुंचे थे, तब उन्होंने इस कुंड में उस समस्त तीर्थो का जल डाला था। इसलिए इसको कोटितीर्थ यानी करोड़ों तीर्थ के जल वाला कुंड कहते हैं। इसके प्रमाण के रूप में महाकाल मंदिर परिसर में हनुमानजी एक प्रतिमा है, जिसमें उनके एक हाथ में कलश है और दूसरे हाथ में सोटा है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक  शास्त्र पर आधारित हैं और केवल जानकारी के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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लेखक के बारे में

Shyamnandan

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श्यामनंदन कुमार News24.com में चीफ सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामनंदन ज्योतिष, अंक शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, पर्व-त्योहार सहित भारतीय धर्म-संस्कृति के जानकार पत्रकार हैं. उन्होंने पत्रकारिता में एम.ए. की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से की है और ज्योतिष का अध्ययन भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से किया है. अपने पेशे में डिजिटल करियर की शुरुआत उन्होंने एनडीटीवी कन्वर्जेंन्स के साथ की. श्यामनंदन हिंदुस्तान टाइम्स, बंसल न्यूज (भोपाल) जैसे न्यूज प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने देश के प्रसिद्ध संतों के सत्संग और समागम की रिपोर्टिंग की है.
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