वैज्ञानिकों ने मून मिशनों के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जिसमें पृथ्वी और चंद्रमा के बीच मौजूद L1 लैग्रांजियन प्वॉइंट का इस्तेमाल ट्रांजिट हब की तरह किया जाएगा. इस तकनीक से फ्यूल की बचत होगी और फ्यूचर के ह्यूमन एंड रोबोटिक मून मिशन को ज्यादा कामयाब बनाया जा सकेगा.
क्या है L1 लैग्रांजियन प्वाइंट?

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L1 एक खास gravitational point है, जो पृथ्वी और चंद्रमा के बीच मौजूद होता है. यहां दोनों खगोलीय पिंडों(celestial bodies) का ग्रैविटेशन बैलेंस में रहता है. इसी वजह से स्पेसशिप यहां कम एनर्जी खर्च करके स्टेबल रह सकते हैं. वैज्ञानिक इसे भविष्य के स्पेस स्टेशन या ट्रांजिट सेंटर के तौर पर देख रहे हैं.
कम फ्यूल में लंबी अंतरिक्ष यात्रा

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नई रिसर्च में ऐसी ट्रांसफर तकनीक डेवलेप की गई है जो पारंपरिक चंद्र मिशनों की तुलना में कम फ्यूल खर्च करती है. स्टडी के मुताबिक, इस नई प्रोसेस से कम से कम 58.80 मीटर प्रति सेकंड तक फ्यूल की बचत हो सकती है.
स्पेस ट्रैजेक्टरी का रोल

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रिसर्च में Lyapunov ऑर्बिट और उससे जुड़े स्थिर और अस्थिर मैनीफोल्ड्स का इस्तेमाल किया गया. इन जटिल अंतरिक्ष रास्तों की मदद से स्पेसशिप को पृथ्वी से चांद तक ज्यादा कुशल तरीके से पहुंचाया जा सकता है. वैज्ञानिकों ने करोड़ों ट्रांसफर रूट्स का विश्लेषण कर सबसे कम लागत वाले ऑप्शन चुने.
मून फ्लाईबाय तकनीक ने किया काम

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नई प्रोसेस में अंतरिक्ष यान पहले चंद्रमा के पास से फ्लाईबाय करता है और फिर L1 के आसपास मौजूद Lyapunov ऑर्बिट में एंट्री करता है. इसके बाद लास्ट फेज में यान फिर से चंद्रमा की ओर बढ़ता है. इस पूरे सफर में gravitational force का इस्तेमाल कर फ्यूल बचाया जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये तकनीक सिर्फ मून मिशनों तक सीमित नहीं रहेगी. भविष्य में मंगल और बाकी ग्रहों की यात्रा के लिए भी इसी तरह के एनर्जी सेविंग रूट्स डेवलेप किए जा सकते हैं
(All Photos Credit: Social Media)