भारत में कई प्राचीन और रहस्यमय मंदिर हैं, जिनकी कहानियां सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी काफी मशहूर हैं. सोशल मीडिया पर कई मंदिरों के रहस्य को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है. आज हम आपको भारत के उन मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके रहस्य आज भी अनसुलझे हैं.
पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल)

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देश के अलग-अलग राज्यों से कई श्रद्धालु केलर के तिरुवनंतपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर में माथा टेकने पहुंचते हैं. पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहखाने की चर्चा उस समय दुनियाभर में फैली, जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसके तहखानों की जांच में अरबों डॉलर की कीमत का खजाना मिला. मंदिर के कई तहखाने तो खोले गए लेकिन 'वॉल्ट B' नाम का एक कक्ष मंदिर की परंपराओं और कानूनी संवेदनशीलताओं के कारण नहीं खोला गया. इसके अंदर क्या है, यह अभी भी रहस्य ही है.
वेराबत्रा मंदिर (आंध्र प्रदेश)

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विजयनगर काल में बने इस मंदिर की सबसे मशहूर बात है 'झूलता स्तंभ' ऐसा खंभा जो जमीन पर पूरी तरह टिकता हुआ नहीं दिखता. पुरातत्व सर्वेक्षण और इंजीनियरिंग के कई अध्ययन हो चुके हैं, लेकिन यह औरों में सबसे रोचक रहस्य बना हुआ है. अभी भी यहां आने वाले लोग उस स्तंभ के नीचे कपड़ा फिसलाकर अंतर दिखाते हैं.
कैलाश मंदिर (महाराष्ट्र)

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यह दुनिया के सबसे बड़े एकल पत्थर से बने स्मारकों में से एक है. इस मंदिर को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया गया, यानी ऊपर से खोदा गया, न कि अलग-अलग पत्थर जोड़कर. इतनी मात्रा में चट्टान हटाने और काम की स्केल आज भी शोधकों को हैरान करती है.
कोणार्क सूर्योदय मंदिर (ओड़िशा)

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कोणार्क से जुड़ी एक पुरानी कहानी है कि मंदिर की छत पर एक बहुत बड़ी चुंबकीय चट्टान (लॉडस्टोन) लगी थी. एएसआई और इतिहासकारों ने इस बात का ठोस प्रमाण नहीं पाया है, फिर भी यह किस्सा लोगों के बीच बहुत प्रसिद्ध है.
ज्वाला जी मंदिर (हिमाचल प्रदेश)

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यह मंदिर अपने आप जलने वाली आग की लौ के लिए मशहूर है जो चट्टान की दरारों से ज्वालाएं लगातार निकलती हैं. भूवैज्ञानिकों ने इसे प्राकृतिक गैस रिसाव से जोड़कर देखा है, हालांकि अभी तक लौ की के स्त्रोत का पता नहीं चल पाया है. भक्तों के लिए ये लौ देवी का रूप मानी जाती है.
बृहदेश्वर मंदिर (तमिलनाडु)

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रजा राजा चोला ने 11वीं सदी में बनाया यह मंदिर ऊंचे शिखर और ऊपर एक लगभग 80 टन का ग्रेनाइट का सिरोपा रखने के लिए जाना जाता है. यूनेस्को और एएसआई के अनुसार शायद एक बड़ी मिट्टी की ढुलाई-ढांचे से पत्थर ऊपर रखा गया होगा, लेकिन असली तरीके की सटीक योजना आज भी इतिहासकारों के लिए एक बहस का विषय है.
स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (गुजरात)

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आपको जानकर हैरानी होगी कि ज्वार के समय यह मंदिर पानी में डूब जाता है और फिर पानी उतरते ही वापस दिखने लगता है. गुजरात पर्यटन और स्थानीय अधिकारियों के पास इस घटना का अच्छा-खासा डॉक्यूमेंट है, इसलिए यह अनुभव बहुत अलग और दिलचस्प माना जाता है.