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आपने काजू कतली कभी न कभी तो जरूर खाया होगा, जिसका स्वाद इतना शानदार होता है कि मन करता है बार-बार खाया जाए. लेकिन क्या आप जानते हैं ये काजू कतली का आविष्कार कैसे हुआ था? आइए जानते हैं इस स्टोरी में इसकी दिलचस्प कहानी.
Gwalior Fort Prison Stories

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दीवाली, शादी या किसी बड़े जश्न में काजू कतली सबसे पसंदीदा मिठाइयों में गिनी जाती है. चांदी के वर्क से सजी यह मिठाई स्वाद के साथ सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है, यही वजह है कि आज यह हर घर की पहली पसंद बन चुकी है.
शाही महल नहीं, जेल से जुड़ा है इसका इतिहास

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लोकप्रिय मान्यता के अनुसार काजू कतली का इतिहास करीब 400 साल पुराना माना जाता है. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत किसी हलवाई की दुकान में नहीं, बल्कि ग्वालियर किला की जेल से हुई थी.
जहांगीर के समय बनी खास मिठाई

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बताया जाता है कि मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में गुरु हरगोबिंद साहिब और कई राजाओं को ग्वालियर किले में कैद रखा गया था. गुरु ने वहां कैदियों की दयनीय स्थिति को सुधारने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. गुरु के इस सेवा भाव से प्रभावित होकर जब जहांगीर ने उन्हें और उनके साथ उन राजाओं को रिहा करने का आदेश दिया.
सम्मान और खुशी का प्रतीक बना स्वाद

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जब कैदियों को आजादी मिली, तब इस खुशी को खास बनाने के लिए काजू पीसकर मीठा व्यंजन बनाया गया. धीरे-धीरे यही मिठाई लोगों में लोकप्रिय हुई और बाद में इसे काजू कतली नाम से पहचाना जाने लगा.
भारत में ऐसे पहुंचा काजू

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इतिहासकारों के अनुसार काजू भारत का मूल मेवा नहीं था, बल्कि पुर्तगाल के व्यापारी इसे ब्राजील से गोवा लाए थे. शुरुआत में इसका उपयोग जमीन बचाने के लिए हुआ, फिर भारतीय रसोइयों ने इसे मिठाइयों में अपनाया.
डायमंड शेप ने बढ़ाई पहचान

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काजू कतली का खास हीरे जैसा आकार बाद में दिया गया. शाही रसोइयों ने इसे सुंदर बनाने के लिए चांदी का वर्क, केसर और आकर्षक कटिंग का इस्तेमाल किया गया. इसी कारण यह मिठाई देखने में भी शानदार लगती है.
अस्वीकरण: यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स और पब्लिक डोमेन में मौजूद अन्य स्रोतों पर आधारित हैं. News24 इनकी पुष्टि नहीं करता है. (Image: AI/Pexesl)