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कहते हैं शादी का लड्डू जो खाए पछताए और जो न खाए वो भी पछताए. दरअसल ये कहावत बिल्कुल सच है. शादी के बाद का सबसे खूबसूरत फेज होता है हनीमून फेज. यानी शादी के बाद शुरुआती 1-2 महीने. लेकिन जैसे ही ये हनीमून पीरियड खत्म होता है और इसका खुमार उतरता है तो असल जिंदगी शुरू होती है. आपको एहसास होता है कि जो शादियां असल में फिल्मों में दिखाई जाती है वो असल जिंदगी से बेहद अलग होती है. हनीमून पीरियड खत्म होने के बाद अचानक आपके सामने कई असलियत आने लगती हैं और ये ऐसी बातें होती हैं जिनके लिए आप बिल्कुल भी तैयार नहीं होते हैं. तो आइए जानते हैं शादी से जुड़ी 5 ऐसी कड़वी सच्चाइयों के बारे में जो अक्सर हनीमून का दौर खत्म होने के बाद ही सामने आती हैं.
शादी है एक बड़ी जिम्मेदारी

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हनीमून पीरियड तक तो शादी बहुत ही खूबसूरत लगती है. इस दौरान एक-दूसरे की आंखों में खो जाना और एक-दूसरे की तारीफ करना होता है. लेकिन, जब आप अपनी रियल लाइफ में यानी रूटीन लाइफ में लौटते हैं तो आपको एहसास होता है कि शादी का असली मतलब तो कुछ और ही है. इसमें किराने का सामान लाना से लेकर घर का राशन, बिजली का बिल भरना और घर घर की अन्य सभी जिम्मेदारियों को आपस में बांटना भी शामिल होता है.
परफेक्ट पार्टनर जैस कुछ नहीं होता!

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डेटिंग के दौरान या हनीमून के समय हर कोई अपना सबसे अच्छा रूप दिखाता है, लेकिन जब दो लोग 24 घंटे, सातों दिन एक ही छत के नीचे और एक ही कमरे में रहते हैं तो उनकी असली आदतें और उनका सच सामने आता है. जोर-जोर से खर्राटे लेना, बिस्तर पर गीला तौलियां छोड़ देना या फिर सुबह उठते ही बिना ब्रश किए खाने लगना, ये सभी बातें उस परफेक्ट छवि को तोड़ देती हैं. कड़वी सच्चाई यह है कि आपको अपने पार्टनर को उसकी कमियों के साथ ही अपनाना होता है.
छोटी बातों पर भी होते हैं झगड़े

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हनीमून पर अगर आपको लगता है कि आप दोनों के बीच कभी झगड़ा नहीं होगा, तो यह आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है. जैसे ही हनीमून पीरियड खत्म होता है और दो अलग-अलग सोच वाले लोग जब साथ मिलकर फैसले लेने लगते हैं तो उनके बीच आपसी मतभेद भी होते हैं और ये एक आम बात बन जाती है.
प्यार के बीच आता है पैसा

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शादी के बाद घर का बजट बनाना, खर्चों को मैनेज करना और बचत की प्लानिंग करना बेहद जरूरी हो जाता है. कपल्स को अक्सर आमतौर पर हनीमून के ठीक बाद यह एहसास होता है कि पैसे को लेकर उनका नजरिया एक दूसरे से बिल्कुल अलग है. एक पार्टनर सेविंग करना चाहता है, तो दूसरा खर्च करना पसंद करता है. इस विषय पर खुलकर बात न करने से रिश्ते में एक बड़ी दरार पड़ सकती है.
पर्सनल स्पेस नहीं बचता

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शादी से पहले तो लोगों के मन में जो भी आता है वो लोग वैसा करते हैं. खुद से फैसले लेने की भी आजादी होती है. जो चाहे खाएं जो चाहे पहने सब कुछ खुद के हिसाब से करना होता है. जब मन करें दोस्तों के साथ घूमने के लिए निकल जाएं जब चाहे तब सो जाए लेकिन शादी के बाद आपका समय पूरी तरह से आपका बिल्कुल भी नहीं रह जाता है. आपको हर फैसले में अपने पार्टनर को शामिल करना होता है और उनकी भी सहूलियत देखनी होती है.