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बिहार में मुख्यमंत्री का ताज अब सम्राट चौधरी के सिर पर सजा है. बुधवार को राज्यपाल सैय्यद अता हसनैन ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. इसके अलावा जेडीयू कोटे से विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली. यहां पर एक खास बात ये है कि बिहार में पहली बार भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री जिसे बनाया है उनका बैकग्राउंड न ही संघ का है और न ही भाजपा का.
बीजेपी के 9 ऐसे चहरे जिनका नहीं भाजपा या संघ से रिश्ता

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बता दें कि सम्राट चौधरी ने अपने सियासी सफर की शुरुआत आरजेडी से की थी. इसके बाद वह जेडीयू में गए और फिर बीजेपी में शामिल हुए. भाजपा में आए हुए उन्हें अभी सिर्फ 8 साल ही हुए हैं और आज वह बिहार के सीएम बन चुके हैं.
सम्राट चौधरी इकलौते नेता नहीं है, जिनका राजनीतिक बैकग्राउंड बीजेपी का न होते हुए भी उन्हें सीएम बनाया गया है. बीजेपी ने अभी तक 9 सीएम ऐसे बनाए हैं जिनकी राजनीतिक पारी बीजेपी से नहीं बल्कि कांग्रेस या फिर किसी अन्य पार्टी से शुरू हुई और बीजेपी में एंट्री के बाद उनकी किस्मत चमक गई. बीजेपी ने उन्हें सीएम बनाकर राजनीतिक अहमियत दी.
बिहार के सीएम बने सम्राट चौधरी

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सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए हैं. उनके पिता का नाम शकुनी चौधरी है. सम्राट चौधरी ने अपने सियासी सफर की शुरुआत 90 के दशक में आरजेडी के साथ की थी. इसके बाद सम्राट चौधरी राबड़ी देवी आरजेडी से विधायक रहे. साल 2014 में जेडीयू में शामिल होकर मंत्री बने, लेकिन साल 2017 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया था. बीजेपी में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी ने राजनीतिक बुलंदी हासिल की. विधान परिषद में पहले नेता प्रतिपक्ष बने और फिर बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने. बीजेपी ने उन्हें ओबीसी चेहरे के तौर पर आगे किया और नीतिश कुमार के विकल्प के तौर पर खुद को स्थापित किया. इसके बाद वे नीतीश कुमार सरकार में डिप्टी सीएम के पद पर रहे और अब भाजपा ने उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनाया है.
एन बीरेन सिंह और युमनाम खेमचंद सिंह

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नरेंद्र मोदी के देश के पीएम बनने के बाद पूर्वोत्तर के मणिपुर का सियासी मिजाज पहले से बदल गया है. बीजेपी ने साल 2017 में मणिपुर में पहली बार सरकार बनाई थी तो मुख्यमंत्री का चेहरा एन बीरेन सिंह को बनाया था. बीरेन सिंह का सियासी बैकग्राउंड न बीजेपी का है न ही संघ का है. बीरेन सिंह ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से शुरू किया था और विधायक बने थे. इसके बाद एन बीरेन सिंह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे. कांग्रेस की मणिपुर सरकार में बीरेन सिंह मंत्री रहे, लेकिन 2016 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए.
साल 2017 में जब मणिपुर में भाजपा सत्ता में आई तो एन बीरेन सिंह को मणिपुर का सीएम पद दिया गया. इसके बाद साल 2022 में बीजेपी फिर से सत्ता में आई और इस बार भी मुख्यमंत्री का पद एन बीरेन सिंह को ही दिया गया, लेकिन मणिपुर हिंसा के चलते साल 2025 में उन्हें सीएम पद छोड़ना पड़ा. बाद में बीजेपी ने एन बीरेन सिंह की जगहह युमनाम खेमचंद सिंह को सीएम बनाया, जिनका राजनीतिक बैकग्राउंड भी भाजपा का नहीं है. खेमचंद ने साल 2002 में बीरेन सिंह के साथ डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से अपनी सियासी पारी शुरू की थी, लेकिन 2013 में बीजेपी में शामिल हो गए थे.
सर्बानंद सोनोवाल के बाद हिमंत बने असम के सीएम

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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का राजनीतिक बैकग्राउंड भी बीजेपी का नहीं है और न ही वो संघ से जुड़े हैं. बता दें कि हिमंत सरमा ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस पार्टी से किया था और फिर असम में तरुण गोगोई की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने, लेकिन फिर हिमंत सरमा ने साल 2015 में कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया. इसके बाद साल 2016 के चुनाव में बीजेपी की सरकार बनी तो सरमा मंत्री बने.
पांच साल बाद 2021 में असम में विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी सत्ता में लौटी तो मुख्यमंत्री की कुर्सी हिमंत बिस्वा सरमा को मिली. बीजेपी ने हिमंत सरमा को मुख्यमंत्री बनाया और 2026 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ रही है. इस तरह बीजेपी ने हिमंत बिस्वा सरमा को सीएम बनाकर सियासी संदेश दिया था कि दूसरे दलों से आए हुए नेताओं को पार्टी सीएम बनने से गुरेज नहीं करेगी और अगर उनके अंदर सियासी क्षमता है.
अरुणाचल में गेगोंग और पेमा खांडू

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पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू हैं, जो फिलहाल भाजपा के साथ हैं. उन्होंने अपनी सियासी पारी का आगाज कांग्रेस के साथ शुरू की थी. पेमा खांडू के पिता दोरजी खांडू अरुणाचल प्रदेश के सीएम रहे हैं और दिग्गज नेता माने जाते थे. 2000 में पेमा खांडू ने कांग्रेस का दामन थामा था, लेकिन पहली बार चुनाव अपने पिता के निधन के बाद लड़ा. साल 2016 में अरुणाचल प्रदेश के सीएम बने, लेकिन उसी साल दिसंबर में उन्होंने ज्यादातर विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने उन्हें सीएम बनाया. इसके बाद 2019 में दोबारा बीजेपी ने सीएम बनाया और 2024 में तीसरी बार सीएम बने.
अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी ने किसी दूसरे दल से आए नेता को पहली बार सीएम नहीं बनाया है बल्कि इससे पहले गेगोंग अपांग को भी बीजेपी ने सत्ता की कमान सौंपी थी. अरुणाचल के दिग्गज नेता गेगोंग अपांग ने कांग्रेस से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था और मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन साल 2023 में बीजेपी में शामिल कर सीएम बन गए थे. 42 दिन तक गेगोंग ने एनडीए सरकार का नेतृत्व किया था, लेकिन केंद्र की सत्ता बदली तो फिर उन्होंने पलटी मारकर कांग्रेस में शामिल हो गए.
कर्नाटक के सीएम बसवराज बोम्मई

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दक्षिण भारत में भाजपा ने सिर्फ कर्नाटक में सरकार बनाने में अभी तक सफल रही है, जहां पर पार्टी का चेहरा येदियुरप्पा रहे हैं, लेकिन बीजेपी ने 2021 में उन्हें हटाकर बसवराज बोम्मई को सत्ता की कमान सौंपी. बीजेपी ने जुलाई 2021 में कर्नाटक का सीएम बोम्मई को बनाया था, जो मई 2023 तक सीएम रहे. बसवराज बोम्मई का राजनीतिक बैकग्राउंड बीजेपी का नहीं थी, जिसके बाद भी पार्टी ने उन्हें सीएम बनाया था.
बोम्मई ने जनता दल से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था, जिसके बाद जेडीयू में शामिल हो गए. 2008 में बीजेपी कर्नाटक की सत्ता में आई तो बोम्मई ने जेडीयू से नाता तोड़ा और बीजेपी का दामन थाम लिया. येदियुरप्पा सरकार में मंत्री बने. बोम्मई को सियासत अपने पिता एसआर बोम्मई से विरासत में मिली थी. एसआर बोम्मई जनता पार्टी के बड़े नेता रहे हैं, जिसके चलते 1988 में सूबे के सीएम बने थे. बीजेपी ने इसी बैकग्राउंड को देखते हुए बोम्मई को सीएम की कुर्सी सौंपी थी, लेकिन सत्ता की वापसी कराने में फेल रहे.
यूपी के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कांग्रेस की थी, लेकिन राजनीतिक सफलता बहुजन समाज पार्टी में मिली थी. बसपा के टिकट पर उन्नाव से सांसद रहे और फिर राज्यसभा सांसद बने. बजेृश पाठक बसपा में ब्राह्मण चेहरा माने जाते थे, लेकिन मायावती के सत्ता से बाहर होते ही उन्होंने खुद को किनारे कर लिया. 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. लखनऊ से विधायक चुने गए और मंत्री बने.
इसके बाद साल 2022 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी फिर से सत्ता में आई और फिर बृजेश पाठक को सियासी अहमियत मिली. उन्हें उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया, जिससे उनका राजनीतिक कद और बढ़ गया. यूपी में फिलहाल बीजेपी के ब्राह्मण चेहरे के तौर पर खुद को स्थापित करने में लगे हुए हैं.
अर्जुन मुंडा झारखंड के रहे सीएम

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बीजेपी ने दूसरे दलों से आए हुए नेताओं पर खास तवज्जो दी है, जिसमें झारखंड के सीएम रहे अर्जुन मुंडा का नाम है, जो मूल रूप से झारखंड मुक्ति मोर्चा से थे, बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बने. अर्जुन मुंडा 1980 के दशक में झारखंड आंदोलन के समय वे सक्रिय हुए और जेएमएम से जुड़ गए. साल 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद वे बीजेपी में शामिल हो गए और पहली बार विधायक बने. 2003 वे झारखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और बाद में 2005 और 2010 में भी राज्य की कमान संभाली और बाद में केंद्रीय मंत्री बने थे.
त्रिपुरा के माणिक साहा

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त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डा. माणिक साहा है, उन्होंने अपनी सियासी सफर का आगाज कांग्रेस से किया था. 2016 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने उन्हें पहले अध्यक्ष बनाया और फिर 2022 में सीएम बनाया. 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत मिली तो सत्ता का सिंहासन फिर से माणिक साहा को बैठा दिया जबकि इससे पहले बीजेपी ने 2018 से 2022 तक विप्लव देव को त्रिपुरा का सीएम बना रखा था, लेकिन अब माणिक साहा के हाथ में सत्ता है.