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राजकीय यात्राएं आमतौर पर बड़प्पन और दिखावे की कहानी होती हैं, लेकिन जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय की यात्रा 1902 की एक अलग तरह की मिसाल है. राजा एडवर्ड VII के शासनाभिषेक के लिए लंदन जाने से पहले उन्होंने न सिर्फ अपनी आस्था को टसलने नहीं दिया, बल्कि उसे एक ऐतिहासिक तमाशे में बदल दिया.
महाराजा ने क्यों की ये कठिन यात्रा?

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ब्रिटिश सम्राज्ञी विक्टोरिया के निधन के बाद राजा एडवर्ड VII ने भारत के विभिन्न राजाओं को लंदन आमंत्रित किया, ताकि नए शासन के प्रति वफादारी का संकेत मिल सके. जयपुर के महाराजा के लिए यह केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक रूढ़ियों और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन की परीक्षा थी.
धार्मिक शर्तें और काला पानी का डर

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उस समय बहुत से हिंदू विश्वास के अनुसार समुद्र पार करने से जाति और अछूतता की स्थिति खराब हो सकती थी, जिसे काला पानी कहा जाता था. महाराजा के पुरोहित और दरबारियों ने लंबे विचार‑विमर्श के बाद यात्रा के लिए कुछ कड़ी शर्तें रखीं, जिनमें मांस नहीं पकाना, बर्तनों में केवल गंगाजल का उपयोग और जयपुर की मिट्टी पर स्थापित देवताओं की मूर्तियां साथ ले जाना शामिल था.
विश्व के सबसे बड़े रजत घड़े

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महाराजा ने यात्रा के लिए तीन विशाल रजत घड़े बनवाए, जिन्हें लगभग तीन साल तक महाराजा के राजकीय घण्टाघर और घरेलू बाजार से आए 14,000 रजत सिक्कों से निर्मित किया गया था. इनमें से एक विशेष रूप से दर्ज किया गया घड़ा लगभग 345 किलो वजनी, 5 फुट 3 इंच ऊंचा और लगभग 15 फुट परिधि वाला है, जिसमें करीब 4,200 लीटर तक गंगाजल भरा जा सकता था. यह घड़ा आज भी जयपुर के सिटी पैलेस के प्रवेशद्वार पर रखा है और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है.
रास्ते में ताजा दूध का भी इतंजाम

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महाराजा ने अपने साथ लंदन जाने के लिए गायों की एक टीम भी चुनी, जिससे यात्रा के दौरान दूध की कोई कमी ना हो. ब्रिटिश जहाजों में मांस उत्पादों का उपयोग आम था, इसलिए उनके लिए यह जरूरी था कि जहाज कभी बीफ या मांस से संपर्क नहीं पाया हो. इस नियम के चलते उन्होंने अपनी यात्रा के लिए नया ओलंपिया को चुना, जो अपनी पहली यात्रा पर निकल रहा था.
जहाज की शुद्धि और वरुण के लिए मंत्र

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प्रस्थान से दो दिन पहले, जहाज को गंगाजल से धो दिया गया, ताकि इसे धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जा सके. पुरोहितों ने जहाज पर विशेष पूजा और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया और समुद्र देवता वरुण से शांत जल और सुरक्षित यात्रा की प्रार्थना की.
भाड़े पर ली गई जहाज यात्रा

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महराजा ने पूरी यात्रा के लिए जहाज ओलंपिया को भाड़े पर लिया, जिसकी लागत लगभग 15 लाख रुपये थी; आज के समय में यह कीमत करीब 75 करोड़ रुपये होगी. हैरान करने वाली बात यह है कि महाराजा इस जहाज में यात्रा करने वाले अकेले यात्री थे.
जब लाल सागर में आया तूफान

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बॉम्बे से लंदन की यात्रा के दौरान जहाज लाल सागर में एक तूफान से टकरा गया, जिसने महाराजा के डर को और बढ़ा दिया. पुरोहितों की सलाह पर उन्होंने एक रजत घड़े को समुद्र में छोड़ने का निर्णय लिया, ताकि तूफान शांत हो जाए. बता दें कि मुंबई से लंदन तक की जलमार्ग दूरी करीब 7000 किलोमीटर है.
लंदन में किसने किया था आमंत्रित?

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लंदन में राजा एडवर्ड VII ने महाराजा को और भारत के अन्य शासकों को शाही दरबार में आमंत्रित किया, लेकिन महाराजा शासनाभिषेक के मुख्य समारोह में नहीं गए, क्योंकि वहां बीफ समेत कई गैर‑शुद्ध व्यंजन परोसे जा रहे थे. इसके बजाय वे अपने खाने की व्यवस्था के साथ अलग शिविर में रहे, जहां उनके लिए तैयार किए गए भोजन घर की तरह शुद्ध रहे.